देश के पहले ट्रांसजेंडर पार्षद बने बोबी, जानिए कैसे बोबी डार्लिंग बनी बोबी पार्षद

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देश के पहले ट्रांसजेंडर पार्षद बने बोबी

दिल्ली एमसीडी चुनाव (Delhi MCD Result) के रिजल्ट आ रहे हैं। वहीं मीडिया ख़बरों के अनुसार सुल्तानपुरी-ए वार्ड (Sultanpuri A ward) से आप उम्मीदवार बोबी (Bobi) जीत गए हैं। बोबी के बारे में बताया जाता है की वह ट्रांसजेंडर (Transgender) समाज के पहले व्यक्ति हैं जो दिल्ली में पार्षद बने हैं। 

बोबी को ट्रांसजेंडर होने के कारण बचपन से ही बहुत सारी समाजिक उत्पीड़नों का सामना करना पड़ा है, जबकि 15 साल की उम्र में उन्हें परिवार से अलग कर दिया गया था। बोबी के परिवार वालों ने उस समय सामाजिक दबाव में आकर उन्हें ट्रांसजेंडर समुदाय के एक ‘गुरुजी’ को सौंप दिया था। 

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जीत दर्ज कर रचा इतिहास 

इसी के साथ MCD चुनाव में दिल्ली के सुल्तानपुरी-ए वॉर्ड से इस AAP उम्मीदवार ने जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया है। भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब MCD चुनाव में किसी ट्रांसजेंडर पार्षद की एंट्री हुई है। बॉबी ने इस नगर निगम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार एकता जाटव को करारी हार दी है, वहीं कांग्रेस पार्टी से उनके खिलाफ वरुण ढाका उतरे थे।

अपने वार्ड को साफ़ बनाने का लिया था निर्णय 

चुनाव से पहले बोबी ने कहा था की वह अपने निर्वाचन क्षेत्र को सुंदर बनाना चाहती हैं तथा अपने पड़ोसियों और अपने समुदाय के लोगों के जीवन में सुधार करना चाहती हैं। सबसे पहले बोबी अन्ना आंदोलन से जुड़े थे। चुनाव प्रचार के दौरान बोबी ने अपने क्षेत्र के लोगों को यह वादा किया था कि, “अगर मैं चुनाव जीतता हूं तो बदहाल पड़े पार्कों का सौंदर्यीकरण मेरी पहली प्राथमिकता होगी। मैं अपने निर्वाचन क्षेत्र की सफाई पर ध्यान दूंगा और इसे गंदगी से छुटकारा दिलाऊंगा।”

बोबी डार्लिंग से बोबी पार्षद की कहानी 

आप समझ सकते हैं की हमारे समाज में ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ कैसा बर्ताव किया जाता है। शुरुआत में बॉबी को स्कूल और उसके पड़ोस में लगातार धमकाया और परेशान किया जाता था। बोबी के परिवार वालो ने सामाजिक दबाव में आकर  14-15 साल की उम्र में बोबी को ट्रांसजेंडर समुदाय के एक गुरु जी को सौंप दिया। वर्तमान की बात करें तो बॉबी सुल्तानपुर माजरा के निवासी हैं और वहां के लोग उसे प्यार से  ‘बॉबी डार्लिंग’ कह कर पुकारते हैं। 

गुरु जी के पास बोबी को अपने जैसे लोगों के साथ मिलने का मौका मिला। 21-22 साल की उम्र में उन्होंने एक NGO ज्वाइन किया जहां उन्होंने पढ़ना-लिखना सीखा। वह बाद में एक सामाजिक कार्यकर्ता बन गईं और वंचित लाचार बच्चों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए काम करने लगे। जिसके बाद से वह अन्ना के आंदोलन तक पहुंचे और अब पार्षद की कुर्सी तक। 

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