Taliban Ban Contraceptive Pills: अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने महिलाओं के जीवन पर शिकंजा और कस दिया है। ताजा फैसले के तहत अब महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई है। हालात ऐसे हैं कि तालिबानी अधिकारी और डॉक्टरों के रूप में तैनात लोग क्लीनिकों को धमकी दे रहे हैं कि अगर किसी महिला को गर्भनिरोधक दवा दी गई, तो पूरा क्लीनिक बंद करा दिया जाएगा। इसका असर यह हुआ है कि देशभर में एक के बाद एक स्वास्थ्य केंद्र बंद हो रहे हैं और महिलाओं को न तो सुरक्षित गर्भधारण की सुविधा मिल पा रही है और न ही मिसकैरेज या अन्य जटिलताओं का इलाज।
क्लीनिक बंद, दवाएं नष्ट, इलाज ठप (Taliban Ban Contraceptive Pills)
बदगीस प्रांत की एक निजी क्लीनिक में तालिबान की ओर से चेतावनी दी गई और वहां मौजूद सभी गर्भनिरोधक दवाएं नष्ट कर दी गईं। कई जगहों पर डॉक्टरों को साफ कह दिया गया कि महिलाओं से जुड़ी ऐसी सेवाएं बंद करनी होंगी। जवजजान प्रांत में पिछले 30 साल से क्लीनिक चला रहीं एक महिला डॉक्टर बताती हैं कि तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद गर्भनिरोधक गोलियां तेजी से गायब हो गईं। पहले 70 में से करीब 30 महिलाओं को इन दवाओं की जरूरत पड़ती थी, लेकिन अब मजबूरी में उन्हें कहना पड़ता है कि “हमारे पास कुछ भी नहीं है।”
कंधार समेत कई प्रांतों में नियम और सख्त हैं। यहां महिलाओं को पुरुष डॉक्टरों से सीधे इलाज लेने पर भी रोक है, जबकि महिला डॉक्टरों की संख्या पहले ही बेहद कम है। इसका नतीजा यह है कि बीमार महिलाएं इलाज के लिए दर-दर भटक रही हैं।
तीन कहानियां, जो हालात की सच्चाई दिखाती हैं
इन पाबंदियों का असर आंकड़ों से ज्यादा इंसानी कहानियों में दिखता है। 36 साल की परवाना, जिनके नौ बच्चे हैं और छह बार मिसकैरेज हो चुका है, अब मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुकी हैं। कंधार के एक गांव में अपनी मां के घर बैठी परवाना अक्सर अपने बच्चों को भी पहचान नहीं पातीं। उनकी मां शरीफा कहती हैं कि लगातार डर और बार-बार की प्रेगनेंसी ने उनकी बेटी को अंदर से तोड़ दिया है।
42 साल की शकीबा, कंधार की रहने वाली हैं और 12 बच्चों की मां हैं। उनका कहना है कि अब शरीर जवाब देने लगा है। हड्डियों में लगातार दर्द रहता है, लेकिन पति किसी भी तरह के गर्भनिरोधक के खिलाफ हैं।
29 साल की जरघोना की कहानी और भी डराने वाली है। भूकंप के बाद वे तंबू में रहने को मजबूर हो गई थीं। खराब हालात की वजह से उन्हें गंभीर आंत की बीमारी हो गई। डॉक्टरों ने चेताया था कि अगर दोबारा गर्भ ठहरा तो जान को खतरा हो सकता है। बावजूद इसके, एक साल बाद वे फिर गर्भवती हुईं। बच्चे को जन्म तो दे दिया, लेकिन अब लगातार रक्तस्राव से जूझ रही हैं।
स्वास्थ्य सेवाएं लगभग खत्म, फंडिंग भी घटी
संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय फंडिंग में कटौती के चलते पिछले साल 440 से ज्यादा अस्पताल और क्लीनिक बंद हो चुके हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कई-कई घंटे पैदल चलकर इलाज के लिए पहुंचती थीं, लेकिन अब वहां भी ताले लटके हैं।
नतीजा यह है कि बड़ी संख्या में महिलाएं घर पर ही बच्चों को जन्म दे रही हैं, वो भी बिना किसी मेडिकल सहायता के। रिपोर्ट्स बताती हैं कि गर्भवती और स्तनपान कराने वाली करीब 80 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं। एनीमिया, विटामिन की कमी और लो ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं आम हो चुकी हैं।
महिलाओं पर पहले से लगी हैं सख्त पाबंदियां
गर्भनिरोधक पर रोक कोई पहला कदम नहीं है। तालिबान पहले ही महिलाओं की जिंदगी के लगभग हर पहलू पर प्रतिबंध लगा चुका है।
- शिक्षा: 12 साल से ऊपर की लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा की अनुमति नहीं है। कई प्रांतों में लड़कियों के स्कूल पूरी तरह बंद हैं।
- कामकाजी महिलाओं पर रोक: सरकारी और निजी क्षेत्रों में महिलाओं की नौकरियां छिन चुकी हैं। डॉक्टर, नर्स और शिक्षिकाएं भी प्रभावित हुई हैं।
- आवाजाही और पहनावा: महिलाएं बिना पुरुष अभिभावक के घर से बाहर नहीं जा सकतीं। चेहरा ढकना अनिवार्य है। संगीत, खेल और मनोरंजन में उनकी भागीदारी पर भी रोक है।
2024 में बोलने पर भी लगाई गई थी रोक
27 अगस्त 2024 को तालिबान ने एक और सख्त आदेश जारी किया था, जिसमें महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर बोलने से मना कर दिया गया। साथ ही शरीर और चेहरे को मोटे कपड़ों से ढकना अनिवार्य कर दिया गया। अंग्रेजी अखबार द गार्जियन के मुताबिक तालिबान का तर्क था कि महिलाओं की आवाज से भी पुरुषों का ध्यान भटक सकता है।
तालिबान के सुप्रीम लीडर मुल्ला हिबातुल्लाह अखुंदजादा ने इन नियमों को मंजूरी दी थी। इन्हें हलाल और हराम की श्रेणियों में बांटा गया। इस फैसले की संयुक्त राष्ट्र और कई मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी आलोचना की थी।
2021 से लगातार सख्ती
15 अगस्त 2021 को तालिबान के दोबारा सत्ता में आते ही महिलाओं पर पाबंदियों का सिलसिला शुरू हो गया था। पहले नौकरियां छीनी गईं, फिर पढ़ाई पर रोक लगी। आज हालात यह हैं कि अफगानिस्तान में महिलाएं सिर्फ छठी कक्षा तक ही पढ़ सकती हैं।
महिलाओं के साथ-साथ तालिबान ने कई ऐसे कानून भी लागू किए हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय मानवाधिकारों के खिलाफ मानता है। सार्वजनिक जगहों पर सजा देना भी इन्हीं में शामिल है।
शरिया कानून की आड़ में फैसले
तालिबान का कहना है कि वह देश में शरिया कानून लागू कर रहा है। शरिया इस्लामिक कानूनी व्यवस्था है, जो कई मुस्लिम देशों में किसी न किसी रूप में मौजूद है। हालांकि पाकिस्तान जैसे देशों में यह पूरी तरह लागू नहीं है। शरिया में पारिवारिक, वित्तीय और सामाजिक नियम शामिल होते हैं, और शराब या नशे जैसे मामलों में सख्त सजा का प्रावधान है।
लेकिन अफगानिस्तान में जिस तरह से शरिया की व्याख्या की जा रही है, उसने महिलाओं की जिंदगी को और मुश्किल बना दिया है। गर्भनिरोधक गोलियों पर लगी रोक इसी का ताजा उदाहरण है, जिसने पहले से जूझ रही अफगान महिलाओं के लिए दर्द और डर दोनों बढ़ा दिए हैं।
