शिव भक्त कैसे बने गुरु नानक के बेटे? जानिए इसके पीछे की वजह – Baba Sri Chand life story

Shikha Mishra | Nedrick News Punjab Published: 04 Apr 2026, 11:39 AM | Updated: 04 Apr 2026, 11:39 AM

Baba Sri Chand life story: सिखो के आदि गुरु गुरु नानक देव जी का जन्म सन 1469 में हुआ था, तो वहीं 18 साल की उम्र में गुरदासपुर जिले में पड़ने वाले लाखौकी गांव के रहनेवाले मूला की कन्या माता सुलक्खनी से गुरु साहिब का विवाह हुआ था। लेकिन संतो की सेवा में ज्यादातर समय बिताने वाले गुरुसाहिब के यहां 7 वर्ष के बाद पहले बेटे श्रीचन्द का जन्म हुआ, जिनके बाद दूसरे बेटे लखमीदास जी का जन्म हुआ था। लेकिन दो दो बेटों के पिता होने के बाद भी गुरु साहिब ने दूसरे गुरु की उपाधि भाई लहना यानी कि गुरु अंगददेव जी को दे दी थी।

बाबा श्रीचंद ने सिख बनने के बजाय बने शिव भक्त

वहीं जहां गुरु साहिब सिख धर्म का प्रचार प्रसार कर रहे थे तो वहीं उनके बड़े बेटे बाबा श्रीचंद ने सिख बनने के बजाय शिव भक्त बन कर ‘उदासी’ संप्रदाय की स्थापना की, जो वैराग्य, सेवा और ईश्वर भक्ति पर जोर देते थे। उन्हें हिंदू धर्म के देवों के देव महादेव का अवतार माना जाता है, जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य धारण किया। एक महान तपस्वी और आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण होते हुए भी उन्हें दूसरे गुरु की उपाधि नहीं दी गई थी। जिसके कारण गुरु साहिब और उनके बेटों के बीच एक तरह से मनमुटाव हो गया था। लेकिन कैसे वो वापिस अपने पिता के पास लौटे, और उसके बाद क्या हुआ ।। कैसे बने वो सबसे बड़े वैरागी।।

कमरा एक आलोकिक रोशनी से जगमगाने लगा

गुरु साहिब का विवाह 18 साल की ही उम्र में 24 सितंबर 1487 को बटाला शहर में हुई थी लेकिन पहली संतान श्रीचंद का जन्म करीब 7 साल बाद 1494 में हुआ था, तो वहीं उनके दूसरे बेटे लखमीदास जी का जन्म 1496-97 के आसपास हुआ था। गुरु साहिब के पहले बेटे श्रीचंद जी के बारे में कहा जाता है कि जब उनका जन्म हुआ तो पूरा कमरा एक आलोकिक रोशनी से जगमगाने लगा.. वो रोशनी इतनी तेज थी कि माता सुलखनी उस चमक को बर्दाश्त नही कर सकीं और बेहोश हो गई.. बेहोशी के दौरान उन्हें महादेव के दर्शन हुए थे।

कहा जाता है कि जन्म के बाद बाबा श्रीचंद के शरीर पर एक अलौकिक और प्रकृतिक विभूति लगी हुई थी, जैसे महादेव के शरीर पर लगी होती है, इतना ही नहीं महादेव की ही तरह ही उनके सिर पर ढेर सारी जटायें थी। गुरु साहिब की बहन माता नानकी ने जब गुरु साहिब को बेटे के अलौकिक होने की खबर दी तो वो आश्चर्य करने के बजाय केवल मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। कहा जाता है कि श्रीचंद जी अपने 134 साल की उम्र तक ब्राह्मचारी रहे थे, जिनकी भविष्यवाणी खुद गुरु नानक देव जी ने उनके जन्म के समय ही कर दी थी। यानि की वो श्रीचंद जी के जन्म के समय से ही जानते थे कि वो आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे और प्रभु के परम भक्त होंगे।

पंडितो की भविष्यवाणी

श्रीचंद जी के जन्म के बाद उनके दादा जी कालू चंद जी, जो हिंदू धर्म को मानते थे, उन्होंने बच्चे के भविष्य के लिए पंडितो को बुलाया। श्रीचंद जी के चेहरे पर इतनी आभा थी पंडित भी उन्हें देख कर भावविभोर हो उठे, उन्होंने कहा कि श्रीचंद जी अलौकिक शक्तियों के मालिक होंगे, औऱ गुरु नानक देव जी से अलग एक परंपरा को शुरु करेंगे। जैसे जैसे वो बड़े हुए वो गुरु साहिब की संगत में उनके साथ जाते, उनके प्रवचनो को ध्यान से सुनते और उसे दोहराते थे। मात्र 2.5 साल की उम्र में ही उन्होंने बच्चो की एक संगत को सत करतार का जाप करवाया था। मात्र 5-6 साल की उम्र में ही श्रीचंद जी की भक्ति ऐसी थी कि वो कई कई दिनों तक साधना में लीन रहते.. न उन्हें खाने की की फिक्र होती न पानी की।

अध्यात्मिकता की ओर उनका विशेष लगाव

गुरु नानक देव जानते थे कि उनका बेटा साधारण नहीं है, इसलिए वो कभी भी उन्हें कुछ भी करने से मना नहीं करते थे.. जहां उनके उम्र के बच्चे अच्छे अच्छे कपड़े पहनते थे, रंग बिरंगा खाते थे, वहीं श्रीचंद जी एक लंगोटी पहनते औऱ थोड़ा खाते थे। बचपन से ही वो अपने पिता के सानिध्य में रहे थे, इसलिए अध्यात्मिकता की ओर उनका विशेष लगाव होता गया। लेकिन ये बहुत कम लोग जानते है कि जब बाबा श्रीचंद जी 7 साल के हुए तो उनके पिता गुरु नानक देव जी ने उदासी पर जाने से पहले अपने बड़े बेटे को अपनी बहन को गोद दे दिया था।

जब पहली उदासी से गुरु साहिब लौटे तो श्रीचंद जी अपने पिता के आगे तब तक झुके रहे जब तक कि खुद गुरू साहिब ने उन्हें गले से न लगा लिया। समय के साथ श्रीचंद जी संसारिक मोह माया से दूर होते गए.. और एकांत में रहने लगे थे। वो बिल्कुश शैव परंपरा के नागा साधुओं की तरह रहा करते थे, जिन्होंने कभी अपना स्थाई घर नहीं बनाया था, वो अलग अलग स्थानों पर रहा करते थे।

गुरु साहिब और श्रीचंद जी के बीच मतभेद

कहा जाता है कि दो दो बेटो के होते हुए और श्रीचंद जी जैसे प्रतापी और आध्यत्मिक पुत्र के होते हुए भी गुरु साहिब ने अपने शिष्य भाई लहना जी को अपने बाद गुरु की गद्दी सौंप दी थी। इसके बाद कहा जाता है कि उनके बेटे और माता सुलखनी भी गुरु साहिब से नाराज हो गई थी…और श्रीचंद जी घर छोड़ कर एक जंगल में तप करने लगे। गुरु साहिब को काफी दुख हुआ था और वो करतारपुर छोड़ कर चले गए थे.. लेकिन क्या ये सच है.. जबकि गुरु साहिब ने खुद कहा था कि श्रीचंद जी नए उदासी पंथ को शुरु करेंगे, जो उनके सिख धर्म से अलग होगा..

श्रीचंद जी ने अपने पिता के विचारों को फैलाया

सच तो ये है कि प्रथम गुरू साहिब के सचखंड जाने के बाद श्रीचंद जी ने अपने पिता के विचारों को भारत समेत कई हिस्सों में पहुंचाया। सिख धर्म के अनुयायियों में श्रीचंद जी के लिए इतना सम्मान था कि उन्हें दूसरे गुरु से लेकर छठे गुरु हरगोबिंद साहिब तक सम्मान देते थे। यहां तक कि छठे गुरु ने अपने बड़े बेटे बाबा गुरदत्ता जी को श्रीचंद जी को सौंप दिया था..जो उनके ही उत्तराधिकारी बने थे। यानि की ये केवल एक अफवाह मात्र है कि गुरु गद्दी न मिलने के कारण पिता पुत्र में किसी तरह का विवाद हुआ था.. ये बात सच हो सकती है कि श्रीचंद जी साधना करने गए हो, लेकिन वो तो उनकी बचपन की आदत थी..

इसमें गुरु गद्दी का न मिलना कहीं से भी शामिल नहीं था। उदासी समुदाय को मानने वाले आज भी सिखों के पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश करते है। सोचने वाली बात है कि अगर गुरु साहिब और श्रीचंद जी के बीच किसी तरह का मतभेद होता तो वो सिख धर्म के विचारों का प्रचार प्रसार क्यों करते,तो वहीं अन्य पांच गुरु खुद श्रीचंद जी के दर्शन को क्यों आते। यहां तक कि अमृतसर शहर बसाने के लिए श्रीचंद जी ने ही चौथे गुरु राम दास जी को सलाह दी थी। जो आज सिख धर्म का सबसे बड़ा केंद्र है। उदासी समुदाय के साधुओं का कहना है कि श्रीचंद जी भी अपने पिता की ही तरह शरीर के साथ ही सचखंड गए थे, जो कि मणि महेश की गुफा में समाधि के लिए गए थे, लेकिन उसके बाद कभी बाहर नहीं आये। श्रीचंद जी और गुरु साहिब का रिश्ता पिता पुत्र से ज्यादा गुरु शिष्य का था.. जिन्होंने आजीवन केवल अपने पिता के ही नक्शे कदमों पर चलना सीखा.,.और हमेशा चलें थे।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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