West Bengal News: 6600 कंपनियां छोड़ गईं बंगाल! ममता सरकार के खिलाफ कोर्ट पहुंची इंडस्ट्रीज, ‘पूरब का मैनचेस्टर’ बना मजदूरों का एक्सपोर्ट हब

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 22 Sep 2025, 12:00 AM | Updated: 22 Sep 2025, 12:00 AM

West Bengal News: पश्चिम बंगाल में उद्योगों को दी जाने वाली तीन दशक पुरानी प्रोत्साहन योजनाओं को खत्म करने के राज्य सरकार के फैसले से बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। देश की नामी-गिरामी कंपनियाँ अल्ट्राटेक सीमेंट, ग्रासिम इंडस्ट्रीज, इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग, डालमिया सीमेंट और नुवोको विस्तास अब कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी हैं, जहाँ उन्होंने सरकार के इस फैसले को ‘असंवैधानिक’ और ‘उद्योग-विरोधी’ करार दिया है।

हाईकोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को संयुक्त रूप से सुनने का निर्णय लिया है, और अगली सुनवाई की तारीख 7 नवंबर 2025 तय की गई है।

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क्या है पूरा मामला? West Bengal News

मार्च 2025 में ममता बनर्जी सरकार ने ‘पश्चिम बंगाल अनुदान और प्रोत्साहन की प्रकृति में प्रोत्साहन योजनाओं और दायित्वों का निरसन विधेयक, 2025’ पारित किया था। यह कानून अप्रैल में अधिसूचित हो गया, जिसके तहत 1993 से अब तक लागू सभी औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाएँ रद्द कर दी गईं। इसमें वो सभी सुविधाएँ शामिल थीं जो राज्य ने कंपनियों को आकर्षित करने के लिए दी थीं – जैसे:

  • जमीन पर सब्सिडी
  • टैक्स रिफंड
  • बिजली दरों पर छूट
  • ब्याज में राहत
  • और अन्य वित्तीय लाभ

सरकार का कहना है कि अब इन संसाधनों को आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के कल्याण के लिए उपयोग किया जाएगा। लेकिन कंपनियों का कहना है कि यह फैसला पीछे से वार जैसा है, जिससे उनके मौजूदा निवेश खतरे में पड़ गए हैं।

कंपनियों की दलीलें

इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग ने कोर्ट में कहा है कि यह अधिनियम ‘राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर’ और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उनका दावा है कि उन्होंने राज्य की नीतियों पर भरोसा करके निवेश किया, और अब जब वो सुविधाएँ अचानक छीनी जा रही हैं, तो ये सीधे-सीधे ‘वादा तोड़ने’ जैसा है।

कंपनियाँ यह भी कह रही हैं कि इस फैसले से राज्य में काम करना आर्थिक रूप से मुश्किल हो गया है और उनकी उत्पादन लागत तेजी से बढ़ रही है।

उद्योग और राजनीति के टकराव की लंबी कहानी

पश्चिम बंगाल का औद्योगिक इतिहास अक्सर राजनीति के हस्तक्षेप से बर्बाद होता आया है। वामपंथी शासन में मजदूर यूनियनों की सख्ती और पूंजी-विरोधी सोच ने कई कंपनियों को बाहर जाने पर मजबूर किया। वहीं, ममता बनर्जी भी सत्ता में सिंगुर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों के बल पर आईं जहाँ फैक्ट्रियों के लिए जमीन अधिग्रहण का जमकर विरोध हुआ।

2011 से अब तक 6,600 से ज्यादा कंपनियाँ बंगाल छोड़ चुकी हैं, जिनमें 2,200 सिर्फ पिछले पाँच साल में चली गईं। जुलाई 2025 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि ये कंपनियाँ ज्यादातर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली चली गईं। ब्रिटानिया ने 2024 में अपनी कोलकाता यूनिट बंद कर दी और टाटा तो पहले ही सिंगुर से बाहर हो चुका था।

विकास की जगह वोट बैंक?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आर्थिक कम, राजनीतिक ज्यादा है। 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं पर ज़ोर दिया है। लेकिन इसकी कीमत राज्य के औद्योगिक भविष्य को चुकानी पड़ रही है।

जहाँ दूसरे राज्य सस्ती ज़मीन, टैक्स छूट और तेज़ मंजूरी प्रक्रिया देकर निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं, वहीं बंगाल में अनिश्चितता, राजनीतिक हस्तक्षेप और पॉलिसी रिवर्सल का डर है।

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