Last Journey of Harish Rana: दुनिया में कोई भी माता-पिता वह घड़ी नहीं देखना चाहते, जब उन्हें अपने ही कलेजे के टुकड़े को विदा करना पड़े। लेकिन अपने बच्चे को हर दिन तिल-तिल मरते और दर्द में तड़पते देखना किसी मौत से कम नहीं था। आखिरकार, हरीश राणा को उस असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिल गई, लेकिन पीछे छोड़ गए कभी न भरने वाला एक खालीपन।
उस लाचार पिता के दिल पर क्या बीती होगी, जिसने अपने बेटे को बुढ़ापे की लाठी माना था। लेकिन जब उसी लाठी को खुद अपने कंधों पर उठाकर अंतिम विदाई देनी पड़े, तो पिता की हिम्मत और कमर उम्र से पहले ही टूट जाती है। हरीश राणा के अंतिम सफर में आज हर आंख नम थी और हर दिल इस भारी दुख से बोझिल।
भाई और बहन ने दी मुखाग्नि
मीडिया द्वारा मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा का अंतिम संस्कार दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट में संपन्न हुआ। इस दौरान पूरा माहौल गमगीन था और परिवार गहरे दुख में डूबा नजर आया। हरीश की अंतिम विदाई में उनके परिजनों, रिश्तेदारों और मित्रों के साथ-साथ ब्रह्माकुमारीज़ से जुड़ी दीदियाँ भी शामिल हुईं। अंत में, हरीश के भाई और बहन ने नम आंखों से उन्हें मुखाग्नि दी।
कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने दी श्रद्धांजलि
अंतिम संस्कार के दौरान माहौल बेहद भावुक था। पिता के चेहरे पर बेटे को खोने का दर्द साफ दिखाई दे रहा था, उन्होंने मास्क जरूर पहन रखा था, लेकिन उनकी डबडबाई आंखें सब कुछ बयां कर रही थीं। मां की हालत देख वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। इस दुखद घड़ी में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने भी पहुंचकर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। सुबह हरीश राणा का पार्थिव शरीर एम्स दिल्ली से ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया, जहां हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया।
हिमाचल से जुड़ा है परिवार
बता दें कि मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित प्लेटा गांव का रहने वाला यह परिवार पिछले 13 सालों से एक ऐसी जंग लड़ रहा था, जिसका अंत आज बेहद भावुक रहा। पिता अशोक राणा, जिन्होंने 1989 में दिल्ली आकर और मुंबई के बड़े होटलों में शेफ बनकर अपने बच्चों का भविष्य संवारा था, उनके लिए साल 2013 का वो दिन काल बनकर आया जब चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में हुए हादसे ने हरीश को हमेशा के लिए कोमा में भेज दिया।
सुप्रीम कोर्ट से मिली थी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति
हरीश राणा का मामला भारत के उन दुर्लभ और ऐतिहासिक कानूनी मामलों में शामिल है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति की राह आसान हुई। साल 2013 से, यानी पिछले 13 वर्षों से हरीश कोमा (Vegetative State) में थे। हाल ही में 14 मार्च को उन्हें गाजियाबाद स्थित उनके निवास से एम्स (AIIMS) के पेलिएटिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया था, जहाँ मंगलवार शाम 4:10 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
परिवार ने अंगदान के लिए दी सहमति
हरीश राणा के निधन के बाद उनके परिवार ने एक बेहद साहसी और प्रेरणादायक फैसला लिया। उन्होंने हरीश के अंगदान के लिए अपनी सहमति दी, ताकि उनकी मृत्यु के बाद भी वे दूसरों में जीवित रह सकें। जानकारी के अनुसार, हरीश के दोनों कॉर्निया और हार्ट वाल्व दान किए गए हैं, जो जरूरतमंद मरीजों को नई जिंदगी देंगे। 13 साल की लंबी पीड़ा झेलने वाले परिवार का यह कदम मानवता की एक अनूठी मिसाल है, जिसकी हर तरफ सराहना हो रही है।
इंसानियत की एक मिसाल
हरीश राणा की कहानी जितनी दर्दनाक है, उतनी ही प्रेरणादायक भी। 13 साल के लंबे संघर्ष के बाद उनका इस दुनिया से जाना परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति है, लेकिन उनके अंगदान का साहसी फैसला अंधेरे में डूबे कई परिवारों के जीवन में उम्मीद की नई रोशनी जरूर जलाएगा। हरीश भले ही चले गए हों, लेकिन वे अब भी दूसरों की आँखों और धड़कनों में जीवित रहेंगे।




























