Dearness Allowance News: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा झटका देते हुए राज्य के कर्मचारियों को 2009 से 2019 तक का लंबित महंगाई भत्ता (DA) देने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि DA कोई दया या मेहरबानी नहीं, बल्कि कर्मचारियों का वैधानिक अधिकार है, जिसे किसी भी हालत में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
DA कर्मचारियों का अधिकार, वित्तीय तंगी बहाना नहीं | Dearness Allowance News
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस पीके मिश्रा की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि ROPA नियमों के तहत वेतन और अन्य परिलब्धियों की गणना में महंगाई भत्ता एक अहम हिस्सा है। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि राज्य सरकार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है, यह तर्क कर्मचारियों को उनका हक न देने का आधार नहीं बन सकता।
6 मार्च 2026 तक 25% बकाया भुगतान अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक पश्चिम बंगाल सरकार को कुल बकाया DA का कम से कम 25 फीसदी हिस्सा 6 मार्च 2026 तक हर हाल में देना होगा। यह फैसला राज्य सरकार की उन अपीलों पर आया है, जो कलकत्ता हाईकोर्ट के मई 2022 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थीं। हाईकोर्ट ने तब तीन महीने के भीतर भुगतान का निर्देश दिया था।
DA नियमों में बदलाव को बताया ‘मनमाना और सनकी’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अनुच्छेद 309 और ROPA नियमों से जुड़े 13 अहम सवालों पर विचार किया। बेंच ने कहा कि महंगाई भत्ता कोई स्थिर चीज नहीं है, बल्कि यह समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। कोर्ट ने DA नियमों में राज्य सरकार द्वारा किए गए बदलावों को “मनमाना” और “सनकी” करार दिया।
अदालत का कहना था कि नियमों में बदलाव से कर्मचारियों के मन में एक वैध उम्मीद बनी थी, जिसे बिना किसी ठोस वजह के तोड़ा गया। यह न सिर्फ गलत है, बल्कि संवैधानिक भावना के भी खिलाफ है।
वित्तीय नीति कर्मचारियों के अधिकारों से ऊपर नहीं
राज्य सरकार ने कोर्ट में दलील दी थी कि वह वित्तीय संकट से जूझ रही है, इसलिए DA का भुगतान संभव नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि एक बार जब किसी कर्मचारी को कोई अधिकार मिल जाता है, तो फिस्कल पॉलिसी उसके आड़े नहीं आ सकती।
कोर्ट ने केंद्र सरकार पर DA थोपने के राज्य के तर्क को भी खारिज करते हुए इसे “कल्पना की उपज” बताया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि साल में दो बार DA देना अनिवार्य नहीं है और इसे मौलिक अधिकार घोषित करने का सवाल भविष्य के लिए खुला रखा गया है।
20 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को सीधी राहत
इस फैसले से पश्चिम बंगाल के करीब 20 लाख सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। राज्य सरकार के अपने अनुमान के मुताबिक, इस आदेश के बाद उसे लगभग 43 हजार करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा। लंबे समय से DA को लेकर चल रहे विवाद पर अब सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग गई है।
जस्टिस इंदु मल्होत्रा कमेटी करेगी भुगतान की निगरानी
बाकी बचे DA का भुगतान किस्तों में कैसे किया जाए, यह तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक विशेष समिति गठित की है। इस कमेटी में जस्टिस तरलोचन सिंह चौहान, जस्टिस गौतम विधूड़ी और CAG के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
कमेटी को 16 मई तक अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सौंपनी है। इसी दिन इस मामले की अगली सुनवाई भी निर्धारित की गई है।
