वसीम रिजवी अब जितेंद्र नारायण त्यागी हो गए हैं, क्यों सनातनी बनने पर हो गए मजबूर ! यहां है बड़ा खुलासा

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 07 Dec 2021, 12:00 AM | Updated: 07 Dec 2021, 12:00 AM

यूपी शिया वक्‍फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी अब जितेंद्र नारायण त्यागी हो गए हैं। ये खबर तो अब तक फैल ही गयी है लेकिन वसीम के जितेंद्र बनने के पीछे क्या वजह हो सकती है और उनसे जुड़े ऐसे क्या मुद्दे रहे की उनको सनातनी बनना पड़ा? चलिए इस वीडियो में डीटेल में जानते है सबकुछ। 6 दिसंबर को इस्लाम धर्म से निकलकर सनातन धर्म अपनाया और अपना नाम वसीम रिजवी ने जितेंद्र नारायण त्यागी कर लिया। हिंदू बन जाने के बाद उन्होंने कहा कि जब मुझे इस्लाम से निकाला गया तो अब मेरी मर्जी है कि मैं कौन सा धर्म अपनाऊं। उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे पहला धर्म सनातन धर्म है, जितनी उसमें अच्छाइयां पाई जाती हैं उतनी किसी धर्म में नहीं हैं। कौन हैं वसीम रिजवी जो धर्म बदलकर सुर्खियां बंटोर रहे हैं। 

साल 2017 से वसीम रिजवी काफी चर्चाओं में रहे हैं। यहां कर कि देश की 9 मस्जिदों को उन्होंने हिंदुओं को सौंप देने तक की बात उठा डाली थी। रिजवी एक नहीं कई कई बातों के लिए सुर्खियों में बने रहते हैं। कुतुब मीनार परिसर में जो मस्जिद है उसको हिंदुस्तान की धरती पर एक कलंक तक बता दिया था रिजवी उर्फ त्यागी ने।  आतंकवाद से मदरसों की तलीम को जोड़ा था और सबसे ज्यादा बवाल तो उनकी उस मांग पर हुई जब कुरान की 26 आयतों को हटाने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका तक दायर कर दी फिर क्या था शिया और सुन्नी समुदाय के उलेमाओं ने उन पर एक के बाद एक फतवा देकर उन्हें इस्लाम से ही निकाल दिया। 

मुस्लिम लोगों ने तो वसीम रिजवी के अगेंट्स आवाज उठाई ही यहां तक कि उनकी फैमिली के लोग भी उनके अगेंट्स हो गए। मां और भाई ने तो रिजवी से अपने रिश्ते ही तोड़ लिए। आखिर में गाजियाबाद के देवी मंदिर में वसीम रिजवी को यति नरसिंहानंद सरस्वती ने हिंदू धर्म में जोड़ लिया। वसीम रिजवी से जितेंद्र नारायण त्यागी बनकर भगवा बाना पहने, माथे पर त्रिपुंड लगाए रिजवी ने कई कई बया दिए। उन्होंने कहा कि मुझे इस्लाम से निकाला गया और अब मेरी मर्जी मैं कौन सा धर्म अपनाऊं। सनातन धर्म दुनिया का पहला धर्म है, जितनी उसमें अच्छाइयां पाई जाती हैं और किसी धर्म में नहीं है। इस्लाम के बारे में भी उन्होंने कहा कि इस्लाम को हम धर्म ही नहीं समझते। उन्होंने कहा कि हमारा सिर काटने के लिए हर जुमे की नमाज के बाद फतवे दिए जाते हैं तो ऐसी हालत में हमको कोई मुसलमान कहे ऐसे में खुद शर्म आती है। शिया मुस्लिम फैमिली में रिजवी पैदा हुए और उनके पिता रेलवे कर्मचारी रहे पर रिजवी जब छोटे थे तभी उनके पिता का निधन हुआ और रिजवी और उनके भाई-बहनों की जिम्मेदारी मां ने उठाई। 12 वी के बाद रजवी सऊदी अरब में एक होटल में काम के लिए गए और फिर जापान और अमेरिका भी गए। एक वक्त बाद लखनऊ आकर खुद का काम किया और फिर उन्होंने नगर निगम का चुनाव भी लड़ने की ठानी। इस तरह से वे राजनीति में आ गए। 

इसके बाद शिया मौलाना कल्बे जव्वाद के करीबी हो गए रजवी और शिया वक्फ बोर्ड के मेंबर बन गए। रिजवी की दो शादियां हैं और दोनों ही लखनऊ में हुई। पहली बीवी से तीन बच्चे और दूसरी से दो बेटियां और एक बेटा है। साल 2003 में शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का चेयरमैन सपा नेता मुख्तार अनीस को बनाया गया पर अनीस के चेयरमैन रहते हुए मौलाना कल्बे जव्वाद  एक वक्फ संपत्ति को बेचे जाने के खिलाफ हो गए। ये संपत्ति लखनऊ के हजरतगंज में है। जिसके बाद अनीस से बोर्ड के चेयरमैन पद ले लिया गया और फिर साल 2004 में वसीम रिजवी को मौलाना कल्बे जव्वाद की सिफारिश पर शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन का पद दिया गया। 

जब साल 2007 आया तो सरकार मायावती की बनी और वसीम रिजवी ने सपा छोड़ा और बसपा में शामिल हुए। साल शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का उनका जो पांच साल का कार्यकाल था वो 2009 में खत्म हुआ जिसके बाद नए शिया बोर्ड का गठन हुआ तो जव्वाद के सपोर्ट से चेयरमैन पद उनके बहनोई जमालुद्दीन अकबर को दिया गया और यही से वसीम रिजवी और मौलाना जव्वाद के बीच तल्खी आ गयी। फिर गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। शिया वक्फ बोर्ड पर साल 2010 में भ्रष्टाचार का आरोप लगे तो तब के चेयरमैन अकबर ने पद छोड़ा और फिर से रिजवी ने शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष पद अपने हाथों में लिया। तीन साल के बाद 2012 में सरकार बदली और इसी के दो महीने बाद यानी कि 28 मई को वक्फ बोर्ड भंग हो गया. कहते हैं कि वसीम रिजवी आजम खान के करीबी माने गए और इस वजह से फिर से वक्फ बोर्ड के चेयरमैन साल 2014 में बन गए ऐसे में सपा के अगेंट्स मौलाना कल्बे जव्वाद ने हल्ला बोला। यहां तक विरोध प्रदर्शन के लिए समर्थकों के साथ सड़क पर उतर आए पर आजम खान का प्रभाव ही रहा कि वसीम रिजवी ही बोर्ड के अध्यक्ष रहे। 

सरकार बदली साल 2017 में इसी के साथ रिजवी ने भी अपना सियासी पहलू बदला।  बोर्ड के चेयरमैन का कार्यकाल 18 मई 2020 को  खत्म हुआ पर फिर वे अध्यक्ष नहीं बन पाए। रिजवी अब भी बोर्ड के सदस्य है। रिजवी पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे। आरोप लगे कि वक्फ संपत्तियों में उन्होंने भ्रष्टाचार किया और उन पर कई एफआईआर भी दर्ज कराए गए। वसीम रिजवी समेत कुल 11 लोगों पर प्रदेश के पांच जिलों में धांधली के केस दर्ज किए गए और सूबे के शिया वक्फ संपत्तियों को सीबीआई ने गैर कानूनी तरीके से बेच देने और खरीदने इसके साथ ही हस्तांतरित करने तक का आरोप दर्ज किया हैं। फिलहाल उनके इस्लाम धर्म छोड़कर हिंदू बनना काफी सुर्खियों में तो है पर इतना जरूर है कि रिजवी से जुड़ी जो हिस्ट्री और मामले हैं उसकी वजह से भी रिजवी काफी सुर्खियों में रहे हैं।

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