Iran US War Update: वैश्विक तेल राजनीति में इस समय बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका अब ईरान के साथ चल रहे तनाव को खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। माना जा रहा है कि जिस रणनीतिक मकसद के लिए अमेरिका इस टकराव में उतरा था, वह काफी हद तक पूरा हो चुका है।
जानकारों के मुताबिक, अमेरिका की यह पूरी रणनीति किसी अचानक फैसले का नतीजा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित “एनर्जी डोमिनेंस” नीति का हिस्सा है, जिसका मकसद वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखना है।
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तेल की जंग में अमेरिका की बड़ी चाल | Iran US War Update
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने ऊर्जा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। सबसे पहले वेनेजुएला में राजनीतिक बदलाव और वहां की तेल कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों के जरिए चीन की सस्ती तेल सप्लाई को प्रभावित किया गया। इसके बाद ईरान पर लगातार दबाव बनाकर उसकी तेल बिक्री को सीमित दायरे में कर दिया गया। इन दोनों देशों से चीन को मिलने वाला सस्ता तेल धीरे-धीरे कम होने लगा।
चीन की सबसे बड़ी निर्भरता पर चोट
चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और लंबे समय से ईरान और वेनेजुएला से सस्ते दामों पर कच्चा तेल खरीदता रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन देशों से उसे लगभग 8 से 15 डॉलर प्रति बैरल तक डिस्काउंट पर तेल मिल जाता था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह सप्लाई चेन कमजोर हो गई है। पहले जहां चीन अपनी जरूरत का करीब 20% तेल इन प्रतिबंधित देशों से पूरा करता था, अब वही हिस्सा महंगा और जोखिम भरा हो गया है।
सस्ते तेल का ‘खेल’ कमजोर पड़ा
अमेरिका ने सिर्फ प्रतिबंध ही नहीं लगाए, बल्कि उन जहाजों और नेटवर्क पर भी नजर रखना शुरू किया है जो इस तेल की सप्लाई में शामिल थे। कई मामलों में जहाजों की जब्ती और ट्रैकिंग ने इस व्यापार को और मुश्किल बना दिया है। अब हालात यह हैं कि चीन को वही तेल सऊदी अरब, रूस या अमेरिका जैसे देशों से बाजार भाव पर खरीदना पड़ रहा है, जिससे उसकी लागत बढ़ गई है।
रूस और युआन की रणनीति को झटका
इस पूरी भू-राजनीतिक लड़ाई में रूस भी प्रभावित हुआ है। वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में उसके निवेश अब जोखिम में आ गए हैं। वहीं चीन की कोशिश थी कि वह ईरान और वेनेजुएला के साथ मिलकर तेल व्यापार को डॉलर की बजाय युआन में आगे बढ़ाए। लेकिन इन देशों की तेल अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने से यह योजना भी कमजोर पड़ गई है।
यूरोप की बदलती भूमिका
यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने भी रूस से ऊर्जा आयात लगभग खत्म कर दिया और अब वह अमेरिका से तेल और LNG का बड़ा खरीदार बन गया है। इससे वैश्विक बाजार में अमेरिका की स्थिति और मजबूत हो गई है।
रूस की कीमत पर बढ़ता दबाव
रूस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसे अपने तेल के लिए सीमित बाजार मिल रहे हैं। मजबूरी में उसे भारत और चीन जैसे देशों को तेल कम दामों पर बेचना पड़ रहा है, जिससे उसकी “प्राइसिंग पावर” कमजोर हुई है।
अमेरिका की मजबूत होती पकड़
आज की स्थिति यह है कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन चुका है। वैश्विक तेल व्यापार अभी भी डॉलर में होता है, जिससे अमेरिका को अतिरिक्त ताकत मिलती है। साथ ही, प्रतिबंधों और ऊर्जा नीतियों के जरिए वह यह तय करने की स्थिति में है कि कौन सा देश तेल बेच सकता है और कौन नहीं।
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