Holi 2022: प्रह्लाद-होलिका से हटकर…होली के त्योहार से जुड़ी और भी कई पौराणिक कथाएं, जो है बेहद रोचक!

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 16 मार्च 2022, 05:30 AM Updated: 16 मार्च 2022, 05:30 AM
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भारत को त्योहारों का देश कहकर पुकारा जाता है। यहां हर धर्म और सभ्यता के लोग अपने अपने त्योहार सेलिब्रेट करते हैं। वैसे तो हर महीने में ही कोई ना कोई त्योहार आ ही जाता है। लेकिन कुछ फेस्टिवल को लेकर लोगों में अलग ही एक्साइटमेंट देखने को मिलती है। इनमें से एक त्योहार है होली का। 

रंगों का त्योहार होली हमारे देश के प्रमुख फेस्टिवल में से एक हैं। इसको लेकर काफी दिनों पहले ही रौनक देखने को मिल जाती है। लोग घरों में पापड़-गुजिया बनाने लगते हैं। वहीं बाजार भी एकदम कलरफुल हो जाते हैं। 

हर साल वसंत ऋतु में होली का त्योहार मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक होली फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। वहीं इंग्लिश कलेंडर की बात करें तो होली अधिकतर मार्च के महीने में ही आती है। इस बार होली का त्योहार 18 मार्च शुक्रवार को पड़ रहा है, जबकि होलिका दहन 17 मार्च को होगा। 

होली को लेकर कई कई प्रचलित पौराणिक कथाएं हैं, जिसमें सबसे ज्यादा फेमस प्रह्लाद और होलिका की कथा है। इसके बारे में हम बचपन से सुनते-पढ़ते हुए आ रहे हैं। लेकिन इसके अलावा भी भी धर्म ग्रंथों में होली से जुड़ी कई कथाएं हैं, जिनके बारे में शायद आप ना जानते हो। आज हम आपको उन कथाओं के बारे में भी बताने जा रहे हैं…

राक्षसी ढुण्ढा का अंत 

राजा रघु के राज्य में एक राक्षसी जिसका नाम ढुण्ढा था, उसने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और वरदान हासिल कर लिया। इसके बाद राक्षसी ने लोगों को खास तौर पर बच्चों को परेशान करना शुरू कर दिया। राक्षसी से डरी हुई प्रजा ने अपने राजा रघु को इसके बारे में बताया। तब वशिष्ठ ऋषि ने महाराज रघु को इसके निराकरण का उपाय बताया। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि खेलते हुए बच्चों का शोर-गुल या हुडदंग राक्षसी की मृत्यु की वजह बन सकता है। इसके बाद फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सभी बच्चे इकट्ठे हो गए और नाचने-गाने, तालियां बजाने लगे। घास-फूस और लकड़ियों को इकट्ठा कर अग्नि लगाई और उसकी परिक्रमा करने लगे। बच्चों द्वारा ये सब करने से राक्षसी का अंत हुआ। इसके बाद इसे उत्सव के तौर पर मनाया गया।

श्रीकृष्ण-पूतना वध की कहानी 

होली के पीछे श्रीकृष्ण पूतना वध की स्टोरी भी काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि मथुरा के राजा कंस को अपने भांजे श्रीकृष्ण के हाथों मारे जाने का डर सता रहा था। इसलिए कंस ने कृष्ण को मारने के लिए पूतना नाम की एक राक्षसी को भेजा। पूतना ने योजना बनाई थी वो विषयुक्त स्तनपान कराकर बाल कृष्ण को मार देगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा। बालक कृष्ण ने उस दौरान पूतना का वध कर दिया। जिसके बाद लोगों ने रंगों के साथ कृष्ण के बचने का जश्न मनाया। मान्यताओं के मुताबिक जब कृष्ण जी ने पूतना को मारा था, तब फाल्गुन पूर्णिमा का दिन ही था। इसके बाद से ही होली का त्योहार मनाने की परंपरा शुरू हुई थी। 

भगवान शिव से जुड़ी कथा

होली से जुड़ी एक और इंटरेस्टिंग कथा है, भगवान शिव से जुड़ी। पौराणिक कथा के मुताबिक पार्वती जी भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं, लेकिन उस दौरान शिव शंकर भोलेनाथ की तपस्या में लीन थे। पार्वती जी की इसमें मदद प्रेम के देवता कामदेव ने की। कामदेव की वजह भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई और वो इससे क्रोधित हो गए।  उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया। ये देखकर कामदेव की पत्नी रति रोने लगीं और महादेव से पति के प्राण लौटाने की गुजारिश करने लगीं। भगवान शिव शांत हुए तो उन्होंने कामदेव को दोबारा जीवन दिया। कहा जाता है कि जिस दिन कामदेव भस्म हुए, उस दिन होलिका दहन किया जाने लगा। वहीं उसके अगले दिन उनको पुनर्जीवन मिला था, तो होली मनाई जाने लगी।

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