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जब एक वेश्या की वजह से बदल गए थे Swami Vivekananda के विचार, जानिए क्या था वो किस्सा?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 21 Dec 2021, 12:00 AM | Updated: 21 Dec 2021, 12:00 AM

स्वामी विवेकानंद का जीवन उनके जीवित रहते हुए और उनके जाने के सालों साल बाद भी युवाओं को इंस्पायर करता रहा है और करता रहेगा। वे एक ऐसे संन्यासी हुए जो देश-समाज की भलाई के लिए हमेशा काम करते रहे और युवाओं के आदर्श बन गए। उनके संदेश आज भी लोगों को एक ऐसा रास्ता दिखाता है जो लोगों के हित में हो। उनके जन्मदिवस को यानी कि 12 जनवरी की तारीख को युवा दिवस के तौर पर मनाया जाता है। युवा दिवस का मनाया जाना पूरी तरह से विवेकानंद को समर्पित है। 

ये वो बाते हैं विवेकानंद के बारे में जिसे उनको मानने वाले लोग जानते, सुनते और पढ़ते आए हैं, लेकिन क्या आपको ये पता है कि अपने ज्ञान के बल पर दुनिया जीतने वाले स्वामी विवेकानंद एक बार एक वेश्या के आगे हार गए थे? चलिए उनके जीवन में घटी इसी घटना को जान लेते हैं…

बात तब की है जब जयपुर के पास एक छोटी-सी रियासत में स्वामी विवेकानंद बतौर मेहमान पहुंचे, जहां वे कुछ दिन रुके और फिर विदा लेने लगे। विवेकानंद विदा ले रहे थे तो इस मौके पर राजा जी के तरफ से एक स्वागत समारोह का आयोजन किया गया, जिसके लिए एक बहुत ही फेमस वेश्या को बनारस से बुलाया गया। अब स्वामी जी ठहरे संन्यासी तो भई जब राजा की तरफ से स्वागत समारोह में जब एक वेश्या को बुलाने की बात स्वामी जी को पता चली तो वो संशय में पड़ गए। एक वेश्या के समारोह में भला एक संन्यासी का काम ही क्या। ऐसा सोच उन्होंने समारोह में जाने से मना कर दिया और अपने कमरे से बाहर नहीं आए। 

इस पूरी घटना के बारे में उस वेश्या को पता चला। उसे पता चला कि जिस महान व्यक्तित्व के स्वागत समारोह के लिए उसको बनारस से बुलाया गया वो संन्यासी सिर्फ उसकी ही वजह से समारोह में आना नहीं चाहता है। ये सब जानकर कर उसे बहुत धक्का लगा और वो सूरदास का एक भजन गाने लगी। उसने गया ‘प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो…’ इस भजन के भाव थे कि लोहे के हर टुकड़े को अपने स्पर्श से एक पारस पत्थर तो सोना बनाता है फिर चाहे पूजा घर में रखा वह लोहे का टुकड़ा हो या फिर कसाई के यहां। अगर पारस पूजा घर वाले लोहे के टुकड़े और कसाई के यहां के लोहे के टुकड़े में फर्क करता है यानी कि बस पूजा घर वाले लोहे के टुकड़े को ही छूता है और सोना बनाता है तो फिर वह पारस पत्थर असली नहीं है। 

स्वामी विवेकानंद ने उस महिला के भजन को सुना और फिर वहीं पहुंच गए, जहां पर वो भजन गा रही थी। स्वामी जी को देखते ही वेश्या कि आंखों से आंसू बहते ही जा रहे थे। अपने एक संस्मरण में स्वामी विवेकाकंद ने इस बात का जिक्र किया कि उस दिन उन्होंने पहली दफा एक वेश्या को देखा पर उसके लिए उनके मन में न कोई आकर्षण था और न तो विकर्षण। असल में उन्हें तब ये पहली दफा अनुभव हुआ कि वे पूरी तरह से एक संन्यासी बन चुके हैं। अपने संस्मरण में स्वामी जी ने ये भी लिखा कि पहले अपने घर से जब वो निकलते थे या फिर कहीं से होकर अपने घर जाना होता तो उनको दो मील तक चक्कर काटना पड़ता था क्योंकि वेश्याओं का एक मोहल्ला उनके घर के रास्ते में ही पड़ता था। ऐसे में संन्यासी होने की वजह से वहां से गुजरना वे संन्यास धर्म के खिलाफ समझते थे पर उस दिन राजा के स्वागत समारोह में उनको अनुभव हुआ कि एक असली संन्यासी वो है जो वेश्याओं के मोहल्ले से भी गुजरे तब भी कोई फर्क न पड़े।

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