Guru Tegh Bahadur: भारत के 7 मशहूर नामों में से एक नाम हिंदुस्तान भी है, जो कि भारत के एक हिंदू सनातनी देश होने के कारण पड़ा था। हिंदुओ का राष्ट्र होने के कारण अरब एवं ईरान में इसे हिंद के नाम से बुलाया जाता था, हिंद से ये हिंदुस्तान बना..लेकिन क्या आप ये जानते है कि करीब 600 पहले उत्पन्न हुआ सिख धर्म सबसे तेजी से न केवल दुनिया भर में फैला बल्कि सिखों के ही दसों गुरुओं में से एक गुरु चादर ए हिंद के नाम से भी प्रचलित है। यानि की सिख धर्म इतना ज्यादा प्रभावी हुआ कि किसी हिंदू को इसकी उपाधि नहीं दी गई बल्कि एक सिख को चादर ए हिंद कहा गया..अपने इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर कौन है वो गुरु और क्यों दी गई उन्हें ये उपाधि।
गुरु का योगदान सिख धर्म के आगे बढ़ने
सिखो के दसों जीवित गुरुओं के जीवन के बारे में जब आप जानते है तो पाते है कि हर गुरु का योगदान सिख धर्म के आगे बढ़ने, उनके मानवता की सेवा करने, उनके बहादुरी और साहस के खड़े रहने और सिक्खी की रक्षा के लिए सिर कटाने के लिए भी तैयार रहने की सीख दी थी। उनके ज्ञान के साथ उनकी बलिदान की कहानी भी हर सिख को गर्व और सम्मान से भर देती है। उन्हीं में से एक गुरु हुए नौवे गुरु तेग बहादुर जी..गुरू तेग बहादुर जिन्होंने मानवता की रक्षा के लिए मुगलो से टकराने में भी कोई भय नहीं दिखाया।
धर्म परिवर्तन कराने की नीति खिलाफ
वो औरंगजेब की दमनकारी नीतियों और जबरन धर्म परिवर्तन कराने की नीति के सख्त खिलाफ थे, इस दौरान ही मुगलो की सेना ने गुरु साहिब को पकड़ लिया, उन्हें दिल्ली में तमाम यातनायें दी गई, गुरू साहिब को इस्लाम अपनाने का दवाब डाला गया लेकिन वो अपनी बात से टस से मस नहीं हुए और अंत में थक हार कर औरंगजेब ने गुरुसाहिब का 1675 को चांदनी चौक में सिर धड़ से अलग करवा दिया।
लेकिन गुरु साहिब के मुंह से एक आवाज नहीं निकली.. गुरु तेग बहादुर की शहादत ने सिखों में मानवअधिकारो की सुरक्षा को सिक्खी की पहचान बना दिया, वहीं उनके बेटे और दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह को प्रेरित किया कि वो सिख पंथ को एक साथ लेकर मजबूती दें साथ ही इस्लामिक कट्टरपंथियों के उत्पीड़न के खिलाफ सिखो का दृढ़ संकल्प और मजबूत हो गया था। गुरु तेग बहादुर को चादर ए हिंद नाम मिला था।
क्यों मिला चादर ए हिंद नाम
हिंद की चादर, जिसे शील्द ऑफ नेशन भी कहा जाता है, असल में गुरु तेग बहादुर को ये उपाधि कश्मीरी पंडितो ने दी थी, गुरु साहिब ने अपने पूरे जीवन में करीब 20 सालो तक तप किया था, उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब की दमनकारी नीतियों के खिलाफ न्याय की लड़ाई शुरु की थी, गुरु साहिब को धैर्य और त्याग की मूर्ति भी कहा जाता है, उन्होंने हिंदू धर्म में फैले अंधविश्वास को खत्म करने के लिए पूरा जीवन लगाया, उन्होंने बताया कि मानवता की रक्षा की परम धर्म है, इसके लिए जब उन्हें कश्मीरी पंडितो ने मुगलो की दमनकारी नीतियों और जबरन धर्म परिवर्तन करवाने की बात बताई तो वो बिना झिझक उनकी रक्षा करने के लिए निकल पड़े।
सिख गुरु से मदद मांगी
उन्होंने हिंदुओ के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए मुगलो के आगे ढाल की तरह खड़े रहने का काम किया था, इसलिए उन्हें हिंद की ढाल अथवा हिंद की चादर कहा गया था। ये बेहद हैरान करने वाली बात है कि मुगलों के खिलाफ हिंदुओ ने किसी हिंदू ताकतवर व्यक्ति से नहीं बल्कि सिख गुरु से मदद मांगी थी, क्योंकि हिंदी कश्मीरी पंडितो को भी इस बात का विश्वास था कि उनके लिए केवल सिख ही लड़ सकते थे। हिंदुओ के धर्म की रक्षा के लिए गुरू साहिब ने जान के बदले धर्म बदलना नामंजूर कर दिया..उन्होंने सीधे जवाब देते हुए कहा कि वो धर्म की रक्षा के लिए सिर कटाना मंजूर करेंगे लेकिन केश नहीं.. जिससे गुस्सायें औरंगजेब ने गुरु साहिब का सिर कलम करवा दिया था।
आज भी दिल्ली के चांदनी चौक में स्थित गुरुद्वारा शीशगंज साहिब गुरू साहिब की शहादत की कहानी कह रहा है। हिंदुस्तान में इस्लामिक शासको से धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर को चादर ए हिंद की उपाधि हिंदुओं ने ही दी थी। नौवे गुरु साहिब की ये साहसिक कहानी आपको कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।
