Sikh Gurdwara Act 1925: वह कानून जिसने बदला गुरुद्वारों का प्रबंधन और सिखों का भविष्य

Shikha Mishra | Nedrick News Punjab Published: 07 Feb 2026, 07:55 AM | Updated: 07 Feb 2026, 07:55 AM

Sikh Gurdwara Act 1925:  पंजाब की राजनीति से लेकर धार्मिक संस्थानों और सिख धर्म से जुड़े फैसलों पर सबसे ज्यादा अगर किसी की धाक है तो वो करीब 100 सालों से भी पुराना एक संगठन शिरोमणी अकाली है। शिरोमणी अकाली दल जिसकी स्थापना 14 दिसंबर 1920 में हुई थी.. और उससे ठीक एक महीने पहले 16 नवंबर 1920 को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी की स्थापना की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य था कि राज्य में गुरुद्वारों की सुरक्षा, वित्तीय, सुविधा रख-रखाव और धार्मिक पहलुओं का प्रबंधन करता है, साथ ही सिख गुरूओ से जुड़े हर एक वस्तु की सुरक्षा करने का दायित्व है.. लेकिन केवल कमिटी बनाने से पंजाब की सत्ता हाथ नहीं आ सकती थी इसलिए  शिरोमणी अकाली दल का भी गठन किया गया, लेकिन तब तक भारत के ज्यादातर गुरुद्वारे हिंदू महंतो जिन्हें पुजारी भी कहा जाता है, उनके नियंत्रण में थे।

समय के साथ इन महंतो का भ्रष्टाचार खुल कर सामने आने लगा था, साथ ही सिख धर्म जहां जातिगत भेदभाव के खिलाफ था, वहीं हिंदू महंतो के कारण गुरुद्वारों में प्रवेश के लिए भी जातिगत भेदभाव होने लगा था, जिसके खिलाफ ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी की स्थापना की गई थी..और पंजाब के सिखों ने भ्रष्ट महंतो से गुरुद्वारों को मुक्त कराने के लिए और गुरुद्वारों का प्रबंधन सिखों के हाथों में लाने के लिए सामाजिक और धार्मिक आधार पर सुधार आंदोलन चलाने का फैसला किया, और तब नींव पड़ा अकाली आंदोलन की..

क्या है अकाली आंदोलन

अकाली आंदोलन 1920 में शुरु हुआ था, जिसका सबसे बड़ा ही भ्रष्ट महंत थे, अकाली दल सिखों का दल था, और उन लोगो ने गुरुद्वारों के प्रबंधन को स्वतंत्र करने और सामाजिक तौर पर सिखों की अहमियत बढ़ाने के लिए आंदोलन करने का फैसला किया था। इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले 4 प्रमुख नाम थे- पहले थे बाबा खड़क सिंह, दूसरे थे मास्टर तारा सिंह, तीसरे थे करतार सिंह झब्बार, और चौथे थे सरदार बहादुर मेहताब सिंह। बाबा खड़क सिंह एससीपीसी के अध्यक्ष थे, केंद्र के लीडर भी,. तो वहीं मास्टर तारा सिंह एसजीपीसी के जेनेरल सेक्रेट्री थे, वहीं करतार सिंह जब्बार ने इस आंदोलन में बड़ा अहम रोल प्ले किया था।

गुरुद्वारों के लिए होने वाले खर्चे का मिसयूज

इस आंदोलन को करने के पीछे शिरोमणी अकाली दल की केवल एक ही मंशा थी कि किसी तरह से गुरुद्वारों के लिए होने वाले खर्चे का मिसयूज रोका जाये, महंतो की मनमानी को रोका जायें, नीजि कामों के लिए गुरुद्वारों की जमीनों का इस्तेमाल रोका जाये और गुरुद्वारों का संरक्षण उनके हाथों में आये जो सहीं मायनों में गुरुद्वारों के होने का महत्व बखूबी समझते है। उन्होंने तय कर लिया था कि वो ये साबित करके रहेंगे कि वाकई में गुरूवारों का प्रबंधन कैसे होना चाहिए, वो ये आंदोलन करके जीत हासिल करके साबित कर देंगे।

5 साल तक चला आंदोलन

इस आंदोलन के तहत महंतो की सिखो के प्रति दमनकारी नीति और उनके समर्थक ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करके ये बताना था कि सिखों की परंपरा, उनका अनुशासन और महंतो के भ्रष्टाचार दमन से आजादी हर हाल में लेना ही था, हालांकि करीब 5 साल तक ये आंदोलन चलता रहा, क्योंकि अंग्रेजी हुकुमत किसी भी हाल में इस आंदोलन को बड़े स्तर पर नहीं होने देना चाहती थी। इस कारण इसे कमजोर करने के लिए जहां भी अकाली लोग जमा होते थे, महंतो के साथ वहां हमले करवा दिये जाते थे, ताकि वो तितर बितर हो जाये।

लेकिन सिख अपनी जिद से पीछे नहीं हटे। उन्होंने ने अहिंसापूर्ण आंदोलन जारी रखा, उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता, लेकिन तब भी वो शांतिपूर्ण मोर्चा निकालते, एक साथ प्रार्थनायें करते और शांति से गिरफ्तारी देते.. उन्हें आर्थिक तौर पर काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता था, लेकिन फिर भी उन लोगो ने सबकुछ शांति से सहा। करीब 5 सालों तक ये सब चलता रहा, लेकिन सिखों के बुलंद हौसलो के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा, और आखिरकार सिख गुरुद्वारा एक्ट ऑफ 1925 को पंजाब लेजिसलेटिव काउंसिल ने मंजूरी दे दी, जिसके तहत पंजाब के सभी गुरुद्वारों की देखरेख, उनकी रख रखाव से लेकर वित्तिय फैसले भी शिरोमणी अकाली समिति के हाथों में आ गई।

जलियांवाला नरसंहार

इस एक्ट के कारण गुरुद्वारों पर से महंतो का अधिकार पूरी तरह से समाप्त हो गया, और पंजाब को महंतो के लालच, दमन और भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल गई। 1919 में जलियांवाला नरसंहार ने अकाली मूवमेंट के शुरू होने और शिरोमणी अकाली दल के गठन में सबसले अहम रोल निभाया था। इस नरसंहार के बाद ही सिखों ने ये समझ लिया था कि अगर सम्मान चाहिए तो पूरी तरह से सिखों का काबू उन स्थानों पर होना चाहिए, जहां से पूरा पंजाब इफेक्ट होता है। मौजूदा समय में अकाली मूवमेंट के कारण आज भी शिरोमणि अकाली समिति एक मजबूत संगठन है.. जिसका प्रभाव आज के समय में केवल पंजाब में ही नहीं बल्कि पूरे भारत के गुरुद्वारों में देखने को मिलता है। 5 सालो की कड़ी तपस्या ने बताया कि एकजुटता औक दृढ़ संकल्प के दम पर आप अपनी मंजिल हासिल कर ही लेंगे।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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