Smart Meter New Rules: क्या आप प्रीपेड स्मार्ट मीटर के झंझट से परेशान हैं? प्रीपेड या पोस्टपेड? चुनाव आपका! बिजली कंपनियां आप पर जबरन प्रीपेड मीटर नहीं थोप सकेंगी। अब बिना उपभोक्ता की सहमति के प्रीपेड मोड लागू नहीं किया जा सकता, जिससे करोड़ों उपभोक्ताओं को पुराने ढर्रे पर बने रहने का विकल्प मिल गया है।
सरकार ने विद्युत नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए अब स्मार्ट मीटर की प्रीपेड अनिवार्यता को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब आप अपनी सुविधा के अनुसार बिजली बिल के भुगतान का तरीका खुद तय कर सकेंगे।
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क्या बदला है अब?
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने साफ़ किया है कि Smart Meter अब भी लगाए जाएंगे, लेकिन उनका प्रीपेड मोड अनिवार्य नहीं होगा। उपभोक्ता अपनी सुविधा और पसंद के आधार पर प्रीपेड या पोस्टपेड में से किसी एक को चुन सकेंगे। बिजली कंपनियां अब बिना उपभोक्ता की लिखित सहमति के उन्हें प्रीपेड मीटर के लिए मजबूर नहीं कर पाएंगी।
यूपी में क्या है स्थिति?
उत्तर प्रदेश में अब तक करीब 78 लाख Smart Meter लगाए जा चुके हैं, जिनमें से लगभग 70 लाख प्रीपेड मोड पर हैं। अब तक नए बिजली कनेक्शन लेने वालों के लिए प्रीपेड मीटर एक ‘मजबूरी’ बन गया था, जिसका बड़े स्तर पर विरोध हो रहा था। लेकिन अब CEA के नए आदेश के बाद, यूपी के उपभोक्ताओं को भी प्रीपेड या पोस्टपेड चुनने का संवैधानिक अधिकार मिल गया है।
क्यों हो रहा था विरोध?
प्रीपेड मीटर को लेकर लोगों की कुछ बड़ी शिकायतें थीं। बार-बार रिचार्ज करने की झंझट, तकनीकी गड़बड़ियां, बैलेंस खत्म होते ही बिजली कट जाना। इन्हीं समस्याओं को लेकर उपभोक्ता लंबे समय से विरोध कर रहे थे।
सरकार ने क्या कहा?
संसद के बजट सत्र के दौरान केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने स्पष्ट किया कि आम उपभोक्ताओं के लिए प्रीपेड स्मार्ट मीटर (Smart Meter) लगाना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था वैकल्पिक है और उपभोक्ता की सहमति पर आधारित है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो लोग बार-बार बिजली बिल जमा नहीं करते (सीरियल डिफॉल्टर्स), उनके लिए सरकार प्रीपेड मीटर अनिवार्य कर सकती है ताकि बिजली कंपनियों के घाटे को कम किया जा सके।
कानून में क्या है प्रावधान?
यह फैसला भारत का राष्ट्रीय कानून, विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5), स्पष्ट रूप से उपभोक्ताओं को प्रीपेड या पोस्टपेड मीटर चुनने का विकल्प देता है। हाल ही में सरकार ने साफ़ किया है कि कोई भी राज्य या बिजली कंपनी इस केंद्रीय कानून के खिलाफ जाकर उपभोक्ताओं पर प्रीपेड मोड जबरन नहीं थोप सकती। यह उपभोक्ताओं का कानूनी अधिकार है कि वे अपनी पसंद के मीटर के लिए लिखित सहमति दें।
उपभोक्ताओं के लिए क्या फायदा?
अब उपभोक्ताओं को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कोई भी उन्हें जबरदस्ती प्रीपेड मीटर नहीं दे सकता। वे अपनी सुविधा के अनुसार मीटर का चुनाव कर सकते हैं, रिचार्ज की परेशानी से बच सकते हैं। पहले नियम था कि Smart Meter मतलब प्रीपेड मीटर। अब नया नियम है-स्मार्ट मीटर तो लगेगा, लेकिन कैसे चलेगा (प्रीपेड या पोस्टपेड), यह आप तय करेंगे।
यानी अब बिजली उपभोक्ताओं को ज्यादा आजादी और राहत मिल गई है। यदि बिजली कंपनी आप पर दबाव बनाए, तो आप लिखित में पोस्टपेड विकल्प की मांग कर सकते हैं। केवल उन उपभोक्ताओं के लिए प्रीपेड मीटर अनिवार्य किया जा सकता है जो ‘सीरियल डिफॉल्टर’ हैं (यानी जो बार-बार बिल जमा नहीं करते)। एक सामान्य और ईमानदार उपभोक्ता के लिए चुनाव की पूरी आज़ादी है।

























