पैरों से पुरुषों को थाली परोसती हैं इस समाज की महिलाएं… वजह जानकर आप भी जानेंगे चौक!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 05 Nov 2021, 12:00 AM | Updated: 05 Nov 2021, 12:00 AM

आज भी समाज में कुछ ऐसे रूढ़ीवादी परंपराएं और रीति-रिवाज बरकरार है, जो हैरानी में डाल देते हैं। आज हम थारू समाज में आज भी मौजूद ऐसी ही एक परंपरा के बारे में डीटेल में बताएंगे, जो स्त्री-पुरुष की समानता के बिल्कुल उलट है। चलिए इस अजीबो-गरीब परंपरा  के बारे में जानते हैं…

आपको जानकर बहुत हैरानी होगी कि अन्न जिसे खाकर हम जीते हैं, जिसका पूरा पूरा सम्मान करते हैं, उसी अन्न को लेकर थारू जनजाति में बेहद अजीबो-गरीब परंपरा है। इस जनजाति की महिलाएं भोजन परोसने के बाद पुरषों को आगे की तरफ थाली पैरों से बढ़ाकर देती है। ऐसा करने के पीछे की वजह भी काफी अजीब है।

ये तो सब जानते हैं कि पूरे विश्व में पितृ सत्तात्मक समाज जहां आज भी है पर अगर थारू जनजाति की बात की जाए तो यहां पर परिवार का मुखिया महिलाएं होती हैं। वैसे महिलाओं का मुखिया होना को सही है, लेकिन पैरों से भोजन को आगे करने की परंपरा नेगेटिव पहलू को दिखाता है। हैरानी की बात तो ये है कि ऐसी परंपरा से थारुओं में मातृ सत्ता का एहसास हुआ था। ऐसे भाव मन में आए थे कि घर में महिलाओं की सत्ता होनी चाहिए।

हालांकि इस परंपरा के पीछे एक स्टोरी है जो काफी इंटरेस्टिंग है। एक रिसर्च पर गौर किया जाए तो हल्दीघाटी के युद्ध के वक्त साल 1576 में अपने परिवार की सेफ्टी के लिए अपने सेवकों के साथ के परिवारों को महाराणा प्रताप के सिपाहियों ने हिमालय की तलहटी में भेजा पर सभी गलत रास्ते पर निकल गए। जिससे वो नेपाल सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के तराई एरिया में जा पहुंचे। फिर यहीं के जिलों में वो रहने लगे। राजस्थान के थार एरिया से ये लोग आए थे जिसकी वजह से इनको थारू कहा जाता है।

सभी सुरक्षित रहें, इसके लिए इन परिवारों की महिलाओं ने अपने साथ आए सैनिकों और सेवकों से ही शादी कर ली। यूं तो उन युवतियों ने शादी कर ली थी अपनी सुरक्षा के लिए, लेकिन अपनी कुलीन उच्चता के अहसास को छोड़ा नहीं। ये सारे विवाह एक समझौता के अलावा और कुछ भी नहीं था। ऊंच-नीच के एहसास को ये औरतें छोड़ नहीं पाई और न तो इन औरतों ने अपना घमंड कभी छोड़ा।

वो जब भी पुरुषों को भोजन परोसतीं थाली को पैर से ठोकर मार देती और तब आगे की तरफ पुरुषों को भोजन मिल पाता था। इस तरह से उनका घमंड बरकरार रह पाता और ऐसा होते होते ये एक परंपरा ही बन गया। राजवंशी होने के अपने अहसास को इन महिलाओं ने काफी फीका नहीं होने दिया, बल्कि आज भी इस जनजाति की महिलाएं आभूषण पहनकर सजती-संवरती हैं जैसे कि रानियां सजती सवरती हैं और खुद को परिवार का मुखिया मानती हैं। फिलहाल ये पूरा समाज अब शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ रहा है।

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