Kim Jong Entry In War: मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध के बीच अब कोरियाई प्रायद्वीप में भी तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। दरअसल, अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने सोमवार से बड़े पैमाने पर संयुक्त सैन्य अभ्यास Freedom Shield शुरू कर दिया है। इस अभ्यास में हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे हैं और यह 19 मार्च तक चलेगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में इस तरह का सैन्य अभ्यास क्षेत्र में सुरक्षा समीकरणों को और संवेदनशील बना सकता है, खासकर तब जब North Korea पहले से ही इन अभ्यासों का विरोध करता रहा है।
हजारों सैनिक होंगे शामिल (Kim Jong Entry In War)
दक्षिण कोरिया के संयुक्त चीफ्स ऑफ स्टाफ के मुताबिक इस अभ्यास में लगभग 18,000 दक्षिण कोरियाई सैनिक हिस्सा ले रहे हैं। हालांकि United States Forces Korea यानी यूएसएफके ने अमेरिकी सैनिकों की सटीक संख्या सार्वजनिक नहीं की है।
यह संयुक्त युद्धाभ्यास दोनों देशों के सैन्य सहयोग को मजबूत करने और संभावित सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयारी का हिस्सा माना जाता है। अभ्यास के दौरान अलग-अलग युद्ध परिस्थितियों का सिमुलेशन किया जाएगा, ताकि संयुक्त सैन्य ऑपरेशन की क्षमता को परखा जा सके।
हथियारों के ट्रांसफर को लेकर अटकलें
इस सैन्य अभ्यास के बीच एक और चर्चा तेज हो गई है। दक्षिण कोरियाई मीडिया में ऐसी खबरें सामने आई हैं कि अमेरिका अपने कुछ सैन्य संसाधनों को दक्षिण कोरिया से हटाकर मिडिल ईस्ट भेज सकता है, जहां Iran के साथ तनाव की स्थिति बनी हुई है।
हालांकि अमेरिकी सेना ने इन अटकलों पर सीधे तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। पिछले हफ्ते यूएसएफके ने कहा था कि सुरक्षा कारणों से वह सैन्य उपकरणों की गतिविधियों या तैनाती पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करेगा। दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने भी उन रिपोर्टों पर खुलकर कुछ नहीं कहा, जिनमें दावा किया गया था कि कुछ अमेरिकी पैट्रियट एंटी-मिसाइल सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरणों को मिडिल ईस्ट भेजा जा सकता है। हालांकि उन्होंने इतना जरूर कहा कि इससे अमेरिका और दक्षिण कोरिया की संयुक्त रक्षा रणनीति पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
उत्तर कोरिया की कड़ी आपत्ति
दूसरी ओर Kim Jong Un के नेतृत्व वाला उत्तर कोरिया लंबे समय से ऐसे सैन्य अभ्यासों का विरोध करता रहा है। प्योंगयांग का आरोप है कि अमेरिका और दक्षिण कोरिया इन अभ्यासों के जरिए संभावित हमले की तैयारी करते हैं।
पिछले महीने प्योंगयांग में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान किम जोंग उन ने दक्षिण कोरिया के प्रति अपना सख्त रुख दोहराया था। हालांकि उन्होंने अमेरिका के साथ बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए। उनकी शर्त है कि वॉशिंगटन परमाणु निरस्त्रीकरण को बातचीत की पूर्व शर्त के रूप में रखना बंद करे।
परमाणु वार्ता पहले ही हो चुकी है विफल
दरअसल, 2019 में उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे पर हुई बातचीत विफल हो गई थी। उस समय किम जोंग उन और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के बीच शिखर वार्ता हुई थी, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। इसके बाद से प्योंगयांग ने वॉशिंगटन और सियोल के साथ अधिकांश कूटनीतिक बातचीत बंद कर दी।
पिछले कुछ वर्षों में स्थिति और जटिल हो गई है। किम जोंग उन ने अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया है। साथ ही उन्होंने Russia के साथ सैन्य सहयोग भी मजबूत किया है। रिपोर्टों के मुताबिक उत्तर कोरिया ने यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस को हथियार और सैनिक भेजकर मदद भी की है।
साल में दो बार होता है यह अभ्यास
‘फ्रीडम शील्ड’ अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच साल में दो बार होने वाले प्रमुख संयुक्त अभ्यासों में से एक है। दूसरा बड़ा अभ्यास अगस्त में होने वाला Ulchi Freedom Shield है। ये अभ्यास मुख्य रूप से कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित होते हैं, जिनमें अलग-अलग युद्ध स्थितियों का आकलन किया जाता है। इस बार ‘वारियर शील्ड’ नाम के फील्ड ट्रेनिंग प्रोग्राम के तहत 22 फील्ड एक्सरसाइज भी होंगी, जो पिछले साल हुए 51 अभ्यासों से कम हैं।
कूटनीति की भी तलाश
हालांकि अमेरिका और दक्षिण कोरिया का कहना है कि ये सैन्य अभ्यास नियमित प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देश उत्तर कोरिया पर दबाव बनाए रखने के साथ-साथ बातचीत की संभावनाएं भी खुली रखना चाहते हैं।
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति Lee Jae-myung ने हाल ही में कूटनीतिक रास्ते अपनाने की इच्छा जताई है। उनके कुछ अधिकारियों को उम्मीद है कि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली बैठकों और यात्राओं के जरिए प्योंगयांग के साथ संवाद की कोई नई राह निकल सकती है।
फिलहाल ‘फ्रीडम शील्ड’ अभ्यास शुरू हो चुका है और दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि इससे क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या कूटनीति के लिए कोई नया रास्ता खुलता है।
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