Parivartini Ekadashi 2025: व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 03 सितम्बर 2025, 05:30 AM Updated: 03 सितम्बर 2025, 05:30 AM
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Parivartini Ekadashi 2025: परिवर्तिनी एकादशी (जिसे जलझूलनी एकादशी और पद्मा एकादशी भी कहते हैं) भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है और सभी पापों का नाश होता है। तो चलिए आपको इस लेख में परिवर्तिनी एकादशी के शुभ मुहूर्त, व्रत और पूजा विधि के बारे में विस्तार से बताते है।

व्रत एवं पूजा विधि (Parivartini Ekadashi Puja Vidhi)

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत महत्व माना जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और हर महीने में दो बार आता है – एक कृष्ण पक्ष में और दूसरा शुक्ल पक्ष में। इस व्रत को अलग-अलग तरीकों से रखा जाता है, जैसे कुछ लोग केवल फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग पानी भी नहीं पीते। इस व्रत को रखने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण हैं। वही आपके मन में सवाल होगा की परिवर्तिनी एकादशी शुभ मुहुर्त क्या है।

परिवर्तिनी एकादशी 2025: शुभ मुहूर्त

तिथि प्रारंभ: 03 सितंबर 2025, गुरुवार रात्रि 08:06 बजे

तिथि समाप्ति: 4 सितंबर दोपहर 1 बजकर 36 मिनट से शाम 4 बजकर 7 मिनट तक

एकादशी के दिन सुबह भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। स्नान के बाद मंदिर की सफाई करें और उसमें गंगाजल डालें। अब पूजा स्थल पर एक चौकी पर बैठकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। भगवान श्री हरि के साथ शुद्ध घी या तेल का दीपक जलाएँ। वही भगवान् विष्णु को पीला फूल, तुलसी पत्ता, धूप, दीप, घी, नैवेद्य (फल या सूखे मेवे), पंचामृत, श्रीफल आदि चढ़ए।

इसके अलावा, रात्रि में भजन-कीर्तन करें, “विष्णु सहस्रनाम” या “भगवद्गीता” का पाठ करें। या फिर रात्रि जागरण भी कर सकते हैं (जागने से अधिक पुण्य मिलता है)। आपको बता दें, व्रत के अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और उन्हें दक्षिणा दें। इसके बाद व्रती को अन्न-जल ग्रहण करना चाहिए।

परिवर्तिनी एकादशी का महत्व

इस दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में विचरण करते हैं, इसलिए इसे “परिवर्तिनी एकादशी” कहते हैं। यह चातुर्मास का वह विशेष समय है जब भगवान विश्राम में होते हैं। यह व्रत पापों से मुक्ति, मोक्ष मार्ग की प्राप्ति और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस व्रत का फल हजारों यज्ञों के बराबर माना जाता है।

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