Adi Dharma movement: भारत में वर्ण व्यवस्था और जातिगत भेदभाव के लिए होने वाली लड़ाई कई सदियों से चलती आ रही है। ब्राह्मणों की बनाई नीतियो के कारण समाज का एक तबका हमेशा शोषित, कुपोषित, अभावों और प्रताड़ना का शिकार रहा है। देश की आजादी के बाद भी ये शोषण आज भी जारी है, जबकि अब तो देश को समानता वाला संविधान भी मिला है.. और दलितों और ब्राह्मणों को बराबर का अधिकार भी..लेकिन फिर भी सोच को नहीं बदल पा रहे है… दलित लड़ रहे है..लेकिन जीत का नहीं पता..मगर 1926 में एक ऐसी क्रांति आई थी, जिसने ब्राह्मणवादी सोच ही नहीं बल्कि उनके कानूनों को भी पूरी तरह से ध्वस्थ कर दिया था.. ये आंदोलन था पंजाब में चमार समाज के लोगो द्वारा किया गया आदि धर्म आंदोलन। अपने अस वीडियो में हम बात करेंगे दलितो के इस आंदोलन के बारे में, जिसने पहली बार पंजाब में दलितों को सांस्कृति पहचान दिलाई थी।
क्या है आदि धर्म आंदोलन की पृष्ठभूमि
आदि धर्म आंदोलन जिसे आद धर्म के नाम से भी जाना जाता है, वो असल में अविभाजित पंजाब का पहला ऐसा आंदोलन था जिसे दलितो के उत्थान और बराबरी के सम्मान के लिए शुरु किया गया था। इस आंदोलन को बाबू मंगूराम मुगोवालिया ने 11-12 जून 1926 को शुरू किया था। बाबू मंगूराम मुगोवालिया पंजाब के होशियारपुर जिले के मुगोवाल नाम के एक गांव में चमड़े का व्यवसाय करने वाले परिवार में जन्में थे, जिसके कारण उन्हें जाति से चमार कहा जाता था। घर परिवार की माली हालात ठीक होते हुए भी जाति व्यवस्था के कारण पिता के चाहते हुए भी वो गांव में मेट्रिक तक नहीं कर पाये थे।
पिता चाहते थे कि उनका बच्चा पढ़े, और अंग्रेजो के बराबर खड़े हो कर उनके व्यापार को आगे बढ़ाने में मदद करें, लेकिन जातिगत भेदभाव और ब्राह्मणीवादी नीतियो के कारण वो अपने पिता का ये सपना पूरा नहीं कर सकें.. वो काफी हताश हो गए और जातिगत व्यव्स्था से दूर 1909 में वो अमेरिका चले गए, जहां वो 1913 में स्थापित ग़दर लहर के सक्रिय सदस्य भी रहे, और एक बार जब वो एसएस मेवरिक नामक जहाज हथियार लेकर जा रहे थे, तो वो जहाज सुरक्षा कर्मियों के हाथों में लग गए, मंगूराम फिलीपीन्स में छद्य नाम से 12 सालो तक छिपे रहे। करीब 12 सालों बाद वो अपने गांव पहुंचे थे.. तब तक उनके गांव में अफवाह फैली थी कि उन्हें फांसी पर लटका दिया गया है।
मंगूराम ने अपने जीवन के अनुभव और ज्योतिबा फूले से प्रेरित होकर ये ऐलान कर दिया था कि दलित ही पंजाब के मूल निवासी है, इसलिए उन्होंने तय किया कि अब वो भी पंजाब के दलितों के बराबरी का हक दिलाने के लिए लड़ेगे.. जो ब्राह्मण दलितो के हिंदू धर्म का हिस्सा तक नहीं मानते है वो उनकी बनाई परंपरा को मानने से ही इंकार करने लगे। और 1926 में उन्होंने आद्य धर्म आंदोलन की शुरुआत की। उन्होंने अपने गुरु नेता लाला हरदयालजी को पत्र लिख कर बताया था कि जब तक देश में जातिगत भेदभाव जैसी बीमारी का इलाज नहीं होता तब तक देश में तरक्की नहीं हो सकती, बराबरी और समानता नहीं मिलेगी।
उन्होंने अछूतों को जगाने के लिए एक बड़े आंदोलन की शुरुआत की। इसके लिए सबसे पहले उन्होंने दलितो के लिए स्कूल खोला..मंगूराम के प्रयासो से दलित समाज उनसे जुड़ने लगे थे, इतना ही नहीं बूतन मंडी के चमड़े के बड़े व्यापारी सेठ किशनदास ने जालंधर में इस आंदोलन के मुख्यालय ‘आद धर्म मंडल’ की स्थापना में मंगूराम की मदद की थी। आद धर्म आंदोलन के तहत उन्होंने दलितो को बराबरी की हक दिलाने के लिए उन्होंने भूमि हस्तांतरण अधिनियम, 1900 के अंतर्गत दलितों के जमीन पर मालिकाना हक लेने पर कानूनी प्रतिबंध था, दलित और शूद्र जिस जमीन पर घर बना कर रहते थे, वो भी घास फूस की होती थी, पक्के मकान बनाने की इजाजत नहीं थी, और जमीन के बदले उन्हें मालिकों के यहां बेगारी करनी पड़ती थी।
मंगूगाम ने जब आदि धर्म आंदोलन शुरु किया था, तब देश के अलग अलग हिस्से जिसमें दक्षिण भारत के आदि आंध्र, आदि द्रविड़ और आदि कर्नाटक आंदोलन और उत्तरप्रदेश का आदि हिंदू आंदोलन जैसे भी बहुत वयापक रूप से चल रहे थे। मंगूराम मानते थे कि आद धर्म ही उनका अपना धर्म है, और वो ही मूल भारतीय है, ब्राह्मणवादी सोच रखने वाले हिंदू तो कभी भारत के थे ही नहीं..ये कौम बाहर से आई और हम पर कब्जा कर लिया। उन्होंने उस दौरान 7 करोड़ दलितों को अलग आद धर्म को मानने के लिए प्रेरित किया जो हिंदू धर्म से अलग था।
आद धर्म ही उनका अपना धर्म है, उन्हें कभी भी हिंदू नहीं मानना चाहिए। मंगूराम का ये आंदोलन काम कर गया और 1931 में जब पहली बार जनगणना हुई तब अछूतों ने अलग धर्म की मांग करते हुए आद धर्म ही लिखवाया। आद धर्म भक्ति आंदोलन के संत-कवियों, विशेषकर रविदास, वाल्मीकि, कबीर और नामदेव की शिक्षाओं पर आधारित था, जिसके कारण शूद्रों ने आद धर्म को चुनना शुरु कर दिया.. और इस कारण अंग्रेजो को आद धर्म को एक अलग मज़हब का दर्जा पड़ा।
आद धर्म आंदोलन के कारण पंजाब के दलितों ने हिंदू धर्म छोड़ा और आद धर्म को मानना शुरु किया, जिसके कारण उन्होंने हिंदू धर्म की नीतियों को मानने से इंकार कर दिया और दलितों को आदि धर्म आंदोलन के जरिये नई धार्मिक सांस्कृति पहचान मिली थी। मौजूदा समय में भी पंजाब के दोआबा क्षेत्र में आद धर्म का प्रभाव है, जिसे रामदासिया और चमार समुदाय के लोग फॉलो करते है, और अपनी अलग धार्मिक पहचान के साथ ही जीते है। एक शख्स की पहल ने मूल दलितो को नई पहचान दिला दी.. उन्हें आज भी दलितों के बीच काफी सम्मान दिया जाता है।




























