LPG Crisis: कुछ लोग घर के भरण-पोषण के लिए घर छोड़कर बाहर जाते हैं, घर से दूर रहकर काम करते हैं और पैसे जोड़कर अपने घर भेजते हैं। लेकिन वे भी अब घर वापस लौटने पर मजबूर हैं। एलपीजी की किल्लत के कारण आज पूरा देश परेशान है। हम यह नहीं कह सकते कि कौन कम परेशान है, क्योंकि पेट की आग सबकी बराबर होती है और भूख अमीरी-गरीबी नहीं देखती। जो हाथ कल तक शहरों की नींव रख रहे थे, आज वही हाथ एक सिलेंडर और दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हैं। यह पलायन सिर्फ लोगों का नहीं, बल्कि उनके सपनों का भी है।
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आखिर क्यों घर लौटने लगे मजदूर?
मीडिया द्वारा मिली जानकारी के मुताबिक बताया जा रहा है कि गुजरात (Gujarat) के प्रमुख औद्योगिक शहर सूरत में इन दिनों एलपीजी गैस की भारी किल्लत देखी जा रही है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि यहां काम करने वाले हजारों प्रवासी मजदूर अब अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हैं। सूरत रेलवे स्टेशन पर यूपी और बिहार जाने वाली ट्रेनों के लिए मजदूरों की भारी भीड़ और लंबी कतारें इस संकट की गवाह हैं। दरअसल, इस किल्लत की सबसे ज्यादा मार छोटे कारोबारियों और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी है। शहर के रेस्टोरेंट, ढाबे और सड़कों पर लगने वाले खाने-पीने के ठेले बंद होने की कगार पर हैं। मजदूरों का कहना है कि ‘जब चूल्हा ही नहीं जलेगा, तो काम कैसे चलेगा?’ पेट भरने का जरिया ही छिन जाने के कारण उनकी रोजी-रोटी पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
मजदूर की पहुंच से कोसों दूर गैस सिलेंडर
दैनिक भास्कर से बात करते हुए मजदूरों ने बताया कि पहले छोटा गैस सिलेंडर (Gas Cylinder) करीब 100 प्रति किलो के हिसाब से मिल जाता था, लेकिन अब वही गैस 300 से 400 प्रति किलो तक पहुंच गई है। वहीं, ब्लैक मार्केट में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 5,000 तक बताई जा रही है, जो एक आम मजदूर की पहुंच से कोसों दूर है। इसके अलावा, शहरों में फ्लैटों के कड़े नियमों के कारण वहां लकड़ी का चूल्हा जलाने की भी अनुमति नहीं है, जिससे मजदूरों के सामने भूखे रहने की नौबत आ गई है।
व्यावसायिक असर
सूरत (Surat), जो देश की टेक्सटाइल और डायमंड इंडस्ट्री (Diamond Industry) का सबसे बड़ा केंद्र है, वहां यूपी और बिहार के लाखों प्रवासी मजदूर अपनी किस्मत संवारने आते हैं। ये मजदूर अक्सर छोटे कमरों या चालों में रहते हैं, जहां उनके पास स्थायी गैस कनेक्शन (PNG या LPG) नहीं होता। वे अपनी दैनिक जरूरतों के लिए छोटे सिलेंडरों पर ही निर्भर रहते हैं। लेकिन अब गैस की भारी किल्लत और आसमान छूती कीमतों के चलते, उनके लिए दो वक्त का खाना जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।
शहर में दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल
बिहार (Bihar) से आए एक मजदूर ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि गैस खत्म होने पर कभी-कभी तो पड़ोसी मदद कर देते हैं, लेकिन रोज-रोज किसी और के भरोसे रहना मुमकिन नहीं है। आखिर कब तक कोई पड़ोसी अपना चूल्हा दूसरे के लिए जलाएगा? ऐसे में, खाली पेट काम पर जाने से बेहतर उन्होंने अपने गांव लौटना ही सही समझा, जहां कम से कम चूल्हा जलाने के लिए सूखी लकड़ियां और दो वक्त की रोटी का इंतजाम तो हो जाएगा।
वहीं, भागलपुर (Bhagalpur) लौट रही एक महिला ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि पिछले कुछ दिनों से हालात बेकाबू हो गए हैं। बच्चों के लिए दो वक्त का खाना जुटाना भी दूभर हो गया था। उन्होंने बताया कि दो-तीन बार तो पड़ोसियों के चूल्हे पर खाना बनाया, लेकिन अब वहां भी गैस खत्म होने लगी है। ऐसे में अनजान शहर में भूखे रहने से बेहतर उन्होंने पूरे परिवार के साथ अपने घर लौटना ही सही समझा।
क्या कहते है विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों (Experts) का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिससे एलपीजी (LPG) का आयात घटा है। सूरत जैसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में पाइपलाइन गैस (PNG) की कमी और प्रवासियों के पास स्थायी कनेक्शन न होना इस संकट को और गहरा कर रहा है। इससे कपड़ा और हीरा उद्योग के ठप होने का डर है। कुल मिलाकर, गैस की भारी किल्लत ने हजारों प्रवासी मजदूरों की जिंदगी और आजीविका को संकट में डाल दिया है। काम बंद होने और दो वक्त की रोटी का इंतजाम न होने के कारण, वे भारी मन से अपने गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। फिलहाल ये लोग अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं, इसी उम्मीद के साथ कि जब हालात सुधरेंगे और चूल्हा फिर से जलने लगेगा, तब वे अपने सपनों के शहर में दोबारा वापस आएंगे।
