High-voltage drama in Lok Sabha: लोकसभा अध्यक्ष का पद निष्पक्षता की सर्वोच्च मिसाल माना जाता है, जिनका दायित्व सदन में पक्ष और विपक्ष, दोनों की बात सुनना और न्यायसंगत निर्णय लेना है। सदन में स्पीकर का काम ‘अंपायर’ की तरह निष्पक्ष न्याय करना होता है। वर्तमान परिस्थितियों में अध्यक्ष ओम बिरला पर पक्षपात के गंभीर आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि उन्हें अपनी बात रखने का बराबर अवसर नहीं मिल रहा, जिसके चलते अब उनके खिलाफ पद से हटाने के प्रस्ताव (Resolution for Removal) का बिगुल फूंक दिया गया है। लेकिन क्या ओम बिरला इस कसौटी पर खरे उतर रहे हैं?
विपक्ष के तीखे तेवर और हटाने के नोटिस ने संसदीय मर्यादा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। तो चलिए इस लेख के जरिए समझते है कि आखिर क्यों देश के सबसे बड़े सदन के मुखिया पर लग रहे हैं इतने गंभीर आरोप और क्या है इसके पीछे का पूरा ‘नंबर गेम’। मीडिया द्वारा मिली जानकारी के मुताबिक बताया जा रहा है कि ओम बिरला पर लग रहे आरोपो को सोमवार 9 मार्च को सदन की कार्य सूची में शामिल किया गया है और इस पर आज चर्चा हो सकती है।
दरअसल, संसद के मौजूदा बजट सत्र के पहले चरण में विपक्षी दलों ने लोकसभा स्पीकर पर गंभीर आरोप लगाते हुए पद से हटाने के प्रस्ताव का नोटिस दिया था। विपक्षी एकजुटता की ताकत दिखाते हुए, 10 फरवरी को सौंपे गए इस नोटिस पर इंडिया (INDIA) गठबंधन के 118 सांसदों ने अपनी मुहर लगाई थी।
आज सदन में क्या हुआ?
9 मार्च 2026 को बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक बेहद हंगामेदार रही। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा की मांग को लेकर भारी शोर-शराबा किया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नागरिकों की सुरक्षा पर बयान दिया, जबकि कांग्रेस सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ पद से हटाने का प्रस्ताव पेश किया, जिसके कारण बिरला ने सदन की अध्यक्षता नहीं की।
ओम बिरला पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा स्पीकर ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती। विपक्षी दलों का कहना है कि उन्हें सदन में बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया जाता और सत्ता पक्ष के सांसदों की आपत्तिजनक टिप्पणियों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की जाती। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि जनता से जुड़े मुद्दे उठाने पर विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया, जबकि पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां करने वाले सत्तारूढ़ दल के सांसदों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। विपक्ष का कहना है कि स्पीकर को सदन के सभी पक्षों का विश्वास बनाए रखना चाहिए, लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा नहीं हो रहा है।
लोकसभा स्पीकर को हटाने के क्या नियम हैं?
लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए नियमों के तहत कम से कम दो सांसदों के हस्ताक्षर, 14 दिन का नोटिस और सदन में कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। नोटिस मंजूर होने के बाद इस पर चर्चा का समय तय किया जाता है। नियमों के अनुसार इस बहस के दौरान स्पीकर अपनी कुर्सी पर नहीं बैठते और सदन की कार्यवाही आमतौर पर डिप्टी स्पीकर चलाते हैं। हालांकि इस समय डिप्टी स्पीकर का पद खाली होने की वजह से स्पीकर के पैनल में शामिल सबसे वरिष्ठ सांसद इस चर्चा की अध्यक्षता करेंगे।
विपक्ष के सामने बहुमत की चुनौती
संविधान के अनुसार लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए साधारण बहुमत यानी 272 वोट की जरूरत होती है। लेकिन मौजूदा आंकड़ों को देखते हुए विपक्ष के लिए यह संख्या जुटाना आसान नहीं है। इस समय सत्तारूढ़ National Democratic Alliance (एनडीए) के पास करीब 293 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है, जिनमें Bharatiya Janata Party के 240, Janata Dal (United) के 16 और Telugu Desam Party के 12 सांसद शामिल हैं। वहीं विपक्ष के पास कुल करीब 238 सांसद हैं, जिनमें Indian National Congress के 99 सांसद हैं। समाजवादी पार्टी, डीएमके, All India Trinamool Congress और अन्य विपक्षी दलों के सांसदों को मिलाकर भी साधारण बहुमत का आंकड़ा पार करना मुश्किल माना जा रहा है।
नंबर गेम के इस चक्रव्यूह में विपक्ष का पलड़ा फिलहाल कमजोर नजर आ रहा है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि यह प्रस्ताव ओम बिरला को पद से हटाने से ज्यादा, सरकार को घेरने और एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने के लिए लाया गया है। हकीकत यही है कि जब तक सत्ता पक्ष के पास बहुमत का सुरक्षा कवच है, इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना बेहद कम है।
