1984 Anti-Sikh Riots: 40 साल बाद भी दंगों की तड़प! सिखों के कत्लेआम में खोई जिन्दगी, इंसाफ की तलाश में भटकती रहीं ये महिलाएं

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 23 Jun 2025, 12:00 AM | Updated: 23 Jun 2025, 12:00 AM

1984 Anti-Sikh Riots: भारत के इतिहास में 1984 का साल एक दुखद अध्याय के रूप में दर्ज है, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सिखों के खिलाफ सामूहिक हिंसा हुई। इस हिंसा में सैकड़ों सिखों की हत्या की गई, उनके घर जलाए गए और महिलाओं के साथ अत्याचार किए गए। आज, 40 साल बाद भी दंगे में मारे गए लोगों के परिवारों का संघर्ष जारी है। उनका जीवन कभी सामान्य नहीं रहा, और उन्होंने ना सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक आघात भी झेला है। इस वक्त की दो महिलाओं, निर्मल कौर और पप्पी, की कहानी उनके द्वारा झेले गए दर्द और संघर्ष की गवाह है।

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1984 के दंगे और उनका असर- 1984 Anti-Sikh Riots

31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में जो उन्माद फैल गया था, वह 3 नवंबर तक जारी रहा। इस दौरान सिखों को एक शिकार के रूप में देखा गया और सैकड़ों लोगों की हत्या की गई। हिंसा में महिलाओं के साथ बलात्कार, संपत्ति का नुकसान और कई बार तो लोगों को जिंदा जला दिया गया। 40 साल बाद, इस दर्दनाक इतिहास को पीछे छोड़ने के बावजूद, सिख विरोधी दंगों के पीड़ित परिवारों की यादें और उनका दर्द आज भी ताजे हैं।

टीयरिलक विहार: विधवा कॉलोनी का दिल

पश्चिम दिल्ली के तिलक विहार के सी ब्लॉक में आज भी उन दंगों के जिंदा उदाहरण मिलते हैं, जहां इस हिंसा के शिकार हुए परिवारों ने अपना पुनर्वास किया है। यह इलाका आज “विधवा कॉलोनी” के नाम से जाना जाता है। यहां की सड़कें धूल और कचरे से भरी हुई हैं, घर जर्जर हो गए हैं, और कई परिवार अब भी अपने जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। इन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोने के बाद भी संघर्ष जारी रखा है, वे आज भी न्याय की तलाश में हैं।

चम्मी कौर की दर्दभरी दास्तान

चम्मी कौर का दर्द 1984 के दंगों से जुड़ा हुआ है। वह लगभग 80 वर्ष की हो चुकी हैं और अब भी अपने पति, इंदर सिंह, और बड़े बेटे मनोहर सिंह की मौत के बारे में याद करती हैं। उनके परिवार का सुखमय जीवन उस दिन समाप्त हो गया जब 1 नवंबर को त्रिलोकपुरी गुरुद्वारे में आग लगाई गई और उनकी आँखों के सामने उनके पति और बेटे को बेरहमी से मार दिया गया। चम्मी कौर आज भी न्याय की उम्मीद करती हैं, और उनका कहना है कि दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।

पप्पी की न्याय की तलाश

चम्मी की बेटी, पप्पी, जो अब 55 वर्ष की हैं, दिल्ली के एक सब्जी की दुकान का संचालन करती हैं, लेकिन उनके दिल में हमेशा एक ही सवाल है – “क्यों?” वह भी अपनी मां के साथ नियमित रूप से अदालत की सुनवाई में भाग लेती हैं, जहां वह उन आरोपियों को सजा दिलाने की उम्मीद करती हैं, जिन्होंने उनके पिता और रिश्तेदारों को मारा। पप्पी के लिए दिवाली अब कभी वैसी नहीं रही जैसी पहले थी। वह बताती हैं कि दंगों के बाद, जब वह और उनकी मां दिवाली के दिन घर लौटे, तो उन्हें केवल उनके पिता की तस्वीर और एक पगड़ी मिली थी।

निर्मल कौर की संघर्ष की कहानी

निर्मल कौर ने भी अपनी ज़िन्दगी में बहुत दर्द झेला है। उनकी कहानी भी एक संघर्ष की दास्तान है, जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने पिता, लक्ष्मण सिंह, और चाचाओं को मौत के घाट उतारते हुए देखा। उनका कहना है कि उनके परिवार को बचाने के लिए गुरुद्वारों और राहत शिविरों से सहायता मिली। हालांकि, उन्हें और उनके परिवार को पुनर्वास में बहुत समय और संघर्ष का सामना करना पड़ा। मुआवजा भी देर से मिला और कई बार न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

मुआवजा और पुनर्वास

कई दंगा पीड़ित परिवारों को शुरुआत में मुआवजा के रूप में 10,000 रुपये की दो किश्तें दी गई थीं, लेकिन बाद में अदालत के हस्तक्षेप के बाद उन्हें लगभग 3.3 लाख रुपये मिले। कुछ सालों बाद यह राशि बढ़कर 5 लाख रुपये हो गई। हालांकि, इन परिवारों की जिंदगी में एक स्थिरता की कमी बनी रही है, क्योंकि उन्हें दी गई राशि कभी भी उनके खोए हुए परिवार के सदस्यों की भरपाई नहीं कर सकती। इन परिवारों ने सिख दंगे के बाद सरकारी नौकरियों का वादा किया था, लेकिन वह वादा आज भी अधूरा है।

शहीद गंज गुरुद्वारा: यादें और प्रार्थना

तिलक विहार के बी ब्लॉक में शहीद गंज गुरुद्वारा स्थित है, जो दंगा पीड़ितों की याद में समर्पित है। इस गुरुद्वारे में हर दिन पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद लेकर प्रार्थना करते हैं। शेर सिंह, जो खुद एक दंगा पीड़ित हैं, कहते हैं कि जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने पिता और चाचा को मारा जाता देखा, तो वह आज भी उन घटनाओं को भूल नहीं पाए हैं। वह कहते हैं कि मुआवजा कुछ मदद कर सकता है, लेकिन जो कुछ भी हमसे छीन लिया गया, वह कभी लौट कर नहीं आएगा।

1984 के सिख विरोधी दंगे केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए दर्द, संघर्ष और न्याय की निरंतर तलाश का प्रतीक बन चुके हैं। यह सवाल उठता है कि आखिर कब तक इन परिवारों को न्याय का इंतजार करना होगा? 40 साल बाद भी उनके जीवन में जो खालीपन है, उसे कोई मुआवजा और कोई सरकार भर नहीं सकती। इन महिलाओं की आवाज़ और उनका संघर्ष इस बात की गवाही है कि समाज में शांति और न्याय के लिए हमें अतीत की गलतियों को ठीक करने की जरूरत है।

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