Falta Repoll Results: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दक्षिण 24 परगना जिले की फलता विधानसभा सीट इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा में है। कभी तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर बीजेपी ने ऐसा राजनीतिक उलटफेर किया है, जिसने राज्य की सियासत को गर्मा दिया है। रिपोल यानी दोबारा मतदान के बाद हुए चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने करीब 1 लाख वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की है। इस नतीजे को ममता बनर्जी और टीएमसी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
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क्या रहे चुनावी नतीजे? Falta Repoll Results
मतगणना में बीजेपी उम्मीदवार देबांग्शु पांडा शुरू से ही बढ़त बनाए हुए थे। हर राउंड के साथ उनकी बढ़त बढ़ती गई और आखिर में उन्होंने 1,49,666 वोट हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की। दूसरे स्थान पर सीपीएम उम्मीदवार संभू नाथ कुर्मी रहे, जिन्हें 40,645 वोट मिले। कांग्रेस के अब्दुर रज्जाक मोल्ला को 10,084 वोट मिले, जबकि टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान चौथे नंबर पर रहे और उन्हें सिर्फ 7,783 वोट मिले।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जहांगीर खान ने दोबारा मतदान से पहले ही चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद उनका नाम बैलेट में बना रहा और उन्हें इतने कम वोट मिले।
क्यों कराना पड़ा दोबारा मतदान?
फलता विधानसभा सीट पर पहली बार 29 अप्रैल को मतदान हुआ था। लेकिन वोटिंग के दौरान भारी गड़बड़ी के आरोप लगे। विपक्षी दलों ने ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़, बूथ कैप्चरिंग और वोटरों को धमकाने जैसे गंभीर आरोप लगाए। मामला इतना बढ़ गया कि चुनाव आयोग को पूरी वोटिंग रद्द करनी पड़ी। इसके बाद आयोग ने 21 मई को सभी 285 बूथों पर दोबारा मतदान कराने का फैसला किया। रिपोल के दौरान भारी संख्या में केंद्रीय बल और पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच शांतिपूर्ण तरीके से मतदान हुआ और 88 प्रतिशत से ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई, जिसे काफी अच्छा मतदान प्रतिशत माना जा रहा है।
ममता बनर्जी ने लगाए गंभीर आरोप
फलता सीट के नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दोबारा मतदान में भी वोटों की चोरी हुई है। ममता बनर्जी ने कहा कि केंद्रीय बलों के कुछ जवान बीजेपी एजेंट बनकर मतगणना केंद्र के अंदर पहुंचे और चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई। हालांकि चुनाव आयोग या केंद्रीय एजेंसियों की ओर से इन आरोपों पर फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
शुभेंदु अधिकारी का टीएमसी पर बड़ा हमला
बीजेपी की जीत के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने टीएमसी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “डायमंड हार्बर मॉडल” अब “तृणमूल का लॉस मॉडल” बन चुका है। उन्होंने फलता की जनता को धन्यवाद देते हुए कहा कि लोगों ने बीजेपी पर भरोसा जताया है और भारी मतों से देबांग्शु पांडा को जिताया है। शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि उन्होंने जनता से एक लाख वोटों से जीत दिलाने की अपील की थी और जनता ने उससे भी ज्यादा अंतर से बीजेपी को जीत दिलाई। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी विकास के जरिए जनता के भरोसे का जवाब देगी और “गोल्डन फलता” बनाने की दिशा में काम करेगी।
पीएम मोदी ने भी दी बधाई
फलता सीट पर बीजेपी की बड़ी जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं को बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र की जीत और दादागीरी की हार है। प्रधानमंत्री ने कार्यकर्ताओं की मेहनत की सराहना करते हुए कहा कि जनता ने निष्पक्ष चुनाव और बदलाव के पक्ष में वोट दिया है।
जहांगीर खान क्यों बने चर्चा का केंद्र?
टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान पूरे चुनाव के दौरान सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में लगातार सुर्खियों में रहे। उन्होंने आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को “सिंघम” बताते हुए खुद को “पुष्पा” कहा था। उनका बयान “पुष्पा झुकेगा नहीं” सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था।
शुरुआत में उनकी सभाओं में भारी भीड़ भी देखने को मिली थी। लेकिन रिपोल से ठीक पहले उन्होंने अचानक चुनाव मैदान छोड़ने का ऐलान कर दिया। 19 मई को उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने फलता के विकास के लिए विशेष पैकेज देने का वादा किया है, इसलिए वे चुनाव नहीं लड़ेंगे।
हालांकि टीएमसी ने इसे उनका निजी फैसला बताया था। उनके चुनाव छोड़ने के बाद सोशल मीडिया पर “पुष्पा झुक गया” और “मैदान छोड़कर भाग गए” जैसे मीम्स तेजी से वायरल होने लगे।
क्यों अहम है यह जीत?
फलता विधानसभा सीट दक्षिण 24 परगना जिले में आती है और यह इलाका टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। लंबे समय से यह टीएमसी का मजबूत गढ़ रहा है। ऐसे में बीजेपी का यहां इतनी बड़ी जीत हासिल करना सिर्फ एक सीट जीतने भर का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बंगाल की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है।




























