गोडसे ने आखिर महात्मा गांधी को क्यों मारा था? ये थी हत्या करने की असल वजह

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 30 जनवरी 2022, 05:30 AM Updated: 30 जनवरी 2022, 05:30 AM
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महात्मा गांधी की हत्यारे नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर 1949 को फांसी दे दी गई थी। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी के सीने पर तीन गोलियां दागकर उनकी हत्या की थी। पर हत्या करने और हत्यारे की फांसी हो जाने तक के पूरे अंसिडेंट के बाद एक सवाल जोर पकड़ता है कि आखिर क्यों नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी,  इसके लिए गोडसे के पास कौन सी बड़ी और असली वजह थी। चलिए इसके बारे में ही विस्तार से जानते हैं…

क्या आपको पता है कि गोडसे के पहले प्रेरणास्रोत गांधी ही थे इस तरह की बातें सामने आती रही हैं। पर फिर गांधी के प्रति ये समर्थन धीरे धीरे नफरत में तब्दील हो गया। नाथूराम गोडसे 1910 में 19 मई महाराष्ट्र के पुणे के पास ही स्थित बारामती में पैदा हुए जो कि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए कट्टर हिन्दू समर्थक था। पहली बार गांधी के सत्याग्रह आन्दोलन की वजह से जब गोडसे जेल गए तो वहीं से नाथूराम के मन में गांधी के लिए नफरत के भाव उभर आए।

कई ऐसे पल भी आए जब यह नफरत और बढ़ता गया और फिर 1937 में वीर सावरकर को गोडसे ने अपना गुरु माना। देश के बंटवारे से गोडसे हिल चुका था। उसके अंतिम बयान से तो ऐसा ही लगता है। दरअसल, कहते हैं कि देश के बंटवारे से गोडसे distressed था। बंटवारे की वजह से उसके मन में गांधी के लिए नफरत और बढ़ गयी। फिर जुलाई 1947 को तो गोडसे, उसके साथियों और एक एक हिंदूवादी नेताओं ने तो इसके लिए  शोक दिवस तक मना डाला। ऐसा इस वजह से क्योंकि तमाम संगठनों के साथ ही गोडसे मानता था कि भारत के बंटवारे और तब जो साम्प्रदायिक हिंसा हुई उसमें लाखों हिन्‍दुओं के मारे जाने के जिम्मेदार महात्मा गांधी हैं।

ऐसे में उन लोगों ने गांधी की हत्या की पूरी प्लानिंग की और दिल्ली के बिड़ला भवन में जब प्रार्थना सभा खत्म हुई तो महात्मा गांधी बाहर निकलने लगे और इसी दौरान उनके पैर छूने का बहाना करते हुए गोडसे झुका और  बैरेटा पिस्तौल से उनको तीन गोलियां दाग दीं। फिर चौथी गोली नारायण दत्तात्रेय आप्टे ने दागी जो गोडसे के साथी थे, जिसके बाद गांधी जी की जान चली गयी और जिन्होंने गोलियां चलाई वो वहीं खड़े रहे। तत्काल पुलिस ने गोडसे और आप्टे को धर लिया।

मुकदमा चलाने के बाद साल 1949 के 15 नवंबर को अंबाला जेल में फांसी की सजा दोनों ही अपराधियों को दे दी गयी। कहते हैं कि गोडसे को बकौल, डोमिनिक लॉपियर इसके अलावा लैरी कॉलिन्स, पेरी मेसन की जासूसी कहानियां पढ़ने का शौक था। वो बहादुरी के कारनामों पर बेस्ड फिल्में देखा करता था।

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