दलितों के मसीहा कांशीराम के बारे में जानिए कुछ खास बातें

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 16 Oct 2021, 12:00 AM | Updated: 16 Oct 2021, 12:00 AM

दलितों के राजनीतिक तौर पर सचेत होने का एक वक्त दौर ही चला था, तो वहीं एक और गौर करने वाली बात जो हैं वो ये कि उन्हें हमेशा से ही भारत में आरक्षण दिया जाता रहा है। तो दूसरी तरफ दलित पॉलिटिक्स को एक्टिव करने का पूरा  श्रेय बिना किसी संदेह जिस पर जाता है वो कांशीराम को ही जाता है। हम जानेंगे उन्हीं कांशीराम के बारे में कुछ ऐसी अनसुनी बातें जिसे आप भी नहीं जानते होंगे। वो बाते जानेंगे जिन्होंने बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम को दलित पॉलिटिक्स का एक मजबूत कर चेहरा बनाया। 

 डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की तरह कांशीराम भले ही चिंतक और बुद्धिजीवी न रहे हो पर ऐसे कई तर्क है जिससे ये कहा जा सकता है कि कैसे अंबेडकर के बाद कांशीराम ही वो चेहरा रहे थे जिन्होंने इंडियन पॉलिटिक्स और समाज में एक बड़ा बदलाव लाने वाले के तौर पर अहम रोल निभाते रहे। अगर अंबेडकर ने संविधान के जरिए बदलाव लाने का  ब्लूप्रिंट पेश किया तो वो कांशीराम ही थे जिन्होंने अंबेडकर के इस ब्लूप्रिंट को राजनैतिक जमीन पर ला खड़ा किया। 

पंजाब के एक दलित परिवार में कांशीराम पैदा हुए और बीएससी की पढ़ाई के बाद क्लास वन ऑफिसर वाली सरकारी जॉब की। कांशीराम ने ही दलितों से जुड़े सवाल उठाए। उन्होंने ही अंबेडकर जयंती के दिन छुट्टी का ऐलान करने की मांग की। साल 1981 में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति या डीएस4 की कांशीाराम ने स्थापना की।

1982 में ‘द चमचा एज’ उन्होंने लिखा जिसमें उन दलित नेताओं की खूब आलोचना की थी जो कांग्रेस के लिए काम करते है। 1983 में एक साइकिल रैली डीएस4 ने आयोजित किया जिसमें अपनी ताकत दिखाई। तीन लाख लोगों ने इसमें भाग लिया था। बीएसपी की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की और तब तक वो पूरी तरह से एक फूलटाइम पॉलिटिशियन और सोशल वर्कर के तौर पर पहचाने जाने लगे थे। वो कहते कि किताबें इकट्ठा करते थे अंबेडकर  लेकिन मैं लोगों को इकट्ठा करता हूं। बहुत कम समय में बीएसपी यूपी की राजनीति में छा गई। 

कांशीराम मानते थे कि अपने हक के लिए लड़ना होगा, उसके लिए गिड़गिड़ाने से बात नहीं बनेगी। कांशीराम का जिक्र होता है तो बीएसपी प्रमुख मायावती का जरूर जिक्र होता है जिनके मार्गदर्शक कांशीराम ही थे। कांशीराम की राजनीति को मायावती ने भले आगे बढ़ाया हो और बसपा में ताकत भरी हो पर कांशीराम की तरह वो कभी भी एक political thinker नहीं रहीं। व्यक्तिगत की बात की जाए तो कांशीराम एक बेहद सादा जिंदगी जीते थे । साल 2006 में कांशीराम नहीं रहे और मृत्यु से करीब तीन साल पहले तक वो काफी ‘एक्टिव’ रहे थे पॉलिटिक्स में।

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