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यादवों की पार्टी छवि से बाहर निकलना चाह रही समाजवादी? अब क्यों अखिलेश को हो रही इससे परेशानी?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 06 Oct 2021, 12:00 AM | Updated: 06 Oct 2021, 12:00 AM

समाजवादी पार्टी की एक पहचान यादव समुदाय की पार्टी के तौर पर भी होती रही है। सपा का यादवों पर एक छत्र प्रभाव रहा है और यादव समुदाय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर अपना विश्वास भी जताते रहे हैं, लेकिन देखने वाली बात ये है कि जिस तरह से अखिलेश की पार्टी चुनाव दर चुनाव पीछे होती जा रही है और  जातिगत जनगणना और पर्याप्त आरक्षण वाले मुद्दों पर सपा बीजेपी को घेर रही है। तो क्या पिछड़ों को साधने की लड़ाई में लगी है सपा, क्योंकि अपनी पार्टी के गैर यादव पिछड़े नेताओं उसने चेहरा बनाकर आगे कर दिया है। 

इस कवायद का जो मकसद हो सकता है वो ये कि क्या ऐसा कर ‘यादव समुदाय की पार्टी’ होने की पहचान से सपा  छुटकारा पाना चाहती है? और गैरयादव पिछड़ा वर्ग को भी अपने पाले में करना चाहती है? इस सवाल पर गौर करते हैं…

मिशन 2022 को फतेह करने के लिए सपा पूरी कोशिश कर रही हैं। इसके लिए उसकी जो पहली कोशिश है वो गैर यादव पिछड़ों में पैठ बनाने की। उसे अच्छा सबक मिल गया दो चुनावों के नतीजों से कि गैर यादव जातियों में ज्यादातर वोट बीजेपी की तरफ चला गया। कांग्रेस और बीएसपी से सपा का जो गठबंधन हुआ वो सपा के लिए घातक ही रहा।

ऐसे में अब कुर्मी, मौर्य, निषाद, कुशवाहा, प्रजापति, सैनी, कश्यप,वर्मा, काछी, सविता समाज और बाकी की पिछड़ी जातियों को अपने पाले में करने की पूरी कोशिश की सपा के तरफ से की जा रही है। प्रदेश भर के कई जगहों पर जो यात्राएं निकाली जा रही हैं उसमें चेहरा गैर यादव पिछड़ी जाति के नेताओं को ही बनाया जा रहा है।

सपा के प्रदेश अध्यक्ष है नरेश उत्तम जो कि चुनाव के नजदीक आते ही यूपी भर में पटेल यात्रा निकाल रहे हैं। पहले चरण की कामयाबी को देखते हुए उत्तम को दोबारा यात्रा निकालने के लिए कह दिया गया है। निषादों, मल्लाहों,  कश्यप जैसी जातियों को सपा के करीब लाने की भी भरपूर कोशिश की जा रही है और इसके लिए पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के जो अध्यक्ष है राजपाल कश्यप उनको सामाजिक न्याय यात्राएं निकालने की जिम्मेदारी दी जा रही है। इसी के साथ ही पिछड़ा वर्ग सम्मेलन भी कराए जा रहे हैं अलग अलग कई चरणों में।

सपा की जो महिला प्रदेश अध्यक्ष है लीलावती कुशवाहा उनको जिम्मेदारी दी गई है कि वो महिलाओं के साथ ही कुशवाहा समाज को भी एकजुट करें। सपा का सबसे ज्यादा जोर तो इस पर है कि जातिगत जनगणना की मांग उठाई जाए क्योंकि इस पूरे मुद्दे का फिलहाल मंथन हो रहा है। अखिलेश तो ये तक कह चुके हैं कि सरकार जातिगत जनगणना अगर नहीं कराती है तो सपा की सरकार यूपी में बनने पर यूपी में जातिगत जनगणना वो कराएंगे जिसके हिसाब से आरक्षण का फायदा भी होगा।

क्या पिछड़ा क्या दलित सबको अखिलेश अपने पाले में करने की एक कवायद ही शुरू कर चुके हैं। इस बाबत अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ के जो अध्यक्ष हैं व्यास जी गोंड उनको भी एक जिम्मेदारी दी गई है। वो संविधान बचाओ यात्रा निकाल रहे हैं। अब इस तरह से पिछड़ी जातियों से जोर आजमाना योगी के सामने अखिलेश को कितना खड़ा कर पाता है ये देखने वाली एक बड़ी बात है। क्योंकि ये बात किसी से नहीं छिपा की यूपी में इलेक्शन जितवाने में पिछड़ा जातियों का कितना हाथ होता है।  

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