Maharaja Ranjit Singh court stories: 18वीं सदी पंजाब की धरती के लिए सबसे ऐतिहासिक और सुनहरे समय में गिना जाता है.. ये वो समय था जब पंजाब की धरती पर पहले सिख शासक शेर ए पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का शासन शुरु हुआ था। सिक्खी इतिहास के अनुसार 12 अप्रैल 1801 के दिन महाराजा रणजीत सिंह का मात्र 19 साल की उम्र में राज्यभिषेक हुआ था…लेकिन तब किसी को नही पता था कि ये 19 साल का लड़का एक दिन पंजाब को इतना मजबूत बना देगा कि किसी बाहरी शासक तो छोड़िये आधुनिक हथियारों के लैस अंग्रेजी हकूमत की भी कभी हिम्मत नहीं होगी उनकी आंखो से आंखे मिलाने की। महाराजा रणजीत सिंह ने अपने 38 साल के शासन में 20 युद्ध लड़े थे लेकिन वो कभी भी पराजित नहीं हुए..वो अजेय थे।
कोहिनूर हीरे से महाराजा रणजीत सिंह का रिश्ता
कोहिनूर हीरा आंध्र प्रदेश में स्थित गोलकुंडा की खदानों से प्राप्त किया गया था, जो महाराजा रणजीत सिंह की दरबार की शान बनी थी, महाराजा का रुतबा ऐसा था कि वो इसे बाजूबंद बना कर पहनते थे, जो कि उन्होंने 1813 में अफगानी शासक शाह शुजा से राजनैतिक कूटनीति के तहत लिया था.. दरअसल शाह शुजा कश्मीर से सूबेदार से बचकर महाराजा रणजीत सिंह से सुरक्षा लेने लाहौर आया था, महाराजा ने उसे सुरक्षा तो दी लेकिन अफगानों पर भरासो करना आसान नहीं था.. वो जानते थे कि शाह शुजा के पास ही भारत की बेशकीमती धरोहर कोहीनूर हीरा था।
महाराजा ने मुबारक हवेली में अपनी कूटनीती का इस्तेमाल करके किले की घेरेबंदी करवा दी और शाह शुजा के साथ भाईचारा करके वो हीरा देने के लिए मजबूर कर दिया.. हालांकि इस वक्त महाराजा ने युद्ध के बजाये पगड़ी बदल भाई की नीति अपना कर भाईचारे का संदेश दिया था। महाराजा ने शाह शुजा की मदद की और उसे फिर से अपगान का शासक बना दिया। शाह शुजा ने मदद के बदले हीरा उन्हें भेंट कर दिया..और 1 जून 1813 में कोहीनूर महाराजा रणजीत सिंह के दरबार की शान बन गया। जो कि महाराजा रणजीत सिंह की ताकत, उनकी शक्तिशाली और गौरवपूर्ण सम्राज्य का प्रतीक बन गया था।
इतना ही नहीं जब भी कोई अंग्रेजी अफसर उनसे मिलने जाता तो वो कोहीनूर हीरा जरूर दिखाते थे, जिसे वो अपने बाजूबंद में पहनते थे.. बाजूबंद में कोहीनूर हीरे को पहनना उनके उस साहस और समझ का प्रतीक थी जिसमें वो अंग्रेजी हुकुमत को संदेश देते थे कि जब वो कोहीनूर हीरे जैसे बेशकीमती हीरे को भी सिर के बजाये बाजू में धारण करते है तो फिर अंग्रेजी हुकुमत की शानों शौकत उनके आगे मिट्टी के सामान है।
कोहीनूर हीरे की कहानी
कोहीनूर हीरा आज के तेलंगाना के गोलकुंडा की खद्दान में 13वी शताब्दी में मिला था, जो कि सबसे पहले काकतीय वंश के पास था। इसका मतलब है रोशनी का पर्वत। लेकिन जब इस्लामिक ताकतो का हमला होने लगा तब अलाउद्दीन खिलजी के वंश के नाश के बात गयासुद्दीन तुगलक के गद्दी संभालते ही उसके बेटे उलुघ खान ने 1313 में काकतीय वंश पर हमला कर दिया जिससे वो सम्राज्य कमजोर हो गया लेकिन उलुघ खान हार गया. मगर काकतीय वंश वारंगल युद्ध में हार गया..और भारी लूटपाट हुई जिसमें इस हीरे को भी लूट लिया।
जिसके बाद जब मुगल शासल बाबर ने दिल्ली पर हमला किया तब रास्ते में मालवा के शासक के पास ये हीरा था, लेकिन ये हीरा दिल्ली को देने को मजबूर किया गया और 1426 में बाबार को दिल्ली सल्तनत के साथ कोहीनूर हीरा भी मिला, ये हीरा मुगलो के बार कई सौ सालो तक रहा था, हालांकि अकबर ने कोहीनूर को हमेशा अपने से दूर रखा था..लेकिन मुगल शासक शाहजहां ने कोहीनूर को अपमे मयूर सिंहासन में लगवा दिया था। कोहिनूर मुगल साहस मुहम्मद शाह रंगीला के दरबार की शान था।
लेकिन 1739 में नादिरशाह ने भारत पर हमला कर दिया और भरी तबाही और लूटपाट मचाया गया, जिसके बाद ये हीरा वो फारस ले कर चला गया। और कोहिनूर को ये नाम भी नादिरशाह ने ही दिया था। लेकिन 1747 में नादिरशाह की हत्या हुई और हीरा अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली के पास आया, जिसके बाद 1813 में शुजा शाह बचते हुए लाहौर पहुंचा का मदद के बदले ये हीरा महाराज रंजीत सिंह को दिया था। यानी कि बाहर की धरती से निकला कोहिनूर फिर से भारत पहुंचा, जो उनकी मृत्यु के बाद ही अंग्रेजी हुकूमत के हाथ लगी थी।
अंग्रेजी हुकुमत की शान
साल 1839 में जब महाराजा की मृत्यु हुई तब तक कोहीनूर उनके पास ही थी, वो चाहते थे कि ये हीरा उनकी मृत्यु के बाद पुरी के जगन्नाथ मंदिर को दान कर दिया जाये, लेकिन महाराजा के जाने से पंजाब का सम्राज्य कमजोर हो गया और भ्रष्टाचार शुरु हो गया..यहां तक कि उनके कोषाध्यक्ष की चाल के कारण हीरा मंदिर को नहीं मिल सका और 1849 में अंग्रेजी हुकुमत के पंजाब पर शासन करने के बाद ये अंग्रेजी हुकूमत के पास चला गया तो आज भी ब्रिटेन की महारानी के ताज का हिस्सा है।
कोहीनूर को फिर से भारत लाने की क्रेडिट पंजाब की शान शेर ए पंजाब अजेय महाराजा रणजीत सिंह जी को ही जाता है। उनकी रणनीतियां और कूटनीतियों की ही देन थी कि उन्होंने पंजाब को एक अजेय क्षेत्र बनाया था। कोहीनूर भले ही आज भारत के पास नहीं है, लेकिन भारत में कोहीनूर की फिर से पहचान महाराजा रणजीत सिंह की ही देन थी। महाराजा रणजीत सिंह के कोहीनूर हीरे को वापिस लाने की कहानी आपको कैसी लगी हमे कमेंट करके जरूर बतायें।
