Trending

Iran Israel War: मिडिल ईस्ट में युद्ध का छठा दिन! तेल सप्लाई पर संकट, दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव

Nandani | Nedrick News Published: 05 Mar 2026, 10:46 AM | Updated: 05 Mar 2026, 10:46 AM

Iran Israel War: मिडिल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी सैन्य टकराव को अब छह दिन हो चुके हैं और हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। इस संघर्ष का असर सिर्फ युद्ध में शामिल देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था भी इसकी चपेट में आती दिख रही है। क्षेत्र में सुरक्षा हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई जगहों पर हवाई यात्रा पूरी तरह रुक गई है। साथ ही कच्चे तेल की सप्लाई भी प्रभावित होने लगी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में चिंता बढ़ गई है।

और पढ़ें: Iran Attack On Kuwait: मिडिल ईस्ट में जंग के बीच दुबई-कुवैत में फंसे भारतीयों की स्थिति, सुरक्षित हैं या खतरे में?

कई देशों के शामिल होने की आशंका | Iran Israel War

स्थिति इसलिए भी ज्यादा संवेदनशील हो गई है क्योंकि ईरान ने मिडिल ईस्ट के कई इलाकों में मिसाइल हमले किए हैं। इन हमलों के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में और देश भी इस टकराव में शामिल हो सकते हैं। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ गई है।

इसी बीच चीन ने भी ईरान के समर्थन में बयान दिया है। चीन के इस रुख ने वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक हलचल बढ़ा दी है और हालात को और पेचीदा बना दिया है। हालांकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि अगर हालात काबू में रहे तो अगले चार हफ्तों के भीतर युद्ध खत्म होने की संभावना हो सकती है। लेकिन फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बनी हुई है।

‘स्ट्रेट ऑफ होमुर्ज’ बंद होने से बढ़ी परेशानी

मौजूदा तनाव के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होमुर्ज’ का समुद्री रास्ता बंद हो गया है। यह संकरा लेकिन बेहद अहम समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ता है और इस पर ईरान का प्रभाव माना जाता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से यह रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया के कुल ऊर्जा आयात का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।

भारत और चीन जैसे बड़े देशों की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक इसी इलाके से पूरी होती हैं। भारत अपने कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत इसी क्षेत्र से करता है। ऐसे में इस मार्ग के बंद होने से एशिया और यूरोप के कई देशों के सामने ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ गई है।

तेल की कीमतों में तेज उछाल

स्ट्रेट ऑफ होमुर्ज के जरिए ही सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे खाड़ी देशों का कच्चा तेल एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुंचता है। यही वजह है कि इस मार्ग के बंद होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है।

फिलहाल कच्चे तेल की कीमत करीब 85 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। 5 मार्च को इसमें करीब 2.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है तो ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर

तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर उन देशों पर पड़ता है जो बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं। भारत भी उन्हीं देशों में शामिल है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, जिसमें खाड़ी देशों की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत के पास फिलहाल लगभग 50 दिनों का ईंधन भंडार मौजूद है। इसमें करीब 25 दिनों का कच्चा तेल और 25 दिनों के पेट्रोलियम उत्पाद शामिल हैं। लेकिन अगर मिडिल ईस्ट से सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स महंगे होंगे, महंगाई बढ़ सकती है और रुपये पर भी दबाव पड़ सकता है। इन सबका असर देश की जीडीपी पर भी दिखाई दे सकता है।

चीन की इंडस्ट्री भी दबाव में

चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है और उसकी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री काफी हद तक तेल पर निर्भर करती है। चीन अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है। ऐसे में अगर मिडिल ईस्ट से सप्लाई प्रभावित होती है तो चीन में उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इससे उसके निर्यात की प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है और इंडस्ट्री की ग्रोथ धीमी पड़ सकती है।

हालांकि चीन के पास करीब छह महीने का तेल भंडार मौजूद है, जो फिलहाल उसके लिए राहत की बात है। इसके अलावा वह रूस जैसे देशों से भी तेल आयात कर रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बनना तय माना जा रहा है।

अमेरिका और अन्य देशों पर भी असर

अमेरिका के पास करीब चार महीने का आधिकारिक तेल भंडार है। अगर वेनेजुएला से आने वाले तेल को भी शामिल किया जाए तो उसके पास काफी बड़ा भंडार मौजूद है। इसके बावजूद वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से अमेरिका में भी महंगाई बढ़ सकती है।

इसके अलावा अमेरिका सीधे तौर पर ईरान के साथ इस संघर्ष में शामिल है, जिससे सैन्य और आर्थिक खर्च बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह युद्ध जल्द खत्म नहीं हुआ तो यूरोप और एशिया के कई अन्य देशों को भी इसके नकारात्मक आर्थिक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि मिडिल ईस्ट का यह संकट आने वाले दिनों में किस दिशा में जाता है।

और पढ़ें: Afghanistan Pakistan War: ‘PAK आर्मी की साजिशों से रहें होशियार…’ अफगान तालिबान ने बलोच और पख्तून समुदाय को किया आगाह

Nandani

nandani@nedricknews.com

नंदनी एक अनुभवी कंटेंट राइटर और करंट अफेयर्स जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में चार वर्षों का सक्रिय अनुभव है। उन्होंने चितकारा यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज़ एंकर के रूप में की, जहां स्क्रिप्ट लेखन के दौरान कंटेंट राइटिंग और स्टोरीटेलिंग में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। वर्तमान में वह नेड्रिक न्यूज़ से जुड़ी हैं और राजनीति, क्राइम तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों पर मज़बूत पकड़ रखती हैं। इसके साथ ही उन्हें बॉलीवुड-हॉलीवुड और लाइफस्टाइल विषयों पर भी व्यापक अनुभव है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds