History of gujiya: होली आते ही जिस चीज़ की खुशबू सबसे पहले रसोई से बाहर निकलती है, वो है ताज़ी तली हुई गुजिया। घी में सुनहरी तली मैदे की खस्ता परत, अंदर से इलायची महकता मावा, हल्की-सी मिठास और बारीक कटे मेवों का स्वाद… एक गुजिया खाओ तो दूसरी अपने आप हाथ में आ जाती है। आधे चांद के आकार वाली यह मिठाई उत्तर भारत की पहचान बन चुकी है। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि जिसे हम पूरी तरह अपना मानते हैं, उसके इतिहास की डोर तुर्की तक जाती बताई जाती है।
क्या गुजिया का रिश्ता तुर्की के बकलावा से है?
खाने के इतिहास पर शोध करने वाले कई विशेषज्ञ मानते हैं कि गुजिया की जड़ें मध्य एशिया से जुड़ी हो सकती हैं। कुछ थ्योरीज के अनुसार, गुजिया का आइडिया तुर्की की मशहूर मिठाई ‘बकलावा’ से प्रभावित है। बकलावा भी परतदार, मीठी और मेवों से भरी पेस्ट्री होती है, जिसे वहां के सुल्तानों और अमीर तबके की पसंदीदा डिश माना जाता था।
कहा जाता है कि जब मध्य एशिया के व्यापारी भारत आए, तो वे अपने साथ समोसा और बकलावा जैसी डिशेज भी लाए। समय के साथ समोसा यहां नमकीन रूप में ढल गया और बकलावा को भारतीय स्वाद के मुताबिक बदला गया। तुर्की में जहां परतों के बीच ड्राईफ्रूट्स भरे जाते थे, वहीं भारत में इसमें मावा (खोया), चीनी और इलायची का इस्तेमाल शुरू हो गया। धीरे-धीरे यही बदलाव गुजिया के रूप में सामने आया।
13वीं सदी में मिलता है पहला जिक्र | History of gujiya
इतिहासकारों के अनुसार, गुजिया जैसा पकवान 13वीं शताब्दी के आसपास भारतीय खानपान का हिस्सा बन चुका था। उस दौर के संस्कृत और क्षेत्रीय ग्रंथों में ‘गूंझा’ (Gunjha) नाम के एक व्यंजन का जिक्र मिलता है। इसे गुजिया का शुरुआती रूप माना जाता है।
फूड हिस्टोरियन के.टी. अचाया ने अपनी किताबों ‘ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड’ और ‘द स्टोरी ऑफ फूड’ में भरवां तली हुई पेस्ट्री और त्योहारों की मिठाइयों का विस्तार से वर्णन किया है। उनके मुताबिक भारत में ऐसी डिशेज सदियों से बनती रही हैं, जो अलग-अलग इलाकों में अलग रूप लेती गईं।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि उस समय गुड़ या शहद के मिश्रण को गेहूं के आटे से ढककर धूप में सुखाया जाता था। यानी गुजिया की कहानी करीब 700-800 साल पुरानी मानी जाती है।
बुंदेलखंड से ब्रज तक का सफर
इतिहासकार बुंदेलखंड को गुजिया का ‘गढ़’ मानते हैं। कहा जाता है कि मध्यकाल में जब उत्तर भारत के खानपान में बदलाव हो रहे थे, तब बुंदेलखंड के राजाओं और उनके शाही रसोइयों ने ‘चंद्रकला’ नाम की गोल गुजिया बनाई। यहीं से यह मिठाई ब्रज (मथुरा-वृंदावन) और फिर पूरे उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में फैल गई।
रिपोर्ट्स में इतिहासकार संजेश त्रिपाठी के हवाले से लिखा गया है कि व्यापार के सिलसिले में बाहर गए लोग पेस्ट्री का विचार लेकर लौटे और यहां आकर उसे स्थानीय स्वाद के हिसाब से ढाल लिया। गेहूं या मिलेट के आटे में खोया और मेवे भरकर इसे एक नया रूप दिया गया।
ब्रज क्षेत्र में 16वीं सदी के दौरान गुजिया को भगवान कृष्ण को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता था। भक्ति काल में जब 56 भोग की परंपरा शुरू हुई, तब ‘चंद्रकला’ और ‘गुजिया’ जैसे पकवान उसमें शामिल थे। लोककथाएं और मंदिरों के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि यह मिठाई करीब 500 साल से वहां बन रही है।
समय के साथ बदली गुजिया
गुजिया का रूप और स्वाद समय के साथ बदलता गया।
- 13वीं सदी में यह ‘गूंझा’ के रूप में एक सादा मीठा पकवान था।
- 15वीं-16वीं सदी में मध्य एशियाई प्रभाव से इसमें मावा और बारीक मेवों की फिलिंग जुड़ी।
- मुगल काल में केसर और महंगे मेवों के साथ इसे और शाही बनाया गया।
- आज गुजिया पारंपरिक मावे से आगे बढ़कर चॉकलेट, केसर, ड्राईफ्रूट मिक्स और यहां तक कि शुगर-फ्री वर्जन में भी मिलती है।
हर राज्य का अपना अंदाज
गुजिया ने जहां-जहां कदम रखा, वहां अपना अलग नाम और स्वाद बना लिया।
- महाराष्ट्र और गुजरात में इसे ‘करंजी’ कहा जाता है, जिसमें नारियल और गुड़ भरा जाता है।
- बिहार और झारखंड में यह ‘पिड़किया’ के नाम से जानी जाती है, जिसमें सूजी और खोया दोनों मिलाए जाते हैं।
- कर्नाटक में इसे ‘कर्जीकाई’ कहा जाता है, जहां फिलिंग में खसखस और नारियल डाला जाता है।
इतिहास चाहे तुर्की से जुड़ा हो या बुंदेलखंड से, आज गुजिया सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि होली की पहचान है। इसकी खुशबू और स्वाद हर घर में त्योहार की रौनक बढ़ा देते हैं। शायद यही वजह है कि सदियों बाद भी गुजिया का जादू बरकरार है।
