Jammu & Kashmir: अपने फैसलों के ‘गुलाम’ हो गए गुलाम नबी आजाद, न घर के रहे न घाट के!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 01 अक्टूबर 2024, 05:30 AM Updated: 01 अक्टूबर 2024, 05:30 AM
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कहा जाता है कि आप राजनीति में जितना ज्यादा समय बिताते है…उतने ही अनुभवी और परिपक्व नेता बनते हैं…कब, कहां और क्या नहीं बोलना है..यह आप सीख जाते हैं…शरद पवार, शंकरन अच्युतानंदन और नवीन पटनायक जैसे अन्य कई नेता इसके साक्षात उदाहरण हैं…इस लिस्ट में दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद का नाम भी होता लेकिन उनके कई फैसलों ने उनके अनुभव का गुड़ गोबर कर दिया…50 सालों का उनका राजनीतिक अनुभव धरा का धरा रह गया और आज के समय में स्थिति ऐसी हो गई है कि न तो गुलाम नबी आजाद को कोई पूछ रहा है…न ही उनकी पार्टी को कोई पूछ रहा है और न ही उनके साथ कोई खड़ा होना चाहता है.

50 सालों तक कांग्रेस की वफादारी के बाद पिछले 2 सालों में उनके ऊपर बीजेपी का मुखबिर होने का जो टैग लगा, उससे सबकुछ बर्बाद हो गया…अब गुलाम नबी आजाद को न रातों में नींद आती है और न ही उनमें पहले जैसा जोश दिखता है….आखिर जम्मू कश्मीर के सीएम से लेकर केंद्र सरकार में कई बार मंत्रालय संभालने वाले आजाद ने कहां गलती कर दी कि आज जम्मू कश्मीर में उनका वजूद भी खत्म होने के कगार पर खड़ा है. इस लेख में मैं आपको एक कथित अनुभवी और अपरिपक्व नेता गुलाम नबी आजाद के बर्बाद होने के पीछे की कहानी बताऊंगा.

गुलाम नबी आजाद और कांग्रेस

गुलाम नबी आजाद हमेशा से ही कांग्रेस के सबसे करीबी नेताओं में से एक रहे…इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव से लेकर मनमोहन सरकार में भी उन्हें अहम  मंत्रालय का जिम्मा दिया गया…इसके अलावा कांग्रेस ने उन्हें जम्मू कश्मीर का सीएम भी बनाया…अपने 50 साल के राजनीतिक करियर में गुलाम नबी आजाद सिर्फ 4 बार ही चुनाव जीतने में कामयाब रहे…इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें 5 बार राज्यसभा सांसद बनाया…राज्यसभा में विपक्ष का नेता बनाया…पार्टी में कई अहम पद दिए लेकिन समय के साथ आजाद, आजाद नहीं रहे…भावनाओं ने उन्हें मानसिक तौर पर जकड़ लिया था…उनकी भावनाएं उनके अनुभव पर भारी पड़ रही थी…

साल 2021 में गुलाम नबी आजाद का पांचवा राज्यसभा कार्यकाल खत्म हुआ था…देश में बदल रही राजनीतिक हवा को देखते हुए कांग्रेस अब उनके विकल्प की तलाश कर रही थी..बस गुलाम नबी आजाद को यही बात बुरी लग गई और यही से कांग्रेस के जी-23 गुट की बयानबाजियां शुरु हो गई…कांग्रेस का यह गुट अपने ही नेताओं और पार्टी के फैसलों पर सवाल खड़ा करने लगा…भाजपा ने भी इसका पूरा फायदा उठाया और मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जी-23  नेताओं को तोड़ने के प्रयास भी होने लगे.

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5 पन्ने में समेट दिया 5 दशक की वफादारी

कहा जाता है कि जब कांग्रेस पार्टी ने गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा न भेजने का डिसीजन ले लिया…उसी दौरान आजाद ने 26 अगस्त 2022 को कांग्रेस पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र देते हुए 5 पन्नों का अपना इस्तीफा सोनिया गांधी को भेज दिया…कांग्रेस में बिताए अपने 5 दशक को उन्होंने 5 पन्नों में समेट दिया..साथ ही आजाद ने अपनी राजनीतिक पार्टी डेमोक्रेटिक प्रगतिशील आज़ाद पार्टी का गठन भी कर दिया..यहां तक सारी चीजें ठीक थी लेकिन सवाल तब उठे, जब गुलाम नबी आजाद के 5 पन्ने के इस्तीफे में इस्तेमाल की गई भाषा पर गौर किया गया.

अपने पत्र में ग़ुलाम नबी आज़ाद ने राहुल गांधी के व्यक्तित्व और नेतृत्व को निशाने पर लिया और कहा कि ‘जैसे मनमोहन सिंह की सरकार रिमोट कंट्रोल से चलती थी वैसे ही कांग्रेस पार्टी रिमोट कंट्रोल से चल रही है.’ उन्होंने आरोप लगाया था कि पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की बात नहीं सुनी जाती और अधिकतर फ़ैसले राहुल गांधी और उनके क़रीबी ‘पीए और गार्ड’ लेते हैं…इसके साथ ही पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए थे…कहा जाता है कि जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल गुलाम  नबी आजाद ने अपने पत्र में किया था…वैसी तल्ख भाषा का इस्तेमाल आज तक सिर्फ हिमंता बिस्वा सरमा और सुनील जाखड़ ने ही कांग्रेस छोड़ते वक्त की थी…उस दौर में ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह और जितिन प्रसाद ने भी पार्टी छोड़ी थी, लेकिन किसी ने भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया.

गुलाम नबी आजाद का नहीं रहा है अपना जनाधार

इस्तीफे में प्रयोग की गई उनकी भाषा भी उनके अनुभव से मेल खाती नहीं दिखी…राजनीतिक विश्लेषकों ने भी भाषा के प्रयोग के स्तर पर उनकी आलोचना की थी. कई  लोगों ने तो ये भी कहा कि उन्होंने राहुल गांधी पर व्यक्तिगत आरोप लगाए. राहुल गांधी का जो तरीक़ा है वो अपमानजनक था, ये बात सच हो सकती है, लेकिन ये कहना है कि आज कांग्रेस वैसे ही रिमोट कंट्रोल से चल रही है जैसे मनमोहन सिंह की सरकार रिमोट कंट्रोल से चलती थी, वो स्वयं मंत्री थे मनमोहन सिंह की सरकार में, इसलिए उनका ये कहना शोभा नहीं देता था. अगर उस वक़्त सरकार रिमोट कंट्रोल से चल रही थी तो उनको खड़े होकर इसका विरोध करना चाहिए था…लेकिन आजाद तब सत्ता की मलाई चाट रहे थे…

गुलाम नबी आजाद के पार्टी छोड़ते ही जम्मू कश्मीर के कई दिग्गज कांग्रेसी नेता आजाद के पीछे चल पड़े और उनकी पार्टी में शामिल हो गए…दूसरी ओर गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे के बाद भाजपा ने आधिकारिक तौर पर उन्हें अपने पाले में करने की तैयारी शुरु कर दी…जो आजाद कांग्रेस में रहते…मोदी को जमकर कोसते थे…वो आजाद अब मोदी के गुणगान में लगे हुए थे…इसी दौरान मोदी सरकार की ओर से आजाद को पद्म भूषण देने का ऐलान कर दिया…आजाद को पद्म भूषण मिला…सोनिया गांधी ने भी उन्हें बधाई दी…अब समय आ चुका था लोकसभा चुनाव 2024 का.

बिना जनाधारा वाले आजाद की बिना जनाधार वाली पार्टी ने जम्मू कश्मीर में लोकसभा चुनाव 2024 लड़ा और पार्टी की सभी 3 सीटों पर भय़ंकर हार हुई…कुछ सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की जमानत भी जब्त हो गई…चुनावों से पहले उनकी पार्टी ने घोषणा की थी कि आज़ाद अनंतनाग-राजौरी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे लेकिन जैसी ही आजाद को जमीनी स्थिति का एहसास हुआ उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी…फिर क्या था कांग्रेस के जो नेता आजाद के इस्तीफे के साथ ही उनके साथ चले गए थे…एक-एक कर के वे छिटकने लगे…जम्मू कश्मीर में आजाद की जमीन पर स्थिति क्या है और वह कितना इंपैक्ट डाल सकते हैं…लोकसभा चुनाव 2024 में इसका लेखा जोखा भी सामने आ गया.

अपने फैसलों के बोझ तले दब गए हैं आजाद

धीरे धीरे सभी आजाद से दूरी बनाने लगे…मौजूदा समय में आजाद को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई बड़ा नेता उनकी पार्टी में बचा है…कांग्रेस से इस्तीफे के समय जो भाजपा नेता आजाद की तारीफ में कसीदे पढ़ा करते थे…वे भाजपा नेता अब तो उनका नाम भी नहीं लेते…जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में आजाद की पार्टी 19 सीटों पर चुनाव लड़ रही है…आज तीसरे चरण की अंतिम वोटिंग है…लेकिन किसी भी सीट पर आजाद की हवा चलती नहीं दिख रही है…स्थिति ऐसी भी नहीं है कि वो किसी राजनीतिक पार्टी को नुकसान पहुंचा पाएं…आपको बता दें कि इस चुनाव में आजाद ने चुनाव प्रचार भी नहीं किया…चुनाव प्रचार में उनकी पार्टी का हश्र क्या होगा…उन्हें बखूबी पता है…पिछले महीने ही स्वास्थ्य का हवाला देते हुए उन्होंने खुद को चुनाव प्रचार से अलग कर लिया था…

ओवरऑल अगर देखा जाए तो गुलाम नबी आजाद को कांग्रेस ने बनाया…आजाद तेजतर्रार नेता रहे लेकिन अपना जनाधार नहीं बना पाए, इसके बावजूद कांग्रेस उन्हें आगे बढ़ाते रही..लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 में हार के बाद जब कांग्रेस पार्टी अपने बुरे दौर से गुजर रही थी…उस दौरान आजाद ने कथित तौर पर बहकावे में आकर पार्टी का साथ छोड़ दिया…उन्हें लगा कि अपनी पार्टी बनाकर वह जम्मू कश्मीर में अपना परचम लहरा सकते हैं लेकिन आजाद गलत थे… उनपर बीजेपी का मुखबिर होने का टैग लगा…आजाद ने इस टैग को उतार फेंकने के लिए भी कुछ खास कदम नहीं उठाएं और न ही जम्मू कश्मीर में जमीनी स्तर पर उनकी उतनी सक्रियता दिखी…यही कारण है कि एक समय पर कांग्रेस की राजनीति के ध्रुव माने जाने वाले गुलाम नबी आजाद आज अपने ही फैसलों के बोझ तले दब गए हैं.

ऐसा अनुभव किस काम का!

बता दें कि जी-23 कांग्रेस पार्टी से रुष्ट नेताओं का एक समह था.., गुलाम नबी आजाद के बाद कांग्रेस ने जी-23 नेताओं को अल्टीमेटम दिया था और आज के समय में स्थिति ऐसी है कि जी-23 शायद एग्जिस्ट भी नहीं करता है…कांग्रेस पार्टी ने भी पिछले कुछ सालों में जबरदस्त वापसी की है…कई राज्यों में पार्टी ने सरकार भी बनाई है तो वही लोकसभा चुनाव 2024 में कांग्रेस अलग ही जोश में दिखी…मौजूदा समय में गुलाम नबी आजाद के दिमाग में भी ये सारी चीजें चल रही होंगी…उनकी महत्वाकांक्षाएं अभी भी हिलोरे ले रही होंगी..वो अभी भी खुद को अहम पदों पर देखना चाह रहे होंगे लेकिन आजाद, अपने फैसलों के गुलाम हो गए, जिसके कारण उनका राजनीतिक करियर स्वाहा हो गया..ऐसे में भविष्य में जब भी देश के अनुभवी नेताओं का जिक्र होगा, उसमें आजाद का नाम कोई नहीं लेगा.

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