Guru Nanak on Hinduism: ये तो आप सभी जानते होंगे कि सिख धर्म की स्थापना करने वाले पहले गुरु साहिब गुरु नानक देव(Guru Nanak) जी खुद एक हिंदू खत्री परिवार से आते थे। लेकिन बचपन से ही उन्हें हिंदू धर्म की मूर्ति पूजा और जाति के नाम पर बंटवारा कभी पसंद नहीं आया..वो छोटी सी उम्र से ही केवल संगत सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानते थे..लेकिन वो ये भी जानते थे कि हिंदू धर्म में जातिपात और मूर्ति पूजा का अँधविश्वास उनके धमनियों में भर चुका है, और वो सदियों तक उनसे अलग नहीं होगा।
इस तरह के अंधविश्वास के कारण लोगो की उत्पीड़न किया जाता है, गुरु साहिब ने मानवता सेवा को ही परम धर्म माना.. अपने इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर गुरु नानक देव जी की नजरों पर हिंदू कौन थे, वहीं उन्होंने क्यों हिंदू धर्म से अलग एक नये धर्म की पहचान रखी थी… जिसे उन्होंने सिख धर्म कहा था।
गुरु नानक देव जी का जन्म और हिंदू धर्म से विरक्ति
गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल 1469 को राय भोई की तलवंडी पंजाब में हुआ था, जो कि आज के समय में ननकाना साहिब, पाकिस्तान पंजाब का हिस्सा है। उनके पिता लाला कल्याण राय जिन्हें हम मेहता कालू जी भी कहते है औऱ माता तृप्ता देवी जी, दोनो ही एक खत्री हिंदू परिवार से थे..लेकिन एक तरफ उनके पिता व्यापार और काम काज की बातें सोचते थे और चाहते थे कि उनका इकलौता बेटा उनकी पीढ़ी को आगे बढ़ाये तो वहीं बचपन से ही गुरू साहिब को हिंदू धर्म से जुड़े प्रपंच, बेफिजूल के खर्चे वाले कर्मकांड.. जैसे चीजे व्यर्थ लगती थी।
उन्होंने बचपन से ही देखा था कि कैसे हिंदू धर्म में बुत परस्ती होती है, और उसकी आड़ में मासूम और गरीब लोगो को जाति के नाम पर इन आडंबरों से दूर भी रखा जाता था, और उनके अच्छी खासी रकम भी वसूली जाती थी। उन्होंने बचपन में ही तय कर लिया था कि वो मानवता की सेवा को सर्वोपरि मानेंगे। और वहीं से शुरू हुआ गुरु साहिब का सिख धर्म की नींव रखने का सिलसिला।
क्या सोचते थे हिंदू धर्म को लेकर – Guru Nanak on Hinduism
गुरु नानक देव जी कि विरक्ति बचपन से ही जातिवाद और मूर्तिपूजा को लेकर थी.. उन्होंने ये तय किया कि वो एक ऐसे पंथ को शुरु करेंगे, जो न तो मूर्ति पूजा करेगा,, और न ही जातिवाद को मानेगा। जिनकी नजरो में ईश्वर केवल एक ही होगी..और पूरा पंथ उसकी ही साधना करेगा.. जातिवाद जैसा आंडबर फैला कर कोई भेदभाव नहीं होगा.. केवल दो जाति है एक पुरुष की और एक महिला की.. और सभी परमात्मा की ही संतान है। तो फिर वो अलग अलग कैसे हो गए। वो कैसे बंट गए।
हिंदू वो है जो मूर्ति पूजा करता है, जातिवादी मानसिकता रखता है। पाखंड और आंडबरों में रहता है और अंधविश्वास में भरोसा करता है, जबकि जो सिख है वो न तो मूर्ति पूजा करता है, न जातिवाद करता है। उसकी नजरों में सभी एक है। उन्होंने कहा कि सिख धर्म केवल मानवता की सेवा और सबको सम्मान देने के लिए ही बनाया गया है। इसीलिए एक साथ लंगर की व्यवस्था की गई..ताकि हर जाति का व्यक्ति एक साथ एक पंक्ति में एक जैसे बर्तन में बैठ कर खा सकें।
सिख धर्म की विचारधारा को हर धर्म के लोगो ने स्वीकार किया
प्रथन गुरु ने स्वयं हिंदू और सिखो के बीच की फर्क बताया है। इसलिए उन्हें एक समान मानने का तो सवाल ही नहीं उठता… वहीं गुरु साहिब की ये बात उस अवधारणा को भी नकार देती है जह सिखों को हिंदू कौम का हिस्सा कहा गया है। सच यही है कि सिख कभी हिंदूओ के रास्ते पर नहीं चल सकते है और न ही सिख हिंदू धर्म पर.. आज भी सिख धर्म अपने गुरुसाहिब की बातों का अनुसरण करते हुए जातिगत भेदभाव को नकारता है.. मूर्ति पूजा करने के बजाय सभी सिख सिखो के पवित्र ग्रंथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब के आगे ही सिर झुकाते है, और यहीं कारण है कि सिख धर्म की विचारधारा को हर धर्म के लोगो ने स्वीकार किया था।
भले ही लोगो ने धर्म परिवर्तन नहीं किया हो लेकिन वो गुरु साहिब की बातों से प्रभावित होते थे और उनके बताये मार्ग पर चलते थे। गुरु नानत देव जी की ये विचारधारा सिखों की मजबूती देने में सबसे अहम बनी..हालांकि बीते कुछ सालों से सिख धर्म में जातिगत भेदभाव की खबरें आती रहती है.. ऐसे में सवाल ये उठता है कि गुरु साहिब ने सिख धर्म की स्थापना जिस विचारधारा के साथ की थी क्या अब भी वो विचारधारा मौजूद है।






























