बढ़ती टेंशन: Omicron से जुड़ी वो सभी बातें, जिनके बारे में आपके लिए जानना जरूरी!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 24 दिसम्बर 2021, 05:30 AM Updated: 24 दिसम्बर 2021, 05:30 AM
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पिछले करीब दो साल से कोरोना ने पूरी दुनिया को तबाह किया हुआ है। पिछले 100 सालों की ये सबसे घातक महामारी के तौर पर देखी जा रही है। अब इस वायरस का ओमीक्रोन वेरिएंट का खतरा भी बढ़ता दिखाई दे रहा है। कैसे ये खतरा बढ़ रहा है इसे इस तरह समझ सकते हैं कि 2 दिसंबर को भारत में पहला मामला देखा गया और महज 21 दिन में ही ओमीक्रोन के केस में बढ़ोत्तरी हुई और ये 290 तक पहुंच गया। अंदेशा है कि देश में ओमीक्रोन ही कोविड की तीसरी लहर के पीछे हो सकता है । इससे पहले दूसरी लहर के आने और कहर बरपाने का जो कारण बना वो डेल्‍टा वेरिएंट रहा। 

नए वेरिएंट के खतरे को देखें तो इससे जुड़ी जो तैयारियां है उसको भी सरकारों की तरफ से शुरू कर दी है लेकिन आखिर में जनता तो भी सावधानियां बरतनी होंगी और कोविड संबंधी प्रोटोकॉल को मानने चाहिए। आज ओमीक्रोन से जुड़े कुछ सवालों पर हम गौर करेंगे और उनके जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे।

ओमीक्रोन को देखते हुए किस तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं?

केंद्र सरकार की तरफ से राज्‍यों को कहा गया है कि वे खतरे को देखते हुए पाबंदियां लगाएं। राजधानी दिल्‍ली के साथ कई ऐसे राज्य है, जहां पर पब्लिक प्‍लेस में क्रिसमस और न्‍यू ईयर सेलिब्रेशन पर पाबंदी है। कर्नाटक, तमिलनाडु, उड़ीसा, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सख्‍ती बढ़ी है। वहीं यूपी समेत कई राज्यों में फिर से नाइट कर्फ्यू भी लगा दिया गया

ओमीक्रोन मरीजों के लक्षण क्या हैं?

पिछले हफ्ते लंदन में कोविड स्टडी पर हेल्थ साइंस कंपनी Zoe और किंग्स कॉलेज ने डेटा जारी किया। यूके में ओमीक्रोन वैरिएंट की वजह से कोरोना के केस में बढ़ोत्तरी हुई। इस बारे में कहा गया कि ओमीक्रोन के पांच प्रमुख लक्षणों की बात की जाए तो ये है नाक बहना, सिरदर्द, थकावट.. ये थकान हल्की या ज्यादा हो सकती है। छींक आना और गले में खराश होना भी इसके लक्षण है।

देश के बड़े डॉक्टर्स की तरफ से इस वेरिएंट को लेकर क्या कहा गया है?

भारत के टॉप हेल्‍थ एक्‍सपर्ट्स की माने तो ये समय बेहद अहम है। अगर हमने लापरवाही की तो बुरे नतीजे आ सकते हैं। 

बूस्‍टर डोज के बिना क्‍या ओमीक्रोन से बचाव किया जा सकता है? 

एक्‍सपर्ट्स ने बताया है कि ओमीक्रोन से बचाव के लिए वैक्‍सीनेशन जरूरी है। फिलहाल के रिसर्च कहते हैं कि डेल्‍टा से ज्‍यादा संक्रामक ये वाला वेरिएंट है पर हो ये सकता है घातक कम हो। वैसे हेल्थ एक्सपर्ट लगातार ये कहते जा रहे हैं कि पहले के कोविड इन्‍फेक्‍शन से जो इम्‍युनिटी बनी है या तो वैक्‍सीन की दो डोज लगने के बाद इम्‍युनिटी जेनेरेट हुई हो ओमीक्रोन से लड़ने में उसकी काफी जरूरत पड़ेगी। परेशानी इस बात की है कि कुछ वक्त बाद यानी कि 3 से 6 महीने बाद ये जो इम्‍युनिटी है उसमें कमी आने लगती है। कारण यही है बूस्‍टर डोज पर जोर देने का। 

कई देश तो बूस्‍टर डोज देने की शुरुआत भी कर चुके हैं। 60 साल के ऊपर के लोगों को तो इजरायल में तो दूसरी बूस्‍टर डोज देने की शुरुआत हो भी चुकी है यानी डोज की संख्या टोटल 4 हो चुकी है।

ओमीक्रोन वेरिएंट के सामने आते ही चर्चाएं बूस्‍टर डोज की होने लगी है तो सवाल है कि भारत में ये बुस्टर डोज कब से लगेगी? 

देखिए फिलहाल तो इस संबध में कोई फैसला नहीं हुआ है। एक्‍सपर्ट्स तो बूस्‍टर डोज के संबंध में एक फैसले पर पहुंचने की मांग कर ही रहे हैं। नेताओं ने भी इस बारे में मांग उठानी शुरू कर दी है। नेताओं और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरफ से केंद्र सरकार को कहा गया कि बूस्‍टर डोज देने का वक्‍त आ गया है। 

ओमीक्रोन पर असर करने वाली किसी Pill की चर्चा हो रही है उस बारे में जान लेते हैं।

यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन FDA की तरफ से फाइजर की पैक्सलोविड कोविड-19 पिल को 22 दिसंबर को मंजूरी दे दी गई। जो कि 12 साल या फिर उससे ज्यादा की उम्र लोगों को दी जा सकती है जो कि हाई-रिस्क वाले कोरोना से संक्रमित हो। हालांकि किसी भी दवाई या पिल के संबंध में हम किसी भी तरह की पुष्टि नहीं करते हैं। 

अमेरिकी ड्रग निर्माता कंपनी फाइजर ने कहा है कि कोरोना के खिलाफ उनकी एंटीवायरल कोविड पिल 90% असरदारी है। ऐसे दावे से हाई रिस्क वाले मरीज को मौत से या फिर हॉस्पिटल में एडमिट किए जाने से बचाया जा सकता है। लैब डेटा के हिसाब से यह दवा कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन पर भी कारगर हुई है।

अगला सवाल लेते हैं- दक्षिण अफ्रीका की एक स्टडी ओमिक्रॉन के संबंध में क्या सामने आया? 

दक्षिण अफ्रीका की एक स्टडी में पाया गया कि डेल्टा की अपेक्षा ओमीक्रोन से संक्रमित लोगों में हॉस्पिटलाइज होने का खतरा कम है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक डेल्टा की अपेक्षा ओमीक्रोन के मरीज के लिए हॉस्पिटलाइज होने का खतरा 80% कम था। अस्पताल में गंभीर बीमारी का खतरा करीब करीब 30% कम था।

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