Komagata Maru Tragedy: कोमागाटा मारू 1914 की वो घटना जिसने कनाडा और भारत के रिश्तों को बदल दिया

Shikha Mishra | Nedrick News Canada Published: 18 फ़रवरी 2026, 06:00 PM Updated: 18 फ़रवरी 2026, 06:00 PM
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Komagata Maru Tragedy: 18 मई 2016 कनाडा के संसद, हाउस ऑफ कॉमन्स में काफी हलचल थी क्योंकि करीब 102 साल के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने एक आधिकारिक माफी की घोषणा की। ये माफी उस घटना के लिए थी जिसमें कनाडा की जिद के कारण सिखो का नरसंहार हुआ था। ये नरसंहार जिसे आज कोमागाटा मारू के नाम से जाना जाता है, एक ऐसी घटना जिसमें प्रवासी सिखो को ब्रिटिश सेना ने गोलियों से भून दिया था।

लेकिन सवाल ये है कि आखिर करीब 100 साल बीत जाने के बाद कनाडा को इस गलती के लिए माफी क्यों मांगनी पड़ी थी। अपने इस वीडियो में हम कोमागाटा मारू की उस दर्दनाक नरसंहार के बारे में जानेंगे… साथ ही आखिर कैसे कनाडा इस नरसंहार की वजह बना था। और क्यों अपने ही देश लौटे सिखो पर अंग्रेजी हुकूमत ने ये कहर बरपाया था।

कनाडा का नया रेगिलेशन बना वजह

8 जनवरी साल 1908..इस दिन कनाडा की सरकार प्रवासियों के देश में प्रवेश को लेकर एक नियम लेकर आई थी। इस रेगुलेशन के अनुसार उन प्रवासियों की एंट्री पर बैन लगाया गया जो अपने जन्म या नागरिकता वाले देश से लगातार यात्रा करके या अपने जन्म या राष्ट्रीयता के देश को छोड़ने से पहले टिकट खरीद कर नहीं आए थे”यात्रा विनियमन ने भारतीय प्रवासियों को बाहर रखा गया था, ये प्रतिबंध संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और एशिया से कनाडा में महत्वपूर्ण आप्रवासन के बीच लागू किए गए थे, लेकिन बावजूद इसके कोमागाटा मारू में यात्रा कर रहे भारतीय प्रवासियो को कनाडा में एंट्री नहीं दी जो असल में कनाडा की नस्लीय भेदभाव वाली इमिग्रेशन पॉलिसी का ही हिस्सा था.. यहीं पॉलीसी नरसंहार का कारण बना।

कैसे लिखी गई नरसंहार की कहानी

साल 1914 का समय था.. जापान का एक जहाज कोमागाटा मारू वैंकूवर, ब्रिटिश कोलंबिया कनाडा के तटीय क्षेत्र पर पहुंचा था। सभी यात्री कनाडा में प्रवेश चाहते थे, लेकिन कनाडा की लागू की गई प्रवासी नियम के कारण करीब 376 प्रवासी लोगों को कनाडा में एंट्री ही नहीं दी गई। जिसमें 340 सिख, 24 मुस्लिम और 12 हिंदू थे, जो कि सभी पंजाब प्रांत, ब्रिटिश इंडिया से आये हुए थे, रिपोर्ट बताती है कि ये यात्री हमेशा यात्रा किया करते थे, लेकिन तब भी केवल 24 यात्रियों को उतरने की इजाज़त दी गई थी, और बाकियों को वापिस भेजने का फरमान सुनाया गया।

इंडियन इंपीरियल पुलिस ने आंदोलनकारी

23 जुलाई 1914 जहाज को वापिस भारत लौटने को कहा गया, औऱ जहाज नौसेना के एस्कॉर्ट के तहत भारत की तरफ मुड़ गया। ये वो समय था जब गदर पार्टी के लोग ब्रिटिश सेना के विरोध में काफी संक्रिय थे, इसलिए 27 सितंबर 1914 को जब कोमागाटा मारू जहाज कलकत्ता के पास बज बज पहुंचा, तब इंडियन इंपीरियल पुलिस ने आंदोलनकारी होने के शक के आधार पर ग्रूप के लीडर को गिरफ्तार करने का फरमान सुनाया। उन्हें शक था कि गोरे और साउथ एशियन रेडिकल इस घटना का इस्तेमाल पैसिफिक नॉर्थवेस्ट में साउथ एशियन लोगों के बीच बगावत करने के लिए कर रहे थे, और ये लोग कानून तोड़ने वाले ही है, जो असल में आंदोलनकारी ही है।

आम लोगो ने उनका समर्थन करने से इंकार कर दिया

इसलिए उनके लीडर बाबा गुरदित सिंह समेत कई लोगो को गिरफ्तार करने की कोशिश की गई, लेकिन यहां झड़प हो गई, और ब्रिटिश पुलिस ने अंधाधुंद गोलिया चलाना शुरु कर दिया। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार केवल 20 लोग गोलीबारी में मारे गए थे, जबकि कुछ फरार हो गये थे और ज्यादातर को जेल में डाल दिया गया, या फिर जो छूटे उन्हें उनके ही घर में नजरबंद रखा गया था।

वहीं सरगना गुरदित सिंह संधू भागने में कामयाब रहा था और 1922 में महात्मा गांधी के कहने पर उसने सरेंडर किया था, जिसे 5 साल की सजा हुई था। हालांकि कोमागाटा मारू में जो हुआ, उसका फायदा ग़दर आंदोलन के लिए सदस्यों को इकट्ठा करने के लिए किया, और एक बड़े विद्रोह को कोऑर्डिनेट करने के लिए भी क्या था, लेकिन आम लोगो ने उनका समर्थन करने से इंकार कर दिया था जिससे उनकी प्लानिंग फेल हो गई थी, लेकिन प्रवासियों को वापिस भेजना, कनाडा के नस्लिय विरोधी नीतियों को उजागर कर गया था।

शहीदो के लिए सम्मान

कोमागाटा मारू में जो शहीद हुए, वो किसी आंदोलन का हिस्सा नहीं थे, वो कनाडा की चाल का शिकार पीड़ित थे, लेकिन अंग्रेजो ने बिना जांच के उन पर गोलियां चलाई, जिसका अफसोस अब भी कनाडा की सरकार जताती है, लेकिन मारे गए शहीदों की याद में साल 1952 में बज बज के पास कोमागाटा मारू शहीदों के लिए एक मेमोरियल बनवाया था, जिसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था। जो कि असल में पंजाब के सिखों को समर्पित करते हुए आसमान की ओर उठते हुए कृपाण (सिख खंजर) जैसा बनाया गया है, और ये पंजाबी मॉन्यूमेंट के नाम से प्रचलित है।

वहीं जून 2012 में खालसा दीवान सोसाइटी वैंकूवर रॉस स्ट्रीट टेम्पल में कोमागाटा मारू म्यूज़ियम शुरु किया गया था। कोमागाटा मारू में जो कुछ भी घटित हुआ उसे दुनिया को समझाने के लिए 2025 में गुरु नानक जहाज़ नाम की एक फ़िल्म भी बनाई गई थी। कोमाराटा मारू, इतिहास के उन घटनाओं में से एक है, जो नस्लभेदी भेदभाव के कारण नरसंहार में बदल गया। अगर कनाडा ने ये भेदभाव न किया होता तो शायद ये नरसंहार न होता.. आज भले ही कनाडा सिखों बहुल देश है, लेकिन कोमागाटा मारू जैसी घटनायें कहीं न कहीं सिखों को अभी भी एक जख्म दे जाती है। कनाडा के प्रधानमंत्री की माफी बताती है कि 1914 में जो हुआ वो वाकई में भारतीय प्रवासियों के साथ अन्नाय था।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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