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Bihar Election Results 2025: एनडीए की जीत और आरजेडी की करारी हार, क्या संजय यादव ने बिगाड़ी तेजस्वी की बाज़ी?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News

Published: 14 Nov 2025, 12:00 AM | Updated: 14 Nov 2025, 12:00 AM

Bihar Election Results 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे सामने आ चुके हैं और यह परिणाम महागठबंधन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। इस चुनाव में एक बार फिर से एनडीए की सरकार बनने जा रही है, और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की स्थिति बेहद खराब रही, जो कभी महागठबंधन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी। आरजेडी की सीटें घटकर 50 तक पहुंच गई हैं, जबकि पहले 2015 में पार्टी 80 सीटें जीतने में सफल रही थी, और 2020 में भी उसे 75 सीटें मिली थीं। इस बार का परिणाम आरजेडी के लिए एक बड़ा सदमा है।

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इस हार के कारणों की तलाश अब शुरू हो गई है और महागठबंधन के नेता इसके लिए बैठकों का आयोजन करेंगे। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आरजेडी के अंदर की रणनीतियों में कोई गड़बड़ी थी, और अगर हां, तो इसके पीछे किसकी भूमिका थी? एक प्रमुख नाम जो इस हार में चर्चा का विषय बना हुआ है, वह है संजय यादव। संजय यादव तेजस्वी यादव के करीबी सलाहकार माने जाते हैं, और उनकी भूमिका इस चुनाव में बहुत महत्वपूर्ण रही है।

संजय यादव की भूमिका और उनका महत्व- Bihar Election Results 2025

संजय यादव बिहार के महेन्द्रगढ़, हरियाणा के रहने वाले हैं। उनका बैकग्राउंड कंप्यूटर साइंस और MBA में है, और वे पहले एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। लेकिन तेजस्वी यादव से उनकी दोस्ती और राजनीतिक जुड़ाव धीरे-धीरे बढ़ता गया। कहा जाता है कि संजय यादव और तेजस्वी की दोस्ती 2012 से शुरू हुई थी, जब दोनों दिल्ली में मिले थे। इसके बाद संजय यादव ने आरजेडी में सक्रियता बढ़ाई और पार्टी के रणनीतिक मामलों में अपनी जगह बनानी शुरू की। तेजस्वी यादव ने 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले संजय यादव को पार्टी में एक महत्वपूर्ण भूमिका दी और तब से उनकी प्रभावशाली उपस्थिति लगातार बढ़ी।

इस बार 2025 के विधानसभा चुनाव में संजय यादव का योगदान बेहद महत्वपूर्ण था। सीट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीतियों तक, संजय यादव ने तेजस्वी यादव को कई अहम सलाह दी। वे चुनावी मुद्दों के चयन, मीडिया रणनीतियों और सोशल मीडिया/IT सेल को मज़बूत करने में भी सक्रिय रहे। संजय ने पार्टी के जातीय समीकरण से बाहर जाकर अपनी रणनीतियाँ बनाई, जो तेजस्वी यादव की सोच को भी बदलने का कारण बनीं।

संजय यादव और पार्टी के भीतर विवाद

हालांकि, संजय यादव की बढ़ती ताकत आरजेडी के अंदर कुछ नेताओं के लिए परेशानी का कारण बन गई थी। पार्टी के वरिष्ठ नेता और तेजस्वी यादव के बड़े भाई तेज प्रताप यादव ने कई बार संजय यादव की भूमिका पर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि संजय यादव पार्टी में फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं और पार्टी के अंदर असहमति बढ़ा रहे हैं। तेज प्रताप यादव ने उन्हें ‘जयचंद’ तक कह डाला, और कई बार यह आरोप भी लगाया कि संजय यादव पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक को नजरअंदाज कर रहे हैं।

संजय यादव की बढ़ती ताकत से केवल तेज प्रताप ही नहीं, बल्कि लालू यादव के परिवार के कुछ अन्य सदस्य भी नाराज थे। उदाहरण के तौर पर, रोहिणी आचार्य ने भी संजय यादव की भूमिका पर सवाल उठाए थे। उनका मानना था कि संजय यादव ने पार्टी को लालू प्रसाद यादव के “जनता से जुड़े” तरीके से दूर कर दिया था। लालू यादव, जिनकी सेहत खराब है, इस बार फैसले लेने में सक्षम नहीं थे, और संजय यादव ने पार्टी की दिशा को पूरी तरह से बदल दिया था।

संजय यादव पर आरोप

आरजेडी के कुछ नेताओं का आरोप था कि चुनाव से पहले पार्टी के टिकट बंटवारे में संजय यादव ने मनमानी की। उनके फैसलों के कारण कई पुराने और कद्दावर नेताओं को दरकिनार किया गया, जिससे पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक भी प्रभावित हुआ। इसके अलावा, कुछ नेताओं का यह भी कहना था कि संजय यादव को बिहार की राजनीति का उतना ज्ञान नहीं था, क्योंकि उनका मूल निवास हरियाणा है। वे बिहार के जातीय समीकरणों को सही से समझ नहीं पाए, जो कि राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण तत्व है।

चुनाव से ठीक पहले एक और विवाद तब सामने आया, जब तेजस्वी यादव की ‘अधिकार यात्रा’ के दौरान संजय यादव उस सीट पर बैठे थे, जिस पर आमतौर पर तेजस्वी यादव बैठते थे। इससे यह साफ संकेत मिला कि संजय यादव ने अपने आप को पार्टी में तेजस्वी के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण नेता मान लिया था। इस विवाद ने उनकी भूमिका पर और भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

संजय यादव की भूमिका पर उठते सवाल

अब चुनावी परिणाम के बाद, आरजेडी के अंदर संजय यादव की भूमिका पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। क्या संजय यादव ने पार्टी को गलत दिशा में धकेल दिया? क्या उनका व्यक्तिगत प्रभाव तेजस्वी यादव पर ज्यादा था, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा? क्या वे पार्टी के रणनीतिक फैसलों में जरूरत से ज्यादा शामिल हुए? अब ये सवाल इसलिए अहम हो गए हैं क्योंकि पार्टी की हार के बाद संजय यादव पर दोषी ठहराए जाने की संभावना है।

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