पंजाब में दमनकारी प्रशासन, जकारिया खान और उसका दीवान – Zakariya Khan

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 01 Jun 2026, 05:54 AM | Updated: 01 Jun 2026, 05:54 AM

Zakariya Khan : क्या आपने कभी सोचा है कि जिस सिख धर्म की स्थापना शांति, मानवता की रक्षा, और जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए की गई थी, वो सिख धर्म मुगलो का सबसे बड़ा दुश्मन कैसे बन गया। क्यों मुगल सिखों के खून के प्यासे हो गये.. जबकि प्रथम गुरु गुरु नानक देव जी से लेकर पांचवे गुरु गुरु अर्जन देव जी तक उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए, और शांति स्थापित करने के लिए मुगलो से बातचीत करने की, अहिंसा के रास्ते पर चलने की ही कोशिश की थी, लेकिन फिर भी मुगलो ने सिख गुरुओ और सिखों को प्रताड़ित करने में कोई कसर नही छोड़ी थी।

मुगलो की क्रूरता को दर्शाने के मामले में कई सेनापति और दरबारी हुए, लेकिन एक मुगल दीवान ऐसा था जिसने सिखों से अपनी दुश्मनी को जाहिर करने के लिए ऐलान कर दिया था कि जो सिखों का सिर ले कर आयेगा, उसे हर एक सिर के बदले 50 रूपय दिये जायेंगे। जरा सोचिये कि उस वक्त सिखों को कैसा जीवन जीना पड़ता होगा.. अपने इस वीडियों में हम बात करेंगे क्रूर मुगल दीवान जकारिया खान (Zakariya Khan) के बारे में.. जो कि मुगल शासन के दौरान पंजाब का क्रूर दीवान कहलाया था।

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Zakariya Khanके शासनकाल में दीवान की क्रूर नीतियाँ

जकारिया खान (Zakariya Khan) को सिखों के एक अलग ही तरह की बैर था, उसे लगता था कि सिख मुगलो के दमनकारी नीति, और जबरन इस्लाम कूबूल करवाने के रास्ते में सबसे बड़े पत्थर है.. सिखो द्वारा इस्लाम अपनाने के बजाय हंसते हंसते शहीद होना स्वीकार करना उसे सबसे ज्यादा चिढ़ाता था। उसने तय कर लिया था कि वो मुगलो से अपनी वफादारी साबित करने के लिए हर एक सिख को हिंदुस्तान की धरती से खत्म कर देगा। वो 1726 से लेकर 1745 तक मुगल काल में लाहौर और मुल्तान का सूबेदार था, वहीं अपने पिता और क्रूर सूबेदार अव्द अल समद खान की ही तरह जकारिया खान (Zakariya Khan) काफी क्रूर था।

बंदा सिंह बहादुर का आत्मसमर्पण – Zakariya Khan

लेकिन उसने सबसे ज्यादा नरसंहार सिखो का किया था। मगर पद संभालने से पहले ही उसने 1716 में बहादुर सिख लड़ाका बंदा सिंह बहादुर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, और उन्हें 8 महीनों तक उनके गांव में कैद होने पर मजबूर कर दिया था… जिसके बाद मजबूरन बंदा सिंह बहादुर को आत्मसमर्पण करना पड़ा था, कहा जाता है कि जब वो दिल्ली जा रहा था तब रास्ते में पड़ने वाले सभी गांवो में से सिखों को खोज खोज  कर कैद कर रहा था, जब वो दिल्ली पहुंचा तो उसके पास 700 सिख कैदी थे और 700 बैलगाड़ी थी जिसपर सिख लोगों के कटे हुए सिर भरे थे।

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वान तारा सिंह से ने मुगलो को अमृतसर में घुसने से रोका – Zakariya Khan

जकारिया खान (Zakariya Khan) के पद संभालते ही सबसे पहले उसका सामना हुआ पूर्वी पंजाब के तरन तारन जिले की तहसील भीखीविंड के रहने वाले वान तारा सिंह से… जिन्होंने मुगलो को अमृतसर में घुसने से रोकने के लिए मुगलो से लोहा लिया था औऱ शहीद हो गए थे। वान तारा सिंह को खुद भाई मणि सिंह ने अमृत चखाया था। जकारिया सिंह ने 25 घुड़सवार और 80 पैदल सैनिकों की टुकड़ी भेजी थी वान पर कब्जा करने के लिए, लेकिन तारा सिंह के सरदारों ने फौजदार की सेना और सेनापति को खदेड़ दिया,. जिसमें सेनापति समेत कई सैनिको की मौत हो गई। जिससे गुस्साये जकारिया खान ने अपने डिप्टी मोमिन खान को भेजा वो भी 2,000 घुड़सवार, 5 हाथी, 40 हल्के ऊंट तोप और 4 तोपों वाली एक क्रूर टुकड़ी के साथ..उस वक्त तारा सिंह समेत मात्र 22 सरदारों ने रातभर तक सेना को किसी तरह से रोके रखा लेकिन अगली सुबह वो सभी लड़ाई में शहीद हो गये।

सिखों को गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब में पूजा करने से रोका – Zakariya Khan

लेकिन सिखों के प्रति उसकी नफरत और बढ़ गई थी। कहा जाता है कि 1730 के आसपास जब वो लाहौर का सूबेदार के तौर पर काम कर रहा था, तब अपने सेनापति सलामत खान को अमृतसर पर कब्जा करने के लिए भेजा था, इस घेरेबंदी के बाद सिखों को गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब में पूजा करने से रोका गया। इस दौरान उसने विरोध करने वाले मात्र 14 साल के हकीकत राय को फांसी पर चढ़ा कर अपनी घृणा को दर्शा दिया था। जकारिया खान (Zakariya Khan) का आतंक ऐसा था कि उसने लाहौर के दिल्ली गेट के बाहर घोड़ा मंडी जिसे नखास कहा जाता था, वहां पर गिरफ्तार किये गए सिखो को सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित करके फांसी पर लटका दिया जाता था।

सिख संत और योद्धा भाई तारू सिंह – Bhai Taru Singh

जकारिया खान (Zakariya Khan) का अत्याचार इतना बढ़ गया उसने सिखों के घरों में लूटपाट को वैध करार दे दिया था। सिखो को छिपाने वाले  या रक्षा करने वाले को मुगलो का कट्टर दुश्मन माना जाता था, इसी कड़ी में पहले भाई मणि सिंह को नखास में फांसी दी गई और 1745 में सिख संत और योद्धा भाई तारू सिंह को एक मुसलमान लड़की को बचाने के लिए ही पकड़ा गया औऱ उन्हें वो यातनायें दी गई जिससे रूंह कांप जायें। तारू सिंह जी के सिर से उनके सारे केश उखाड़ दिये गये, लेकिन तब वो भी इस्लान अपनाने के लिए राजी नहीं हुए.. जिसके बाद उन्हें महल के पीछे जंगली इलाकें में मरने के लिए छोड़ दिया गया।

भाई तारु सिंह ने जकरिया खान को श्राप दे दिया – Zakariya Khan

जकरिया खान (Zakariya Khan) ने भाई तारू सिंह के इस्लाम अपनाने से इनकार करने पर अपना जूता उनके सिर कर मारा था, जिसके बाद भाई तारु सिंह ने श्राप दे दिया था कि इसी जूते से मार खाने से वो मरेगा। जकारियां खान को ये केवल कहीं सुनी बातें लगी थी, लेकिन उसी रात उसे पेशाब करने में दिक्कत होने लगी.. उसे असहनीय दर्द होने लगा, उसने की बड़े हकीम वैध को बुलाया लेकिन उसका इलाज नहीं हो सका, अंत में किसी पहुंचे हुए संत ने उसे बताया कि वो जूते की मार खाने के बाद ही ठीक हो सकेगा।

श्राप के कारण जकारिया खान का अंत – Zakariya Khan

जकारिया खान (Zakariya Khan) भागता हुआ भाई तारू सिंह के पास पहुंचा औऱ अपनी बिमारी का इलाज करने को कहा था, लेकिन भाई तारू सिंह ने अपने श्राप को फिर से दोहरा दिया। साथ ही शर्त रखी कि वो ठीक होने के बाद सिखों का कत्लेआम बंद कर देगा.. जकारिया खान को बस ठीक होना था, इसलिए वो मान गया और उसके बाद जब जब उसे भाई तारू सिंह जी के जूतो से मारा जाता, तभी उसे पेशाब होता था.. हालांकी जूतो की मार से उसे तकलीफ होने लगी थी और इससे उसकी बिमारी से कुछ समय के लिए तो राहत मिल गई लेकिन थोड़े समय के बाद उसे फिर से तकलीफ होने लगी.. भाई तारू सिंह जी की मृत्यु से कुछ समय पहले ही जकारिया खान की मौत हो गई थी। भाई तारू सिंह ने कहा था कि वो जकारिया खान (Zakariya Khan) जैसे पापी को अपने से आगे ले जायेंगे और उनका वचन सही साबित हुआ था। जकारिया खान जैसे क्रूर सेनापति का अंत एक सिख संत के श्राप के कारण ही हुआ..औऱ उसे राहत भी एक सिख संत के कारण ही मिली थी।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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