क्या राहुल गांधी की 150 दिनों की मेहनत पर भाजपा ने पानी फेर दिया?
गिरिए! गिरना स्वाभाविक है. परन्तु, इतना मत गिरिए कि रसातल में पहुंच जाए. ज़मीन पर गिरा इंसान उठ सकता है, जबकि ज़मीन में पड़ा इंसान सिर्फ मुर्दा होता है. राजनीतिक स्वार्थ के वशीभूत हमने कई नेताओं की नैतिकता को गिरते हुए देखा है परंतु नैतिकता के मृत होने के कई उदाहरण पिछले कुछ वर्षों में...
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