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नोटबंदी पे अपने लक्षमण रेखा से वाकिफ है देश का उच्च न्यायालय, नोटबंदी के बाद काले धन और टेरर फंडिंग का क्या हुआ?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 13 Oct 2022, 12:00 AM | Updated: 13 Oct 2022, 12:00 AM

कोई मामला किसी संविधान पीठ के सामने आता है, तो उसका जवाब देना पीठ का दायित्व

बुधवार, 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह सरकार के नीतिगत फैसलों की न्यायिक समीक्षा को लेकर अपने ‘लक्ष्मण रेखा’ से वाकिफ है। पीठ ने आगे कहा कि वह 2016 के नोटबंदी के फैसले की पड़ताल अवश्य करेगा, ताकि यह पता चल सके कि मामला केवल ‘अकादमिक’ कवायद तो नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय पीठ ने नोटबंदी के संबंध में आए एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि जब कोई मामला किसी संविधान पीठ के सामने आता है, तो उसका जवाब देना पीठ का दायित्व बन जाता है।

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केंद्र सरकार और RBI से मांगा विस्तृत हलफनामा

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ ने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को विस्तृत हलफनामा दायर करने का भी निर्देश दिया है। इस याचिका पर सुनवाई कर रहे संविधान पीठ में जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना, जस्टिस वी. रमासुब्रमण्यम और जस्टिस बीवी नागरत्ना भी शामिल थे।

नोटबंदी के बाद काले धन और टेरर फंडिंग का क्या हुआ?

बुधवार को संविधान पीठ ने केंद्र से और RBI से सवाल किया कि क्या 2016 में 500 और 1,000 रुपये के नोटों को सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने बंद करने का जो निर्णय लिया था, और उसके माध्यम से जो काले धन, आतंकवाद के वित्तपोषण और नकली मुद्रा को रोकने का जो उद्देश्य था, वो उद्देश्य पूरा हुआ या नहीं? जस्टिस एस. अब्दुल नजीर ने नोटबंदी को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पूछा, ‘नोटेबंदी के बाद काले धन और टेरर फंडिंग का क्या हुआ?’

संविधान पीठ ने आगे कहा कि, ‘इस पहलू का जवाब देने के लिए कि यह कवायद अकादमिक है या नहीं या न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है, हमें इसकी सुनवाई करनी होगी। सरकार की नीति और उसकी बुद्धिमता, इस मामले का सिर्फ एक पहलु है।’ पीठ ने आगे कहा, ‘हम हमेशा जानते हैं कि सरकारी नीतियों में हमारी लक्ष्मण रेखा कहां तक है, लेकिन जिस तरह से इसे किया गया था, उसकी पड़ताल की जानी चाहिए। हमें यह तय करने के लिए वकील को सुनना होगा।’

दोनों पक्षों के वकीलों ने क्या कहा?

वहीं केंद्र की तरफ से वकालत करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अकादमिक मुद्दों पर अदालत का समय ‘बर्बाद’ करना उचित नहीं है। दूसरी तरफ मेहता की दलील पर आपत्ति जताते हुए याचिकाकर्ता विवेक नारायण शर्मा के अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि वह ‘संवैधानिक पीठ के समय की बर्बादी’ जैसे शब्दों से हैरान हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के पिछली पीठ ने कहा था कि इन मामलों को एक संविधान पीठ के समक्ष रखा जाना चाहिए।

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