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Guru Nanak Tibet Visit: तिब्बत के ‘नानक लामा’ तिब्बत के बौद्ध मठों में गुरु नानक देव जी की मूर्तियाँ क्यों हैं? उन्हें ‘पद्मसंभव’ का अवतार क्यों माना जाता है?

Shikha Mishra | Nedrick News Tibet Published: 10 Mar 2026, 10:21 AM | Updated: 10 Mar 2026, 10:21 AM

Guru Nanak Tibet Visit: सिख धर्म की स्थापना और पहले गुरु गुरू नानक देव जी ने सिख धर्म के विचारों को दुनिया के कोने कोने में पहुंचाने के लिए करीब 28 सालों तक यात्रायें की थी। उन्होंने अपनी एक एक यात्रा करीब 4 से 6 सालो की की थी.. गुरु नानक देव जी यात्राओं और उनके अलग अलग स्थानों में जाने के कई निशान मौजूद है, लेकिन ऐसा शायद कही नहीं होगा, जब उन्हें गुरु नानक के अलावा कोई पदवी दी गई है, लेकिन तिब्बत की धरती पर गुरु नानक देव की यात्रा को न केवल आज बी सम्मानित किया जाता है बल्कि उन्हें नानक लामा के नाम से भी बुलाया जाता है।

सिख धर्म के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने जो ज्ञान दिया उसे तिब्बत में न केवल सराहा जाता है बल्कि एक बौद्ध बहुल देश होते हुए भी वहां गुरु नानक देव जी तो पद्मसंभव का अवतार माना जाता है। एक तरफ जहां सिख धर्म में मूर्ति पूजा निषेध है वहीं गुरु साहिब की मूर्तियां तिबब्त के मंदिरो में मौजूद है, जिसकी पूजा की जाती है। अपने इस विडियो में हम गुरु साहिब की तिब्बत यात्रा और उनके पद्मसंभव के अवतार कहलाने की कहानी को जानेंगे।

गुरु साहिब की तिब्बत यात्रा

गुरु नानक देव जी जब अपनी तिसरी उदासी के लिए 1514 में निकले ते, तब वो भारत के उत्तरी इलाको में यात्रा के लिए गए थे। ये यात्रा उन्होंने साल 1514 से लेकर 1518 तक की थी, जिसमें वो जम्मू-कश्मीर, लेह लद्दाख, सिक्किम और फिर तिब्बत की यात्रा पर गए थे। गुरु साहिब की यात्रा का एक ही मकसद था कि वो लोगो को मानवता की सेवा और ईश्वर के सही संदेश की शिक्षा दे सकें, गुरु साहिब जब तिब्बत पहुंचे तब वहां बौद्ध धर्म का बोलबाला था, बावजूद इसके वहां के प्रमुख लामा गुरु साहिब की आभा से प्रभावित हो गए, उन्होंने लामा से संवाद भी किया था।

गुरु साहिब की बातों से बौद्ध भिक्षु काफी प्रभावित हुए

गुरु साहिब को सुनने के लिए सैकड़ों बौद्ध भिक्षु वहां जमा हो गए। गुरु साहिब के वचनों में एक अलग ही सुख था, जो उन्हों भगवान बुद्ध के विचारों और उनके ज्ञान को बढ़ाने के लिए एक मार्गदर्शक की तरह काम कर रहा था। गुरु साहिब ने भगवान बुद्ध की ही तरह ईश्वर को एक कहते हुए व्यक्ति को करूणा, अहिंसा और सेवा भाव से जीवन जीने की प्रेरणा दी थी, जो कि भेदभाव से परे एक समानता का ही पाठ पढ़ाते है। गुरु साहिब की बातों से बौद्ध भिक्षु काफी प्रभावित हुए और उन्हें पद्मसंभव का अवतार मान कर नानक लामा के नाम से बुलाना शुरु कर दिया।

चुंगथांग में गुरु साहिब रूके

लामा जिसका मतलब होता है गुरु, गुरु जिन्होंने उन्हें परम शक्ति का ज्ञान दिया था। इसके अलावा तिब्बती मान्यताओं के अनुसार तिब्बत और सिक्किम की सीमा पर चुंगथांग में गुरु साहिब रूके थे, उस दौरान उन्होंने वहां के लोगो की सेवा के लिए तिब्बत जैसी ठंडी और निर्जन स्थान, जहां लोग पानी की बूंद बूंद को तरस रहे थे, गुरु साहिब ने वहां पर अपनी छड़ी से पहले एक अमृत कुंड प्रकट करके शीतल पानी के झील में बदल दिया, इसके अपनी उपस्थिति वहां प्रकट करने के लिए उन्होंने अपनी छड़ी को जमीन में गाड़ दिया था, जो आज भी वहां छड़ी के आकार में पेड़ के रूप में खड़ा है।

तिब्बती इतिहासकार बताते है कि चुंगथांग में गुरु साहिब ने दो राक्षसो को हराया था, जो लोगो को परेशान करते थे, और उन्हें अपनी शिक्षाओं से प्रभावित करके सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी थी, कहा जाता है कि इस स्थान का नाम चुंगथांग भी गुरु साहिब के कहने पर पड़ा था, जो कि पंजाबी भाषा के चंगे स्थान से निकला है। ये स्थान आज भी काफी पवित्र है।

कौन है पदमसंभव?

पद्मसंभव का मतलब है कमल के फूल से जन्म लेने वाला व्यक्ति.. तिब्बत में गुरु नानक देव जी तो पद्मसंभव गुरु रिनपोछे का ही एक अवतार माना जाता है। जो कि 8वी शताब्दि के एक भारतीय बौद्ध तंत्रयान के परम ज्ञानी गुरु थे, तिब्बत और उसके आस पास इलाकों में तंत्रयान बौद्ध परंपरा के फलने फूलने और उसके प्रचार प्रसार होने का श्रैय गुरु रिनपोछे को ही जाता है। पद्मसंभव गुरु रिनपोछे ने तिब्बत में बौद्ध धर्म में सबसे प्रचलित न्यिंगमा समुदाय की स्थापना करके तिब्बत को थेरवाद बौद्ध परंपरा से अवगत कराया था औऱ पहले बौद्ध मठ साम्ये की स्थापना की थी, उन्हें असल में तिब्बत का दूसरा बुद्ध भी कहा जाता है।

गुरु रिनपोछे के बारे में कहा जाता है कि हिमाचल प्रदेश के मंडी स्थान पर एक कमल की झील में कमल के फूल के अंदर उनका अवतरण हुआ था, जिनके बारे में खुद शाक्यमुनि गौतम बुद्ध ने भविष्वाणी की थी। गुरु नानक देव जी के ज्ञान प्रभावित होने के कारण बौद्ध लोग उन्हें पद्मसंभव नानक लामा कहते है. हालांकि कई जगह दोनो का अलग अलग भी कहा जाता है, लेकिन तिब्बत में गुरु नानक देव जी को आध्यात्मिक गुरु गोम्पका महाराज के रूप में पूजा जाता है, जिन्हें लामा परंपरा के अनुसार पवित्र संत मान कर पूजा जाता है, गुरु साहिब के अलग रूप को आपको यहां देखने को मिलेगा। जो किसी को भी प्रभावित कर सकता है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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