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Sikhism in Malaysia: मलेशिया में सिखों का उदय, कैदी से रक्षक बनने की गौरवशाली दास्तां

Shikha Mishra | Nedrick News
Malaysia
Published: 17 Feb 2026, 05:17 AM | Updated: 17 Feb 2026, 05:23 AM

Sikhism in Malaysia: भला ये किसने सोचा था कि कभी जिन्हें कैदी बना कर, मजदूर बना कर लाया गया जो, एक वक्त ऐसा आएगा, वहीं समुदाय उस देश के सबसे बड़े रक्षक बन जाएंगे। जी हां, हम बात कर रहे है करीब 10 प्रतिशत भारतीय आबादी वाले देश मलेशिया की। जहां आपको भारतीय संस्कृति की खुशबू महसूस हो जाती है, लेकिन सबसे ज्यादा खास है वहां सिखों के बसने की कहानी, जिन्हें करीब 200 पहले कैदी बना कर लाया गया था, लेकिन इनकी बहादुरी, साहस और हिम्मत की कहानियों वहां भी फैली, और सिख कैदी से सिख वहां के रक्षक बन गए।

भले ही ब्रिटिश सेना का हिस्सा बन कर ही सही, लेकिन सिखों ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत बनाई कि आज यहां सिख अल्पसंख्यक ही सही लेकिन एक पावरफुल संगठन है। अपने इस वीडियो में हम खूबसूरत देश मलेशिया में रहने वाले सिखो के बारे में जानेंगे, कैसे यहां पिछले 200 सालों में सिखो ने अपनी पहचान को बदला और आज एक सम्मानित  संगठन के रूप में जाना जाता है। साथ ही जानेंगे कि आज किस स्थिति में है सिख मलेशिया में, और यहां के विकास में उनका कितना बड़ा योगदान रहा है। संगठन के रूप में जाना जाता है।

मलेशिया के बारे में विस्तार में जानकारी

दक्षिण पूर्व एशिया का एक छोटा देश मलेशिया दक्षिण चीन सागर के कारण दो अलग अलग हिस्सों ने बांटा हुआ है। जिसमें से एक है प्रायद्वीपीय मलेशिया और दूसरा है बोर्नियो द्वीप पर बसा पूर्वी मलेशिया। कुआलालंपुर मलेशिया की राजधानी है वहीं पुत्रजया प्रशासनिक राजधानी कहलाती हैं। ये भी ब्रिटेन के अधीन था जिसे 31 अगस्त 1957 को यह यूनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता मिली थी। 16 सितंबर 1963 को मलेशिया का गठन हुआ था जिसमें मलाया, सिंगापुर, सबाह और सारावाक का विलय किया गया था लेकिन  1965 में सिंगापुर इससे अलग हो गया था।

इसके 13 राज्य और तीन संघीय क्षेत्र शामिल हैं। मलेशिया का क्षेत्रफल 330,803 वर्ग किलोमीटर है, तो वहीं 2024 के आकड़ो के अनुसार 34,564,810 के आसपास है। मलेशिया एक मुस्लिम बहुल देश है, जहां दूसरी सबसे ज्यादा आबादी बौद्ध है, वहीं करीब 57 प्रतिशत मलय लोग रहते है, और मलेशिया नाम भी इन्ही मलेय लोगो के कारण पड़ा था। मलेशिया की अर्थव्यवस्था रबर और टिन उत्पादन के अलावा पर्यटन पर निर्भर करती है। सबसे ज्यादा पर्यटन के मामले में मलेशिया शीर्ष देशों में गिना जाता है। हालांकि मलेशिया एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन 1971 में “नेशनल कल्चरल पॉलिसी” लागू की गई थी, जिसके बाद मलय कल्चर को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। लेकिन फिर भी यहां सिखों की अपनी मजबूत पहचान है… जानते है क्या है सिखों की कहानी..

मलेशिया में सिख धर्म की शुरुआत 

मलेशिया में जब हम सिख धर्म के फलने फूलने की बात करते है तो मलेशिया एक ऐसा देश है. जहां आज के समय में करीब 1 लाख से लेकर 1 लाख 30 हजार सिख रहते है, जो कि मलेशिया की पॉपुलेशन का करीब 0.03 प्रतिशत है। लेकिन सिखों की राहें यहां इतनी आसान नहीं रही थी। सिख असल में 1849 में पहली बार कैदियों के रूप में मलेशिया लगाये थे, जो कि ब्रिटिश हुकुमत के सिख कैदी निहाल सिंह (जिन्हें भाई महाराज सिंह के नाम से जाना जाता है) और खुर्रुक सिंह थे।

जिन्हें ब्रिटिश के खिलाफ आंदोलन करने के लिए भारत से निर्वासित कर के मलेशिया के आउट्रम रोड जेल भेजा गया, जो कि मौजूदा समय में सिंगापुर में है, इनके साथ ही कई और कैदियों को भी जेल में डाला गया था लेकिन सिखो की ताकत और साहस से ब्रिटिश भी भलि भांति परिचित थे, इस कारण साल 1865 में अंग्रेजी हुकुमत ने आर्म्ड फोर्सेज़ में भर्ती होने के लिए सिखों को मलेशिया भेजा था।

सेटलमेंट में ब्रिटिश पीनल कॉलोनी बंद

इन सिखों को पुलिस, मिलिट्री और गार्ड के तौर पर भर्ती किया गया था, साथ ही 1873 में सिंगापुर स्ट्रेट्स सेटलमेंट में ब्रिटिश पीनल कॉलोनी बंद हो गई, लेकिन तब तक कई सिख सैनिक सजा काट कर छूट चुके थे और वो मलेशिया के हिस्से में बस गए थे। वहीं चीनियों से पेराक टिन माइंस की सुरक्षा के लिए अंग्रेजी हुकुमत सिख सैनिकों को ही ले कर आई थी। जिसमें 80 प्रतिशत सिख पंजाब से ही ले कर आये गए थे। बाहुबल और ताकत के कारण सिक्योरिटी फोर्स में सिख रिक्रूट्स को तरह दी जाती थी।

जब सिख इमिग्रेंट्स के लिए भारत में होने वाले सिख इमिग्रेंट्स के लिए पहली पसंद रही कनाडा, यूनाइटेड स्टेट्स, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में साउथ एशियन्स के माइग्रेशन पर रोक लगानी शुरू की, तो सिखों ने सबसे ज्यादा मलेशिया को ही चुना. 1920 के आसपास, मलेशिया में करीब 10000 सिख हो चुके थे। 1945 तक यहां जो भी सिख रहते थे वो अकेले ही रहा रहते थे, कुछ ही परिवार के साथ रहते थे लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद सिख अपने परिवारों के साथ रहने लगे।

मलेशिया का पहला पेनांग सिंह सभा गुरुद्वारा

सिख मलेशिया में कितना प्रभावी रहे है, उसका उदाहरण देखने को मिलता है इसके पहले गुरुद्वारे की स्थापना से, जो कि 1873 में स्थापित किया गया था, जो कॉर्नवालिस में पुलिस लाइन के अंदर बनाया गया था, हालांकि ये आम लोगो के लिए नहीं था, लेकिन 1895 में हांगकांग के रहने वाले एक सिख लाल सिंह ने पेनांग का दौरा किया, और पहला आधिकारिक गुरुद्वारा बनाने के लिए पेनांग सिंह सभा का 19 मई 1895 को गठन किया गया था। जो कि 3 सभाओं में बदल गई, और फिर 27 दिसंबर 1903 को पेनांग सिंह सभा ने मिलकर मलाया के खालसा दीवान की घोषणा की गई।

साउथईस्ट और ईस्ट एशिया में सिख समुदाय

जिससे स्थानीय सिख समुदाय की धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और अन्य ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए सर्वसम्मति से हामी भरी गई थी। सर्वसम्मति से हामी भरी गई थी। जिसके बाद 15 सितंबर 1916 को श्री गुरु सिंह सभा ताइपिंग की स्थापना की गई। 18 जनवरी 1918 को फिर से अपर स्टेशन रोड पर एक नए गुरुद्वारे की नींव डाली गई, जिसे 1921 को शुरू किया गया था, 1 जनवरी 1928 को इसकी जगह पर खालसा स्कूल ताइपिंग (सिख धार्मिक स्कूल) की स्थापना की गई थी। साथ ही 1970 में, गुरुद्वारा साहिब ताइपिंग की इमारत को गिरा कर दो मंजिला गुरुद्वारा बनाया गया था जिसे 14 अप्रैल 1971 को वैसाखी के दिन खोली गई थी। मौजूदा समय में साउथईस्ट और ईस्ट एशिया में सिख समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावशाली है।

धार्मिक और समाजिक प्रोग्राम्स

मौजूदा समय में साउथईस्ट और ईस्ट एशिया में सिख समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावशाली है। अकेले कुआलालंपुर में 13 सिख गुरुद्वारे हैं, जो यहां सिखो के प्रभाव को दर्शाते है। सिखो के अधिकारों की सुरक्षा और गुरुद्वारो की देखभाल के लिए मलेशियर सिख सोसाईटी मौजूद है। जो सभी धार्मिक और समाजिक प्रोग्राम्स की देखरेख करते है। सिखो ने पिछले कई दशको में मलेशिया में अपनी ताकत का, अपनी क्षमता का परचम लहराया है। जो मलेशिया में सिखो को एक मजबूत संगठित संगठन बनाता है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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