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Red Turbaned Sikhs in China: चीन में सिख सिपाही, शंघाई और हांगकांग की सड़कों पर रेड टर्बन वाले सिख पुलिसकर्मियों की खौफ और सम्मान

Shikha Mishra | Nedrick News China Published: 06 Mar 2026, 07:40 AM | Updated: 06 Mar 2026, 07:46 AM

Red Turbaned Sikhs in China: साल 1949 के बाद चीन में सबकुछ बदल गया, चीन में माओ की सरकार आई। माओवादी सोच के कारण वहां गैर चीनियों को काफी परेशानियों और भेदभाव का सामना करना पड़ा था, लेकिन क्या आप ये जानते है कि चीन में एक वक्त ऐसा था तब सिख सिपाही की तूती बोलती थी, सिखों ने न केवल चीन से व्यापार को बढ़ाया, बल्कि वहीं सिख सैनिक चीन की रक्षा के लिए तैनात किये थे। उन्हें में से वो सिख जो अपनी विशेष पहचान को बनाये रखने के लिए लाल रंग के पगड़ियों को पहन कर चलते थे, जो शंघाई और हांगकांग की सड़को पर चलते तो उनके खौंफ से लोगों की नजरें झुक जाया करती थी। अपने इस वीडियो में हम चीन की इस खतरनाक लाल पगड़ी वाले सिख सैनिकों के बारे में जानेंगे, जिन्हें आज भी चीन में सम्मान के साथ याद किया जाता है।

कौन थे ये लाल पगड़ी वाले सिख?

दरअसल चीन में सिखों का इतिहास शेर एक पंजाब रणजीत सिंह जी के शासन काल में ही शुरु हो गया था। सिख व्यापार और रोजगार के लिए चीन जाया करते थे, लेकिन जब ब्रिटिश सेना के सैनिको के रूप में सिख 1884 में हांगकांग पहुंचे तो उनकी भूमिका उसके बाद और ज्यादा अहम हो गई। दरअसल सिखो पुरूषों की कद काठी, उनके रौबिले अंदाज के कारण सबसे पहले तो वो शंघाई म्यूनिसिपल पुलिस के रूप में तैनात किये थे, जिनकी बहादुरी और साहस के प्रेरित होकर उन्हें अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर दंगा नियत्रंण करने के लिए, ट्रेफिक प्रबंधन करने के लिए और सुरक्षा गार्ड के रूप में नियुक्त किया जाता था।

धीरे धीरे उनकी डिमांड तब और बढ़ने लगी जब वो चीन में सक्रिय सट्टेबाजी के जाल को खत्म करने के लिए और अन्य अपराधिक मामलों को सुलझाने, और अपराधियों की ईंट से ईट बजाने के लिए इस्तेमाल किये जाने लगे। उन दिनों उनकी पगड़ी और लंबी दाढ़ी उनके पहचान को बताने के लिए काफी थी। वो हमेशा ड्यूटी के दौरान नीले रंग की या खाकी रंग की वर्दी और लाल पगड़ी पहना करते थे। बड़ी से बड़ी भीड़ उन्हें देखकर तितर बितर हो जाया करती थी। लाल पगड़ी चीन के अपराधियों के लिए खौफ का दूसरा नाम बन गई थी।

चीन के कट्टर अपराधियों और दंगाईयों

उनके कारण चीन  में अपराधों में काफी कमी आई, जिससे लाल पगड़ी वाले सिखों को शंघाई के अंतर्राष्ट्रीय निपटान की सड़कों पर उनकी विशेषता काफी अहम हो गई थी। जो भी सिख इस बल का हिस्सा बनते थे, उन्हें स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती थी, उन्हें मार्शल आर्ट्स और कूं फू की कठोर ट्रेनिंग दी जाती थी। ताकि वो चीन के कट्टर अपराधियों और दंगाईयों की आवाज को मजबूती से दबा सकें। ये भी जाता है कि सिख सैनिकों की पोशाक से प्रभावित होकर चीन की वेहाईवेई रेडिमेंट ने भी अपने ड्रेस कोड में पगड़ी को शामिल किया था।

एक रिपोर्ट ये भी कहती है कि जब 1925 में चीन में आंदोलन हुआ था तब इन लाल पगड़ी वालें सिखों ने भी अपने सुप्रीम के आदेश पर चीनी नागरिको पर गोलियां चलाई थी। जिसे 30 मई आंदोलन कहा जाता है, जिसमें जापानियों की सूती मिलों में चीनी मजदूरो की हत्या और उनके दमनकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाते हुए चीनी मजदूर प्रदर्शन कर रहे थे, सारे प्रदर्शनकारी लाओझा पुलिस स्टेशन के बाह खड़े हुए थे, जो कि इंटरनेशनल सेटलमेंट के निंजिग रोड पर स्थित था। सिख ज्यादातर विदेशी रियायती क्षेत्रों में ही तैनात किये जाते थे, लेकिन उनका प्रभाव गैर रियायती क्षेत्रों में भी था।

सिख सैनिकों पर ब्रिटिश इंस्पेक्टर की कमांड

ये क्षेत्र रियायती थी और ब्रिटिश इंस्पेक्टर की कमांड पर सिख सैनिकों ने प्रदर्शनकारियो पर गोलियां चलाई था, जिसमें करीब 13 मजदूर मारे गए थे और कई लोग घायल हुए थे। इस घटना ने सिख सैनिकों के प्रति चीनियो के दिलों में नफरत पैदा कर दिया था, जबकि वो केवल अपने सुप्रीम की बात का अनुसरण कर रहे थे। हालांकि उसके बाद चीन की स्थिति में बदलाव आया और 1949 में माओं के आने के बाद सिख सैनिकों की जिम्मेदारियां सिमट गई, उन्हें शंघाई छोड़ कर हांगकांग जाना पड़ा। हालांकि आज के समय में चीन में सिखो की संख्या काफी कम है, लेकिन इस बात को कभी नहीं झुठलाया जा सकता है कि ये लाल पगड़ी वाले सिख चीनी अपराधियों की खटिया खड़ी कर के रखते थे। आपकी सिखों की ताकत को देखकर क्या कहेंगे, और जो कत्लेआम सिखों ने किया था, क्या उसमें वाकई में वो कसूरवार थे, हमें कमेंट करके बताना न भूले।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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