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21 साल बाद जालियावाला बाग हत्याकांड का बदला लेने वाले जांबाज की कहानी…

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 22 Apr 2023, 12:00 AM | Updated: 22 Apr 2023, 12:00 AM

जब भी हम 13 अप्रैल 1919 में हुए जालियावाला बाग काण्ड को याद करते हैं तो हमारे जहाँ में ब्रिटिश हुकूमत का वो खूनी शैतान माइकल ओ’डायर का जिक्र आता है. ये वही शासक था जिसने जलिवाला बाग में मस्सों निहाथों पर गोलियां बरसाई थी. 13 अप्रैल से पहले 9 अप्रैल को महात्मा गांधी इसी पार्क में आने वाले थे. जो कि उनकी गिरफ्तारी के चलते संभव नहीं हो पाया था. और गांधी के पीछे ही 10 अप्रैल को सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू भी बंदी बना लिए गए.

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इन महानायकों की गैरमौजूदगी के चलते भी उस दिन यानि 13 अप्रैल को करीब 20000 लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. तभी जर्नल डायर ने इस पार्क को तीनों तरफ से बंद करवाकर बेगुनाह लोगों पर फायरिंग के आदेश दिए थे. जिसमे ब्रिटिश सरकार मानती थी कि इस गोलीबारी में 379 जानें गईं.

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कांग्रेस ने इस नरसंहार में मरने वालों की संख्या 1500 के आसपास बताई थी. इस घटना के चलते रवींद्रनाथ टैगोर अंग्रेजी से इतना आहत हुए कि उन्होंने उनके द्वारा दी गयी अंग्रेजों की ‘नाइट हुड’की उपाधि तक लौटा दी थी. मामले की जांच के लिए हंटर कमेटी बनी. लेकिन कमेटी ने इस गोलीबारी के लिए सरकार को दोषी नहीं पाया. कहा गया – ‘भीड़ इतनी ज्यादा थी कि गोली चलाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.’डायर ने केवल ‘फैसला लेने में भूल’की थी.

चर्चिल जैसे नेता ने भी ब्रिटिश संसद में ‘इस अमानवीय हत्याकांड को ब्रिटिश इतिहास में एक धब्बा बताया था. ’डायर को हटा दिया गया. निहत्थों पर गोली चलाने के लिए उसे कोई सजा नहीं दी गई. इसके उलट हाउस ऑफ लॉर्ड्स के अनुदारवादी मेंबरान ने डायर को ब्रिटिश हुकूमत की हिफाजत के सम्मान में एक तलवार और 26 हजार पौंड की रकम भेंट की.

क्या हुआ था जालियावाला बाग में उस दिन?

दरअसल 13 अप्रैल 1919 को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा इम्पोज किये गए हजारों लोग रौलट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे. तभी जनरल डायर अपने 100 बंदूकधारी सिपाहियों के साथ उस बाग में पहुंचा. वहां पहुंचकर बिना किसी चेतावनी के उसने गोलियां चलवानी शुरू कर दीं. गोलियां चलते ही सभा में भगदड़ मच गई. जलियांवाला बाग कांड के समय माइकल ‘ओ’ ड्वायर पंजाब का गर्वनर था, और लोगों पर गोली चलवाने का आदेश भी माइकल ‘ ओ’ ड्वायर का ही था.

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कई इतिहासकारों का मानना है कि ये हत्याकांड ओ’ ड्वायर व अन्य ब्रिटिश अधिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जो पंजाब पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पंजाबियों को डराने के उद्देश्य से किया गया था. यही नहीं, ओ’ ड्वायर बाद में भी जनरल डायर के समर्थन से पीछे नहीं हटा था.

उधम ने लन्दन में लिया इस काण्ड का बदला

1919 में जब जलियांवाला बाग कांड हुआ था, तब शहीद उधम सिंह की उम्र 20 साल थी और अपनी जवानी में ही उधम सिंह ने कसम खा ली थी कि वो जलियांवाला बाग कांड के लिए जिम्मेदार पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर और गोली चलाने वाले जरनल रेगीनॉल्ड डायर से बदला लेंगे.

जलियांवाला बाग कांड के कोई इक्कीस साल बाद वो मौका आ गया था. जलियावांला कांड की बरसी के ठीक एक महीने पहले 13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में हुई ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की सभा में उधम सिंह ने ड्वायर की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

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आपको ये भी बता दें कि जहां ड्वायर की गोली मारकर हत्या हुई थी, वहीं डायर की मौत आर्टेरिओस्क्लेरोसिस (धमनियों की बीमारी) और सेरेब्रल हैमरेज के कारण 1927 में हुई थी. इस कांड में लॉर्ड जेटलैंड, लॉर्ड लैमिंग्टन, सर लुइस डेन घायल भी हुए थे. जब महात्मा गांधी ने यह खबर 14 मार्च की सुबह अखबारों में पढ़ी तो वह रायगढ़ में थे. यहां 15 से 19 मार्च तक कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक होनी थी. 14 मार्च को उन्होंने अखबारों में जारी अपने वक्तव्य में इस घटना और निंदा की.

21 साल बाद उधम सिंह ने लिया था बदला

अपनी 21 साल पुरानी कसम को पूरा करने के बाद भी उधम उस सभा भागने तक की कोशिश नहीं की जहाँ उन्होंने जरनल ओ’ डायर को गोली मारी थी. और जब उधम सिंह को अंग्रेज पुलिस गिऱफ्तार करके ले जा रही होती है. तब भी आज़ादी का ये मतवाला मुस्कुरा रहा है.. लंदन की अदालत में भी शहीद उधम सिंह ने भारत माता का पूरा मान रखा और सर तान कर कहा, ‘मैंने माइकल ओ डायर को इसलिए मारा क्योंकि वो इसी लायक था. वो मेरे वतन के हजारों लोगों की मौत का दोषी था.

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वो हमारे लोगों को कुचलना चाहता था और मैंने उसे ही कुचल दिया. पूरे 21 साल से मैं इस दिन का इंतज़ार कर रहा था. मैंने जो किया मुझे उस पर गर्व है. मुझे मौत का कोई खौफ नहीं क्योंकि मैं अपने वतन के लिए बलिदान दे रहा हूं. 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में उधम सिंह को हंसते-हंसते फांसी को चूम लिया. जब तक हिंदुस्तान रहेगा अमर शहीद उधम सिंह की इस वीरगाथा को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा.

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