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Sikhism in Lakshadweep: इस्लामिक बहुल लक्षद्वीप में सिखों की विरासत संख्या में कम, पर सम्मान में सबसे आगे

Shikha | Nedrick News

Published: 11 Jan 2026, 01:58 AM | Updated: 11 Jan 2026, 01:58 AM

Sikhism in Lakshadweep:  जब आप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जाते है तो आपको एक ऐसी बात पता चलेगी जो किसी को भी हैरान कर सकती है। जनरल नॉलेज के हिसाब से न्यू पापुआ गिनी को नरभक्षियों का देश कहा जाता है लेकिन अंडमान और निकोबार द्वीप के रहने वाले लोगों के लिए असल में अरब सागर में बसा एक छोटा सा द्वीपीय देश, और भारत के केंद्र शासित प्रदेश में शामिल सबसे छोटा प्रदेश लक्षद्वीप ही वो क्षेत्र है जहां नरभक्षी लोग रहते है। यहीं कारण है कि अंडमान और निकोबार द्वीप के लोग लक्षद्वीप को मिनीका राज्जे कहते है, जिसका मतलब है नरभक्षियों का देश, लेकिन मौजूदा समय में ये एक कहानी मात्र है।

आज के समय में  जहां भारत का हर कोना हिंदू बहुल है तो वहीं लक्षद्वीप एक इस्लामिक प्रदेश है, बावजूद इसके यहां आपको सिखो की विरासत को अपने सिर पर सजाए नजर आते है। तो चलिए आपको इस लेख में बताते हैं कि लक्षद्वीप में मौजूद सिखिज्म की कहानी को जानेंगे, जो भले ही संख्या में बेहद कम है लेकिन इनका स्थान सभी के लिए सम्माननीय है।

लक्षद्वीप के बारे में जानकारी

लक्ष्यद्वीप का गठन 1 नवंबर 1956 को किया गया था, ये असल में 36 द्वीपों और टापुओं का एक द्वीपसमूह है जिसमें 12 एटोल, तीन रीफ और पांच डूबे हुए बैंक शामिल हैं। पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में लैकाडिव सागर के बीच बसे भारत के मालाबार तट के पास स्थित है। लक्षद्वीप के द्वीपों का कुल ज़मीनी क्षेत्रफल लगभग 32.62 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें दस द्वीपों पर ही लोग रहते हैं। इन द्वीपों की 132 km लंबी तटरेखा है। इसकी राजधानी कावारत्ती है। वहीं 2011 की जनसंख्या गणना के अनुसार 64,473 है। वहीं यहां की ऑफिशियर भाषा इंग्लिश है तो वहीं यहां के एडिशनल आधिकारिक भाषा मलयालम है।

मछली पालन और टूरिज्म पर निर्भर

लक्षद्वीप भारत का इकलौता ऐसा हिस्सा है जहां कि 96.58 प्रतिशत लोग इस्लाम धर्म को मानते है, तो वहीं 2.77 प्रतिशत लोग हिंदू धर्म को मानते है। यहां की इकॉनमी खेती, मछली पालन और टूरिज्म पर निर्भर है, यहाँ की एकमात्र मुख्य खेती नारियल की है। लक्षद्वीप का पहली बार नाम असल में तीसरी सदी BCE की बौद्ध जातक कथाओं और तमिल संगम साहित्य पतिर्रुप्पत्तु में मिलता है। हालांकि सातवी सदी में यहां इस्लाम के आने से ये द्वीप धीरे धीरे इस्लामिक रंग में रंगता चला गया। और बौद्ध धर्म खत्म होने लगा था।

लक्षदीप में सिख धर्म शुरुआत

लक्षद्वीप चुंकि सातवी सदी से ही इस्लामिक ताकतों के पास रहा था, हालांकि समय के साथ साथ यहां शासकों में बदलाव हुआ था, लेकिन आज भी यहां इस्लाम का ही बोलबाला है। ऐसे में जब हम लक्षद्वीप में सिख धर्म की बात करते है तो ये बेहद हैरान करने वाली बात है कि यहां सिखों की आबादी लगभग न के बराबर है। 2011 में यहां मात्र 8 सिख रहा करते थे, लेकिन जो भी ,सिख यहां रहते है असल में वो लक्षदीप में बेहद अहम और खास पदों पर आसीत है। वो भारत सरकार के प्रशासनिक पदों के तौर पर लक्षदीप में नियुक्त हुए है, जो कि लक्षद्वीप के विकास को आगे बढ़ाने के लिए भारत सरकार की कई मुद्दों में मदद करते है।

सिख समुदाय अपनी पहचान को बनाये रखते

हालांकि .यहां पर व्यापार केवल नारियल का ही होता है, जिसमें स्थानीय लोगों की भूमिका बेहद अहम है, लेकिन जो जो भी गिने चुने सिख यहां मौजूद है, वो इस व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए बढ़ावा देते है। सरकार और स्थानीय लोगो के बीच सामान्जस्य स्थापित करने का काम करते है, जिससे भले ही संख्या में कम होते हुए भी सिख समुदाय अपनी पहचान को बनाये रखते है। वो अपनी धार्मिक पहचान को बनाये रखते है, चाहे वो पगड़ी पहनना हो, या दाढ़ी रखना… वहां सिखों को अपने धर्म के अनुसार जीने की पूरी आजादी है।

हालांकि सिखों की संख्या बेहद कम होने के कारण सिख पूजा स्थल बनवाना अभी आसान नहीं है लेकिन फिर भी सिख अपने घरों में ही संगत करते है, वहीं पर सामूहिक रूप से इकट्ठा होकर साधना करते है। अपने त्योहारो को मनाते है। सिख आपस में भाईचारे के साथ रहते है, जो उन्हें ये महसूस ही नहीं होने देते कि वो संख्या में कम है। सिख जहां भी रहे, भले ही उनकी संख्या कम हो या ज्यादा, वो अपने होने का अहसास करा ही देते है। लक्षदीप में सिक्खिज्म की कहानी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

Shikha

shikha@nedricknews.com

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