Shaheed Bhagat Singh: जब आप भारत के महान क्रांतिकारी बलिदानियों के बारे में पढ़ते है तो उसमें से एक है देश के लिए हंसते हंसते मात्र 23 साल की उम्र में शहीद होने वाले शहीद भगत सिंह। भगत सिंह जिनपर हर एक सिख को आज भी गर्व है, उन्होंने सिख धर्म की पहचान वीरता और साहस का पचचम लहराया था, वो अंग्रेजी हुकुमत के आगे झुके नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई के लिए शहीद होना चुना था.. लेकिन क्या आप ये जानते है कि जिस सिख धर्म को लोग सबसे मजबूत धर्म मानते थे, जिस धर्म से शहीद भगत सिंह थे..लेकिन बावजूद इसके भगत सिंह नास्तिक थे।
उन्होंने कभी परमात्मा को नहीं माना.. औऱ न ही इस बात पर भरोसा किया कि दुनिया को परमात्मा चलाता है.. खुद भगत सिंह ने भी 1930 में लाहौर जेल में एक निंबध लिखा था जिसका टाइटल था मैं नास्तिक क्यों हूं। अपने इस लेख में हम बात करेंगे कि आखिर भगत सिंह नास्तिक क्यों थे.. और क्या कहा है उन्होंने इस चिट्ठी में।
धर्म और धार्मिक कर्मकांडो से विरक्ति
दरअसल जब भगत सिंह ने क्रांति की लड़ाई शुरु की थी उस वक्त वो अपने परिवार के लोगो की तरह आस्तिक ही थे,ईश्वर में श्रद्धा रखते थे, लेकिन इस दौरान उनकी मुलाकात जब 1923 की में उनके क्रांतिकारी गुरु शचींद्रनाथ सान्याल से हुआ थी.. शचींद्रनाथ सान्याल से मिलने के बाद भगत सिंह की धर्म और धार्मिक कर्मकांडो से विरक्ति होती गई। वो ये समझ गए थे कि धर्म किसी की रक्षा नहीं कर सकता है, ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं है, इस दुनिया को कोई ईश्वर नहीं चला रहा है बल्कि वो कहते थे कि दुनिया में किसी पर भी विश्वास तभी होना चाहिए जब वो विज्ञान और तर्क की कसौटी पर खरा उतरे।
बिना परखे किसी भी अंधा विश्वास कर लेना कोई धर्म नहीं है.. कोई आस्था नहीं है। प्रकृति का अपना नियम है और प्रकृति को किसी भी ईश्वर की कोई जरूरत नहीं है। भगत सिंह ने अपने गुरु के तर्को को सही ठहराते हुए कहा कि अगर ईश्वर जैसी कोई चीज है तो फिर संसार में इतनी तबाही क्यों है, वो उन सबकी रक्षा क्यों नही करता। धर्म और आस्था केवल कुछ लोगो का हथकंडा है दूसरों का शोषण करने के लिए.. जो पूरी तरह के अन्यायपूर्ण था।
जब सुरेंद्र सिंह ने उठाये सवाल
कम उम्र में ही भगत सिंह की सोच और उनकी उपलब्धियों के कारण वो काफी प्रचलित हो गये थे। ऐसे में वो जब भी सम्मेलन में जाते थे वो मंदिर या गुरुद्वारे के बाह ही रहते थे, और केवल सम्मेलन में शामिल होते, वहां होने वाली प्रार्थनाओं से दूर रहते थे, जिसे लेकर सुरेंद्र सिंह ने भगत सिंह पर सवाल उठा दिया था कि आखिर वो इतनी छोटी उम्र में फेमस हो गए है इसलिए ईश्वर को न नहीं मानते है…लेकिन जब भगत सिंह को ये बात पता चली तो उन्होंने लाहौर में 1930 में जेल में रहने के दौरान एक निबंध लिखा था-मैं नास्तिक क्यों हूं। भगत सिंह ने तर्क दिया कि उन्होंने कार्ल मार्क्स, लेनिन और कई बड़े क्रांतिकारियों के बारे में गहीनता से अध्ययन किया है, जिसके कारण वो तर्क करना जान गए है।
नास्तिक होने का सबसे बड़ा कारण उनकी तार्किक शक्ति और बिना अवलोकन के किसी अंधविश्वास पर यूहीं विश्वास न करना था।भगत सिंह कहते थे कि दुनिया में भगवान हो ही नहीं सकता, क्योंकि वो होता तो कोई दुखी नहीं होता.. या फिर वो है भी तो वो बहुत बुरा है.. जो अपने लोगो को रोते, बिलखते तड़पते देखता रहता है लेकिन उनके दुखों को दूर करने के लिए कोई उपाय नहीं करता है। वो बहुत बुरा है, और मैं ऐसे बुरे आदमी पर आस्था रखने से इंकार करता हूं, मैं ऐसे भगवान को कभी नहीं पूजूंगा।
अंत समय में भी नहीं की पूजा
भगत सिंह को जब 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में फांसी पर लटकाया जा रहा था, तब वहां मौजूद सिख जेलर ने फांसी से पहले भगत सिंह को अंतिम बार ईश्वर को याद करने के लिए कहा था..लेकिन भगत सिंह ने सीधा सा जबाव दिया कि न तो मैं पहले भगवान में विश्वास करता था और न ही अब करता हूं। भगत सिंह ने अंतिम समय में भी केवल भारत माता की जय की नारा लगा कर देश को आजाद करने का सपना लेकर फांसी पर लटकना स्वीकार किया था। भगत सिंह के साथ साथ राजगरु और सुखदेव को भी फांसी दे गई थी।
ये वो दिन था तब पूरे देश इन वीर सपूतो के लिए रोया था.. तब किसी ने भी एक बार भी उनके धर्म या धर्म को मानने न मानने के बारे में नहीं सोचा था। तब केवल भारत मां के लाल की शहादत ही दिखी थी… भगत सिंह ने कहा था कि वो अपना बल्किदान किसी स्वर्ग को पाने के लिए, या फिर से जन्म लेने के लिए नहीं दे रहे है, वो केवल अपने देश को आजाद कराने के लिए एक बेटे का फर्ज निभा रहे है। वो देश को आजाद कराने की क्रांति का एक हिस्सा बन कर बलिदान दे रहे है। ऐसे थे भगत सिंह.. जिन्हें आज भी देश पूरे सम्मान के साथ याद करता है। ऐसे वीर सपूतो को नमन करता है।






























