Shankaracharya Avimukteshwarananda controversy: बच्चों की संख्या और जनसंख्या को लेकर चल रही बहस के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (Swami Avimukteshwaranand) का बयान चर्चा में आ गया है। उन्होंने हाल ही में मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी (Maulana Shahabuddin Razvi Bareilvi) की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दी। मौलाना ने मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) के तीन बच्चों वाले बयान का हवाला देते हुए कहा था कि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा नहीं कर रहे हैं। इसी संदर्भ में शंकराचार्य ने अपनी बात रखते हुए जनसंख्या और समाज की मजबूती पर अलग नजरिया पेश किया।
“यह निजी मामला है, अपने घर की चिंता करें” (Shankaracharya Avimukteshwarananda controversy)
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने साफ कहा कि कितने बच्चे हों, यह हर परिवार का निजी निर्णय है। इस मुद्दे को धर्म और समाज की ताकत से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें दूसरों की गिनती करने के बजाय अपने घर और अपने संस्कारों पर ध्यान देना चाहिए।
उनका मानना है कि समाज की मजबूती सिर्फ संख्या से तय नहीं होती। अगर कोई यह सोचता है कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से समाज शक्तिशाली हो जाएगा, तो यह अधूरी सोच है।
“शेर की दहाड़ और कुत्तों की संख्या”
अपनी बात को समझाने के लिए शंकराचार्य ने एक उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि कुत्तों की संख्या बहुत ज्यादा होती है, लेकिन जब एक शेर दहाड़ता है तो सब भाग जाते हैं। उनका इशारा इस बात की ओर था कि ताकत संख्या में नहीं, बल्कि गुणवत्ता और साहस में होती है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो लोग केवल संख्या बढ़ाने की बात करते हैं, वे अपने धर्म की गहराई और मूल भाव को नहीं समझते।
यादवों का उदाहरण देकर समझाया
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इतिहास का हवाला देते हुए यादवों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि यादवों को कोई बाहरी ताकत खत्म नहीं कर पाई, लेकिन आपसी संघर्ष और अधिकता ने उन्हें कमजोर कर दिया। उनका संदेश साफ था कि आंतरिक कलह और गलत दिशा में बढ़ती संख्या समाज को मजबूत नहीं बनाती, बल्कि नुकसान पहुंचा सकती है।
“संस्कार ही असली ताकत”
शंकराचार्य ने जोर देकर कहा कि समाज की असली नींव संस्कारों पर टिकी होती है। अगर बच्चों को सही शिक्षा, संस्कृति और धर्म की समझ नहीं दी जाएगी, तो केवल संख्या बढ़ाने का कोई लाभ नहीं होगा।
उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दिए गए, तो वे किसी भी समय भटक सकते हैं या धर्म परिवर्तन जैसे प्रभावों में आ सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि परिवार अपने बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखें।
माता-पिता की जिम्मेदारी सबसे अहम
अपने बयान के अंत में उन्होंने कहा कि कितने बच्चे पैदा किए जाएं, यह माता-पिता का निजी फैसला है। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि जो भी बच्चे हों, उन्हें सही दिशा और मजबूत संस्कार दिए जाएं।






























