चावदार तालाब सत्याग्रह: अंबेडकर ने दलितों को कुछ यूं दिलाया पानी पीने का अधिकार!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 22 नवम्बर 2021, 05:30 AM Updated: 22 नवम्बर 2021, 05:30 AM
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1927 में हुए पानी पीने के हक की ऐतिहासिक लड़ाई चावदार तालाब क्रांति के बारे में आप कितना जानते जो कि संबंधित है बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर से? तो आज हम आपको चावदार तालाब क्रांति के बारे में बताएंगे डीटेल में जो दलितों के संघर्ष को बयां करता है। 

चावदार तालाब नाम का एक आंदोलन हुआ जिसकी तब खूब चर्चाएं थी। इस आंदोलन की अगुवाई बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने की थी जिसे 20 मार्च 1927 को अंजाम दिया गया महाराष्ट्र के रायगढ़ डिस्ट्रिक्ट के महाड़ स्थान पर। जो कि सार्वजनिक तालाब से अछूतों दलितों को  पानी पीने और यूज करने के राइट को  हासिल कराने के लिए काफी असरदार सत्याग्रह था।

क्या था ये सत्याग्रह? 

तब के समय में सवर्णों के धर्म स्थलों या फिर कुओं और तालाब पर कुत्ता-बिल्ली या फिर गाय-भैंस या फिर गधे जैसे जानवर तो जा सकते थे या फिर पानी पी सकते थे, लेकिन उसी तालाब से एक मनुष्य को जो कि अछूत हो वो पानी पीने की अधिकार नहीं रखता था। भले ही प्यास के मारे वो मर क्यों न जाए। सोचिए की भेदभाव किस चरम पर होगा तब के समय में।

डॉ. अंबेडकर ने तब सार्वजनिक स्थलों से दबे कुचले वंचित तबके को पानी पीने का अधिकार दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी और फिर अगस्त 1923 को बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल एक प्रस्ताव ले आया और ये कहा कि जिन स्थानों की देख-रेख कर रही है सरकार उसके इस्तेमाल का हक सबको है। इस आदेश के बाद उस अधिनियम को नगर निगम परिषद ने लागू कर दिया 1 जनवरी 1924 को।

आदेश मानने को तैयार नहीं हुए सवर्ण तो… 

लेकिन फिर भी सवर्ण हिंदू इस आदेश को मानना ही नहीं चाहते थे। और तो और दलितों के चावदार तालाब से पानी लेने का पुरजोर विरोध कर रहे थे। इसके अगेंट्स 1927 में बाबा साहब ने एक बड़ा फैसला लेते हुए एक सत्याग्रह किया। 20 मार्च को बहिष्कृत हितकारिणी सभा के तहत  सम्मेलन हुआ जिसमें शामिल होने के लिए लोग जुटे। इन लोगों की संख्या थी दस हजार से भी ज्यादा। फिर जब ये सम्मेलन खत्म हुआ, तो चावदार तालाब की ओर लोग मार्च के लिए निकल पड़े। जब सवर्णों ने दलितों को इतनी बड़ी संख्या में देखा तो वो उनको रोक नहीं पाए फिर सभी दलितों ने तालाब का पानी पीया और लौट गए।

फिर आखिरकार मिल ही गया हक

इस सत्याग्ह का काफी असर हुआ था तब। जब सभी पानी पीकर चले गए तो ब्राह्मणों ने तालाब के पानी को अशुद्ध बताकर उसे शुद्ध किया। फिर इस मामले को लेकर वंचित समाज  कोर्ट पहुंच गया जिस पर दिसंबर 1937 को इंसानियत के पक्ष में फैसला करते हुए  बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी को तालाब का पानी पीने और इस्तेमाल करने की इजाजत दी।इस तरह से ये सत्याग्रह आखिरकर डॉ अंबेडकर की अगुवाई में पूरा हुआ। भारतीय इतिहास में ऐसा पहली दफा हुआ कि  पीने के पानी को लेकर इस कदर भारी भरकम आंदोलन किया गया हो। 

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