Garna Sahib: क्या आप ये जानते है कि सिख धर्म के शुरुआती गुरु साहिबानों ने सत्य और अहिंसा का मार्ग चुन कर लोगों को सिक्खी की शिक्षा दी थी। वो सदैव सदाचारी रह कर संगत सेवा करने की सीख देते थे.. पांचवे गुरु गुरु अर्जन देव की शहादत के बारे में हर सिख जानता है.. कैसे मुगल शासक जहांगीर ने उन्हें न केवल लाहौर के किले में कैद कर दिया बल्कि उन्हें तमाम यातनायें दे कर 1606 में मार दिया था.. जबकि इतिहासकारो की माने तो गुरु साहिब ने तो जहांगीर के बेटे शहजादे खुसरो, जो कि बाद में शाहजहां बना था, उसे जहांगीर के प्रकोप से बचाया ।
जिससे नाराज होकर जहांगीर ने गुरु साहिब और उनके पूरे परिवार को यातनाभरी मृत्यु दी थी.. 30 मई 1606 को करीब महीने भर की यातना सहने के बाद वो शहीद हो गए थे.. लेकिन उनकी अहिंसा की नीति ने छठे गुरु हरगोबिंद साहिब के मन में गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने तय कर लिया कि अब केवल शास्त्र से नहीं शस्त्र से भी जंग होगी.. ज्ञान के साथ शस्त्र उठाना पड़ेगा.. लेकिन उन्होंने संगतो को शस्त्र ज्ञान के साथ बहुत से ऐसे वर दिये.. जो आज संगतो का भला कर रहे है.. उन्ही में से एक गरना साहिब का वो पेड़.. जिसे छूने मात्र से व्यक्ति के सारे अटके काम बनने लगते है।
मीरी पीरी का सिद्धांत
सन 1606 में जब पांचवे गुरु अर्जन देव सचखंड चले गए तब गुरु हरगोबिंद साहिब जी छठे गुरु के रूप में स्थापित हुए.. उन्होंने गुरु अर्जन देव जी के साथ जो अन्नाय हुआ उसे देखते हुए पहली बार मीरी पीरी के सिद्धांत की नींव रखी। गुरु साहिब ने मीरी यानि की राजनैतिक संसारिक शक्तियों को और पीरी यानि की आध्यात्मिक शक्तियों को एक साथ लेकर चलने का सिद्धांत दिया था। इसके लिए उन्होंने दो तलवारे एक साथ धारण की थी.. जो प्रतीक था कि अध्यात्म और शक्ति एक साथ चल सकती है। उन्होंने ही पहली बार हरिमंदिर साहिब में अकाल तख्तक की स्थापना की थी।
शुरुआत में उन्होंने सिखो को मजबूत बनाने के लिए कार्य किया, इस दौरान उन्होंने धर्म का प्रचार करने के लिए कई यात्रायें भी की.. इसी एक यात्रा का वृतांत हम आपको सुनाते है जब उन्होंने एक मामूली से गरना के पेड़ को न केवल आशिर्वाद देकर महान बनाया बल्कि तीन तीन कटने के बाद भी वो पेड़ 400 सालों के बाद भी भक्तों के भले के लिए खड़ा है।
गरना के पेड का गुरु साहिब से लगाव
कहते है कि करीब 1620 के आसपास गुरु साहिब धर्म के प्रचार की .यात्रा के दौरान होशियारपुर के गांव बोदल पहुंचे थे, जहां के जंगलो में ज्यादातर गरना के पेड़ हुआ करते थे। जो कि एक लाल रंग के खट्टे मीठे फल होते है। कहते है कि हरे भरे वन में गुरु साहिब की चादर एक सूखे टहनी में फंस गई.. वो वहीं कुछ देर के लिए रूक गए.. इतनी ही नहीं उन्होंने संगतो से कहा कि इस सूखी हुई टहनी को तोड़ कर जमीन में गाड़ दो.. संगतो ने ऐसा ही किया.. गुरु साहिब जानते थे कि इस घटना के पीछे भी संगतो का भला ही होगा.. इसलिए उन्होंने उस सूखी टहनी को वरदान देते हुए आदेश दिया कि उस टहनी के कारण वो उस जगह पर थोड़ी देर के लिए अटक गए, इसलिए वो टहनी भी हमेशा वहीं रहेगी..और हरी भरी रहेगी.. इतना ही नहीं जो संगते यहां की यात्रा करके उस पेड़ को छूएगी.. मत्था टेकेगी.. उसके सारे रूके हुए काम पूरे होने लगेंगे, उनकी सारी इच्छायें पूरी होगी.. गुरु साहिब ने आशीर्वाद दे दिया और आगे बढ़ गए।
कहते है कि करीब 8 सालो के बाद गुरु साहिब धर्म का प्रचार करके फिर से बोदल गांव पहुंचे थे, लेकिन इस बार उन्होंने देखा कि जिस सूखी डाली को उन्होंने आशिर्वाद दिया था वो एक हरा भरा पेड़ बन गया है जो गरना के फलो से लदा हुआ था।
जब जंगलो का काटने लगे मुसलमान
कहते है कि कुछ समय के बाद एक मुसलमान अमीर व्यक्ति ने गरने के जंगल को खरीद लिया था और उसके पेड़ो को काटना शुरू कर दिया ताकि खेती की जमीन बनाई जाये..सारे पेड़ कट रहे थे तो गुरु साहिब का आशीर्वाद प्राप्त पेड़ भी काट दिया गया.. लेकिन उसके बाद जो हुआ उसे देखकर उस मुसलमान अमीर व्यक्ति की आंखे फटी की फटी रह गई। कहते है कि शाम को वो पेड़ काटा गया और सुबह वो अपने स्थान पर जस का तस खड़ा था बिना एक खरोच के.. उस व्यक्ति को पहले तो लगा कि पेड़ छूट गया होगा, जिसके बाद फिर से पेड़ काट दिया गया। लेकिन अगली सुबह फिर से पेड़ बिना खरोंच के अपने स्थान पर था। जिससे गुस्सा होकर तीसरी बार जड़ समेत उखाड़ दिया।
लेकिन मुसलमान को अपनी गलती का जल्द अहसास हो गया। आधी रात को उसे सपने में भविष्यवाणी सुनाई दी कि उस गरने को पेड़ को वहां से हटाने का विचार त्याग दें क्योंकि वो गुरु साहिब हरगोबिंद साहिब लगाया हुआ है..और संगतो के भले के लिए ये पेड़ अनंतकाल तक रहेगा। अगली सुबह फिर से वो पेड़ वैसे ही अपने स्थान पर हरा भरा खड़ा था.. जिससे उस मुसलमान व्यापारी को अपनी गलती का अहसास हुआ और वो गांव छोड़ कर चला गया। आज के समयें में होशियारपुर के गोदल गांव में गरने का पेड़ यहां के गुरुदवारा गरना साहिब पातशाही छठी में स्थित है। ये पेड़ आज भी पूरी तरह से हरा भरा है, और यहां आने वाले संगतों के अटके काम बनाने के लिए जाना जाता है।




























