Relu Ram Punia Case: हरियाणा के इतिहास में दर्ज सबसे खौफनाक और चर्चित मामलों में शामिल पुनिया परिवार हत्याकांड एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। करीब 24 साल पुराने इस केस में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने न सिर्फ कानूनी हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि उस रात की भयावह यादों को भी फिर से जिंदा कर दिया है, जिसने पूरे प्रदेश को सन्न कर दिया था।
हाई कोर्ट ने आठ लोगों की नृशंस हत्या के मामले में दोषी ठहराई गई सोनिया पुनिया और उसके पति संजीव कुमार को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने हरियाणा सरकार की उस अर्जी को रद्द कर दिया है, जिसमें दोनों की समय से पहले रिहाई से इनकार किया गया था। साथ ही मामले की दोबारा समीक्षा के आदेश देते हुए दोनों को अंतरिम जमानत भी दी गई है। संजीव कुमार पहले ही जेल से बाहर आ चुका है, जबकि सोनिया पुनिया भी जल्द रिहा हो सकती है।
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जन्मदिन की रात हुआ था खून का खेल (Relu Ram Punia Case)
यह दिल दहला देने वाली घटना 23 अगस्त 2001 की रात की है। उसी दिन सोनिया पुनिया अपना 19वां जन्मदिन मना रही थी। हिसार जिले के उकलाना इलाके में पूर्व विधायक रेलू राम पुनिया की आलीशान कोठी उस रात मौत के अड्डे में बदल गई। आरोप है कि सोनिया ने अपने पति संजीव के साथ मिलकर घर में सो रहे लोगों पर हमला कर दिया।
लोहे की रॉड और डंडों से किए गए इस हमले में रेलू राम पुनिया, उनकी दूसरी पत्नी कृष्णा, बेटी प्रियंका, पहली शादी से बेटे सुनील, उसकी पत्नी शकुंतला और उनके तीन छोटे बच्चों चार साल के लोकेश, दो साल की शिवानी और महज डेढ़ महीने की प्रीति की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। सुबह जब यह खबर फैली तो पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया।
संपत्ति बनी हत्या की वजह
जांच में सामने आया कि इस खौफनाक वारदात की जड़ में करोड़ों रुपये की संपत्ति का विवाद था। आरोप था कि रेलू राम अपनी अधिकांश संपत्ति अपने पहले विवाह से हुए बेटे सुनील के नाम करना चाहते थे। इससे सोनिया खुद को हाशिये पर महसूस कर रही थी। बताया गया कि हत्या से कुछ समय पहले सोनिया ने सुनील को धमकी भी दी थी। पुलिस पूछताछ में उसने यह तक कहा था कि संपत्ति के कागजात तैयार हो चुके थे और उसे लगने लगा था कि सब कुछ उसके हाथ से निकल रहा है।
मौत की सजा से उम्रकैद तक लंबा सफर
इस केस में 2004 में ट्रायल कोर्ट ने सोनिया और संजीव को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। एक साल बाद हाई कोर्ट ने इस सजा को उम्रकैद में बदल दिया। हालांकि 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से मौत की सजा बहाल कर दी। लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई और दया याचिकाओं में देरी के आधार पर आखिरकार 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की सजा उम्रकैद में तब्दील कर दी।
इसके बाद जेल नियमों के तहत दोनों को समय-समय पर पैरोल और फरलो मिलती रही, ताकि वे अपने इकलौते बेटे प्रशांत से मिल सकें।
रिहाई के साथ फिर उभरा संपत्ति विवाद
अब हाई कोर्ट से मिली ताजा राहत के बाद पुनिया परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। बताया जा रहा है कि सोनिया ने जेल से ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पत्र लिखकर अपने पिता की संपत्तियों पर दावा किया है। वहीं, रेलू राम के भाई राम सिंह के बेटे जितेंद्र पुनिया ने इस दावे का विरोध किया है और खुद को कानूनी उत्तराधिकारी बताया है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत हत्या का दोषी व्यक्ति आम तौर पर मृतक की संपत्ति का वारिस नहीं बन सकता। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला एक बार फिर अदालतों में लंबी बहस का विषय बन सकता है।
पुनिया परिवार हत्याकांड भले ही दो दशक पुराना हो, लेकिन अदालत के ताजा फैसले ने साबित कर दिया है कि इस केस की गूंज अभी खत्म नहीं हुई है।





























