Bihar Diwas: एक ताना, एक युवा का संकल्प और एक पूरे क्षेत्र की पहचान… यही कहानी है बिहार की। करीब 114 साल पहले, लंदन की गलियों में एक भारतीय छात्र से पूछा गया था… ‘नक्शे में बिहार कहां है?’ यह ताना उस वक्त भले मजाक में दिया गया था, लेकिन उसी ने बिहार के अलग राज्य बनने की नींव रख दी। आज हम बिहार दिवस पर उस संघर्ष, स्वाभिमान और जज्बे की कहानी याद कर रहे हैं, जिसने इतिहास के पन्नों में बिहार को हमेशा के लिए अलग दर्जा दिलाया।
बंगाल प्रेसिडेंसी का हिस्सा था बिहार (Bihar Diwas)
1912 से पहले बिहार, बंगाल प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था। उस समय बिहार, ओडिशा और झारखंड की संपदा पर कोलकाता में बैठे बंगाली बाबुओं का दबदबा था। बिहार के लोगों को न तो विकास में बराबरी मिलती थी और न ही सरकारी नौकरियों में उनका हक। प्रशासनिक और शैक्षिक अवसरों में भी उन्हें पीछे रखा जाता था।
इसके साथ ही भाषाई और सांस्कृतिक पहचान पर भी दबाव था। बंगाली भाषा और संस्कृति के प्रभाव के कारण बिहार के लोग अपनी अलग पहचान खोते जा रहे थे। यही असंतोष धीरे-धीरे आंदोलन में बदलने लगा।
‘बिहार, बिहारियों के लिए’ बना आंदोलन का नारा
19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में एक नारा तेजी से उभरा ‘बिहार, बिहारियों के लिए’। इस छोटे से नारे ने एक बड़े आंदोलन की नींव रखी। शुरुआत में ब्रिटिश हुकूमत और बंगाल प्रेसिडेंसी के अधिकारी इस मांग को नजरअंदाज करते रहे, लेकिन बिहार के लोगों का गुस्सा और असंतोष लगातार बढ़ता गया।
गौरवशाली इतिहास ने जगाई पहचान की भावना
बिहार के बुद्धिजीवियों को अपने इतिहास पर गर्व था। उन्हें पता था कि यही धरती कभी मगध और पाटलिपुत्र के रूप में पूरे भारत का नेतृत्व कर चुकी है। यह वही भूमि थी, जिसकी सीमाएं कभी अफगानिस्तान तक मानी जाती थीं। ऐसे में इसे बंगाल के एक हिस्से के रूप में देखना उनके लिए स्वीकार करना मुश्किल था।
‘नक्शे में बिहार कहां है?’ एक सवाल जिसने बदल दी दिशा
इस आंदोलन को दिशा देने वाले प्रमुख नेताओं में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा का नाम सबसे आगे आता है। 1893 में जब वे पढ़ाई के लिए लंदन गए, तो वहां एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। एक गोष्ठी में जब उन्होंने खुद को बिहार का निवासी बताया, तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और पूछा ‘नक्शे में बिहार कहां है?’ यह सवाल उनके दिल पर गहरी चोट कर गया।
लंदन की घटना से शुरू हुआ संघर्ष
इस अपमान ने डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को झकझोर दिया। उन्होंने ठान लिया कि बिहार को उसकी अलग पहचान दिलाकर रहेंगे। भारत लौटते समय बक्सर स्टेशन पर जब उन्होंने एक सिपाही की वर्दी पर ‘बंगाल पुलिस’ का बैच देखा, तो उनका संकल्प और मजबूत हो गया।
आंदोलन को मजबूती देने के लिए शुरू किया अखबार
लंदन से लौटने के बाद उन्होंने इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए। 1894 में उन्होंने ‘बिहार टाइम्स’ नाम से अखबार शुरू किया, जिसके जरिए उन्होंने लोगों को जागरूक किया और अलग राज्य की मांग को आवाज दी।
इस संघर्ष में उनके साथ महेश नारायण, नंद किशोर लाल और राय बहादुर कृष्ण सहाय जैसे नेताओं ने भी अहम भूमिका निभाई। हालांकि, विरोधियों ने इनकी मांग का मजाक उड़ाते हुए इन्हें ‘चार भिखारियों की मांग’ तक कहा, लेकिन इन नेताओं ने हार नहीं मानी।
बदली परिस्थितियों ने दी नई दिशा
1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन के बाद परिस्थितियां बदलीं। इस मौके का फायदा उठाते हुए डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा और उनके साथियों ने अपनी मांग को और तेज किया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को कई ज्ञापन सौंपे और लगातार प्रयास करते रहे।
22 मार्च 1912: सपना हुआ सच
आखिरकार लंबे संघर्ष के बाद 22 मार्च 1912 को बिहार को अलग प्रांत का दर्जा मिल गया। यह सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि यह बिहार की पहचान, स्वाभिमान और अधिकारों की जीत थी।
आज भी प्रेरित करती है यह कहानी
आज 114 साल बाद भी बिहार का यह सफर हमें यह सिखाता है कि पहचान और अधिकार के लिए लड़ी गई लड़ाई कभी बेकार नहीं जाती। ‘नक्शे में बिहार कहां है?’ जैसे सवाल से शुरू हुई यह कहानी आज एक मजबूत राज्य की पहचान बन चुकी है।
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