Sikhism in Iran: एशिया महाद्वीप का एक ऐसा देश, जो अपने हजारों सालों का इतिहास खुद में समेटे हुए है, 21 वीं सदी के लोग भले ही उसे ईरान के नाम से जानते है, लेकिन इतिहास में इस देश को हम फारस कहते थे, भारत और फारस का रिश्ता काफी पुराना था.. भारत जिनकी पहचान आर्यो से की जाती है, इतिहासकार बताते है कि ईरान नाम फारस को भी आर्यो के कारण ही मिला था, क्योंकि आर्य असल में इसी धरती से आये थे। जिन्हे एरान या फिर आर्यन कहा जाता था, इरान आज के समय में एक संपन्न देश है, जहां तेल के कूओं का भंडार है, वहीं सबसे पुरानी मेसोपोटामिया सभ्यता के यहां होने के साक्ष्य मिले है।
1979 से पहले ईरान (Iran) एक संपन्न देश था, जो आधुनिकता और संस्कृति का अनूठा संगम था, लेकिन इस्लामिक क्रांति ने सब बदल दिया… और इरान एक इस्लामिक देश हो गया, लेकिन इस्लाम होने के बाद भी एक और ऐसा धर्म है, जो धीरे धीरे काफी मजबूत हुआ और वो धर्म है सिख धर्म। ईरान में सिख धर्म तब आया जब ईरान एक संपन्न और आधुनिक देश हुआ करता था, अपने इस लेख में हम ईरान में इस्लाम के फलने फूलने और आगे बढ़ने की कहानी को जानेंगे..
ईरान के बारे में इतिहास
ईरान जिसे पुराने समय में फारस कहा जाता था, वो असल में भारत के आर्यो की ही धरती कहलाती है, आर्य ईरान से ही भारत आये थे, इसलिए फारस को ऐरान या आर्यन कहा गया, औऱ इन्ही नामो के कारण फारस का नाम बदल कर 1935 में ईरान रखा गया था। इसका आधिकारिक नाम ईरान इस्लामी गणराज्य है, जो कि पश्चिमी एशिया में स्थित है। इसकी राजधानी तेहरान है, साथ ही ईरान चारो तरफ से इस्लामिक देशों से घिरा हुआ है।
जिसमें पश्चिम में इराक़ और तुर्की, उत्तर-पश्चिम में अज़रबैजान और आर्मीनिया, उत्तर में कैस्पियन सागर, उत्तर-पूर्व में तुर्कमेनिस्तान, पूर्व में अफ़्ग़ानिस्तान और पाकिस्तान मौजूद है। ईरान का क्षेत्रफल 1,648,195 वर्ग किलोमीटर है तो वहीं इसकी जनसंख्या 2024 के आकड़ो के अनुसार 8 करोड़ 59 लाख 61,000 के आसपास है, जो कि दुनिया का 17वां सबसे आबादी वाला देश है। ईरान एक शिया इस्लामिल देश है, जो कि 1989 के बाद से ईरान पर राज कर रहे है, और तब से यहां सरिया कानून चलता है।
ईरान में सिख धर्म शुरुआत
ईरान में सिखों के आने का सिलसिला 19वी सदीं से शुरू हुआ था। खासकर पहले विश्वयुद्ध के बाद 1920 के आसपास ब्रिटिश सेना ने पंजाब से सिख माइग्रेंट्स को पूर्वी पर्शिया के दोज़दाब वर्तमान के ज़ाहेदान में भेजा गया था, जिसके बाद पहली बार ,सिखों के कदम ईरान की धरती पर पड़े थे। दोजदाब बलूचिस्तान के पास स्थित एक सीमाई क्षेत्र था, यहां अंग्रेजी हुकुमत ने सिखों को मज़दूरों के तौर पर भर्ती किया था, ताकि पहले विश्व युद्ध के बाद क्वेटा को ईरान से जोड़ने वाले रेलवे का निर्माण किया जा सके। सिख भले ही माइग्रेंट थे लेकिन ब्रिटिश एम्प्लॉयमेंट के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल हुए थे। सिख ईरान में आने के बाद भी अपनी धार्मिक वैल्यू से कभी भी समझौता करने के लिए तैयार नहीं हुए।
ब्रिटेन के जियोपॉलिटिकल प्रभाव
धीरे-धीरे सिखों ने अपने आप को स्थापित करना शुरू कर दिया और वो लोग ब्रिटेन के जियोपॉलिटिकल प्रभाव के कारण रीजनल रूट्स के जरिये ट्रेड और कॉमर्स में खुद को स्थापित करने लगे। 1920 में आने वाले सिखों ने छोटी-छोटी कालोनियां बसाना शुरु कर दिया, जहां खुद ब्रिटिशों ने सिखों को बसने में मदद की थी। साथ ही क्वेटा को ज़ाहेदान से जोड़ने वाली एक स्ट्रेटेजिक रेलवे लाइन बिछाने के लिए रावलपींडी के सिखों को भारी संख्या को वहां ले जाया गया जो वहीं बस गए थे।
सिख धीरे धीरे खुद के इस्लामिक माहौल में भी अलग बनाये रखने में सफल हुए थे। खासकर आर्थिक तौर पर सिखों ने ईरान में अपना योदगान देना शुरु कर दिया था, जिससे वो भले ही सीमावर्ती इलाके में थे, लेकिन एक संगठित समुदाय के रूप में स्थापित थे। धीरे धीरे सिखो ने वहां पर अपनी धार्मिक मान्यताओं को बढ़ावा देने के लिए पहली बार 1921 के आसपास गुरुद्वारे का निर्माण कराने का फैसला किया। खासकर सिख ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सदस्यों के तौर पर सिखों के आने के बाद गुरुद्वारे की मांग तेज हो गई।
ईरान में गुरुद्वारा – Gurudwara in Iran
1921 में पश्चिम एशिया में पहला सिख मंदिर गुरुद्वारा साहिब ज़ाहेदान का निर्माण शुरू हुआ, ये गुरुद्वारा सिखों की बढ़ती बस्तियों के बीच पूजा और सामाजिक मेलजोल के लिए एक सेंटर पॉइंट बन गया था। 1930 के आसपास इस गुरुद्वारे के पास एक सिख बाज़ार लगने लगा, जहाँ रहने वालों सिख ऑटो पार्ट्स का व्यापार करते थे और ट्रांसपोर्ट के सामानों पर सिखों का दबदबा था, जिससे सिखों की आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा मिला। सिखों की मदद के लिए एंटरप्रेन्योर साहिब सिंह ने हिंद-ईरान बैंक की स्थापना की, जिसने सिख बिज़नेस को सपोर्ट करने के लिए ईरान और भारत में अपने ऑपरेशन बढ़ाए, ये 1950 में बंद हुआ था।
सिखों की स्थिति में भी काफी बदलाव
सिख समुदायों ने गुरुद्वारे के निर्माण के साथ लंगर परंपराओं को बनाए रखा। जो उनकी सांस्कृतिक पहचान का सबूत थी। हालांकि पहलवी दौर में 1950 से 1970 के आखिर तक ईरान सिख समुदाय के लिए बेहतर अवसर लाने वाला देश था और इस कारण 1979 तक देश भर में सिखों की आबादी लगभग 5,000 हो गई थी। लेकिन धीरे धीरे इस्लामिक प्रभाव बढ़ा जिससे सिखों की स्थिति में भी काफी बदलाव हुआ, सिखों ने पलायन शुरु कर दिया। अभी भी करीब 60 से 100 परिवार ही यहां रहते है जो जाहेदान में ही रहते है। जो पर्सियन भाषा बोलते है, लेकिन कल्चर आज भी सिख धर्म का ही फॉलो करते है। सिख एक छोटा सा लेकिन संपन्न समुदाय है, लेकिन कट्टरपंथियों के कारण सिख पलायन कर रहे है। मगर पुराने सिखों आज भी यहीं रहना पसंद करते है।जो उनके बुलंद हौसलो की कहानी कहती है।
