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25 साल पहले कूड़े के ढेर में मिली यह दृष्टिबाधित लड़की दुनिया के लिए बनी मिसाल

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 18 May 2024, 12:00 AM | Updated: 18 May 2024, 12:00 AM

आजकल सोशल मीडिया पर एक अंग्रेजी मुहावरा काफी वायरल हो रहा है जिसमें लिखा होता है, ‘Every child deserves parents, but not all parents deserve children’…जिसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस प्रकार है,  ‘हर बच्चे को माता-पिता का हक है, लेकिन सभी माता-पिता को बच्चे का हक नहीं है’…. इससे पहले कि आप मेरी बातों से आहत हों, मैं आपको एक सच्ची घटना से जुड़ी कहानी बताती हूं, जिसे जानने के बाद आप खुद ही तय कर लेंगे कि मैंने जो लिखा है वो सही है या गलत। कहानी शुरू होती है 25 साल पहले जब महाराष्ट्र के जलगांव रेलवे स्टेशन पर लोग अपनी ट्रेनों का इंतजार कर रहे थे…. कुछ बच्चे अपने माता-पिता से चिप्स और कुरकुरे की जिद कर रहे होते हैं… सफाईकर्मी स्टेशन की सफाई के लिए झाड़ू निकाल रहा होता है कि अचानक से ये माहौल शांत हो जाता है जब स्टेशन के पास से एक नवजात बच्चे के रोने की आवाज सुनाई देती है। सभी लोग आवाज को ध्यान से सुनते हैं और बच्चे के रोने की आवाज की तरफ दौड़ पड़ते हैं। इसके बाद लोगों ने जो देखा उसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। दरअसल ये आवाज कूड़े के ढेर में पड़े एक नवजात बच्चे की आ रही थी। गंदगी और बदबू के बीच कपड़े के टुकड़े में लिपटी बच्ची को देखकर लोग चौंक गए। लोगों ने बच्ची को उठाया और फिर स्टेशन पर मौजूद पुलिस को इसकी सूचना दी गई। ये बच्ची दृष्टिहीन थी प्राथमिक उपचार के बाद उसे 270 किलोमीटर दूर अमरावती के परतवाड़ा में स्थित, बधिर एवं दृष्टिहीन पुनर्वास गृह में भेज दिया गया।

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दृष्टिहीन बची ने बदला लोगो का नजरिया

पुनर्वास गृह में लड़की को नया घर और पहचान मिली। लड़की का नाम माला पापलकर रखा गया। वह यहीं पली-बढ़ी और पढ़ाई करने लगी। माला पढ़ाई में बहुत होशियार थी। नेत्रहीन होने के बावजूद उसने कभी खुद को कमतर नहीं समझा और अपने प्रति इसी विश्वास से उसने लोगों का नजरिया बदल दिया। अपनी मेहनत के दम पर दो दशक बाद माला ने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की परीक्षा पास की। माला अब मुंबई में महाराष्ट्र सचिवालय-मंत्रालय में क्लर्क-कम-टाइपिस्ट के तौर पर काम करेंगी।

माला की सफलता का राज

माला के गुरु और पद्म पुरस्कार विजेता 81 वर्षीय शंकरबाबा पापलकर ने न केवल उन्हें अपना उपनाम दिया, बल्कि उनकी प्रतिभा को पोषित किया, मावा को ब्रेल लिपि में प्रशिक्षित किया और अपनी शिष्या को दृष्टिबाधित और अनाथ बच्चों की दुनिया में एक पथप्रदर्शक बनाया।

IAS बनना चाहती है माला

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए 25 वर्षीय माला ने कहा, ‘भगवान ने मुझे बचाने के लिए देवदूत भेजे और मुझे यहां तक पहुंचाया जहां मैं आज हूं। मैं यहां नहीं रुकूंगी। मैं यूपीएससी परीक्षा में बैठूंगी और आईएएस अधिकारी बनूंगी।’

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