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Nepal Protest: नेपो किड्स, भ्रष्टाचार और Gen-Z के विद्रोह को लेकर क्या है इंटरनेशनल मीडिया का रिएक्शन?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 10 Sep 2025, 12:00 AM | Updated: 10 Sep 2025, 12:00 AM

Nepal Protest: नेपाल के काठमांडू, पोखरा, वीरगंज जैसे शहरों की सड़कों पर हाल ही में जो कुछ हुआ, वो सिर्फ विरोध-प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक गहरी बेचैनी का इज़हार था उस देश के युवाओं की, जो अब चुप नहीं रहना चाहते। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद भले ही राजधानी में अब तनावपूर्ण शांति बनी हुई है, लेकिन जो आंदोलन हुआ, उसका शोर अब भी देश की राजनीतिक गलियों में गूंज रहा है।

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हवाई अड्डे पर भीड़, सेना की तैनाती- Nepal Protest

मंगलवार को राजधानी काठमांडू का त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी इस उथल-पुथल का हिस्सा बन गया। प्रदर्शनकारियों ने जबरन हवाई अड्डे के परिसर में घुसने की कोशिश की, जिसके बाद नेपाली सेना ने पूरे एयरपोर्ट को अपने कंट्रोल में ले लिया। उड़ान सेवाएं आंशिक रूप से बंद कर दी गईं। उधर, ओली अब प्रधानमंत्री नहीं हैं, लेकिन नेपाल में ही किसी सुरक्षित स्थान पर मौजूद हैं।

दुनियाभर की मीडिया की नज़र नेपाल पर

नेपाल में जो कुछ हो रहा है, उस पर दुनिया भर की मीडिया की पैनी नज़र है। ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्जियन’ ने इस आंदोलन को सिर्फ सोशल मीडिया बैन से जुड़ा नहीं माना, बल्कि इसे राजनीतिक भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता और लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता से उपजे युवाओं के गुस्से का नतीजा बताया है। गार्जियन ने लिखा, “नेपाल की युवा पीढ़ी इस व्यवस्था से थक चुकी है। वे रोज़गार के लिए विदेश जाने को मजबूर हैं और जो सत्ता में हैं, उनके बच्चों की लग्ज़री लाइफ तस्वीरों में देखना उन्हें और हताश करता है।”

‘नेपो किड्स’ और सोशल मीडिया क्रांति

दरअसल, आंदोलन की जड़ में एक ट्रेंड है नेपोकिड्स। बांग्लादेश के अखबार ‘द डेली स्टार’ ने बताया कि ‘नेपो बेबी’ शब्द से प्रेरित होकर नेपाली यूजर्स ने राजनेताओं के बच्चों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। टिकटॉक, रेडिट जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर वायरल पोस्ट में इन तथाकथित ‘नेपो किड्स’ की शानो-शौकत, विदेश यात्राएं, ब्रांडेड खरीदारी और पब्लिक फंड की बर्बादी को उजागर किया गया। सरकार ने इसी अभियान को रोकने के लिए सोशल मीडिया बैन लगाया और यहीं से आग भड़क गई।

‘विरोध’ जो कुछ घंटों में विद्रोह बन गया

अल जज़ीरा की रिपोर्ट में बताया गया है कि विरोध की शुरुआत कल्चरल परफॉर्मेंस, सड़कों पर आर्ट, डांस और पोस्टर्स के ज़रिए शांतिपूर्ण तरीके से हुई थी। लेकिन जल्द ही कुछ असामाजिक तत्वों और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के शामिल होने से माहौल बिगड़ गया। प्रदर्शनकारी संसद की दीवारें फांदने लगे, जवाब में सुरक्षा बलों ने गोली चलाई। इसमें कुछ स्कूली बच्चों को भी गोली लगी वे अब भी अपने यूनिफॉर्म में ही थे।

19 लोगों की मौत, 43% युवा आबादी नाराज़

वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि नेपाल में सरकार के खिलाफ गुस्सा अब जानलेवा रूप ले चुका है। अब तक करीब 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है। युवाओं का कहना है कि समस्या सिर्फ सोशल मीडिया नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था है जिसमें नेताओं के भ्रष्टाचार, धीमी आर्थिक ग्रोथ और बढ़ती बेरोजगारी से वे आजिज़ आ चुके हैं।

चीन की प्रतिक्रिया और काठमांडू का हाल

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा है, पिछले साल ओली के चौथे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से तीन करोड़ की आबादी वाले इस हिमालयी राष्ट्र में राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और धीमी आर्थिक विकास को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है।”

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 15 से 40 वर्ष की आयु के लोग कुल जनसंख्या का लगभग 43 प्रतिशत हैं – जबकि विश्व बैंक के अनुसार, बेरोज़गारी दर लगभग 10 प्रतिशत है और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद केवल 1,447 अमेरिकी डॉलर है।”

कहीं सिर्फ शुरुआत तो नहीं थी ये?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात ये है कि आंदोलन का चेहरा कोई पार्टी नहीं, कोई नेता नहीं, बल्कि एक जनरेशन बनी Nepal’s Gen-Z। उनके लिए ये लड़ाई सिर्फ सोशल मीडिया बैन की नहीं, बल्कि भविष्य बचाने की थी।

अब सवाल है कि क्या सरकार ने वाकई इनकी बात सुनी? क्या ओली के इस्तीफे के बाद नेपाल में कुछ बदलेगा? या फिर ये असंतोष किसी और रूप में दोबारा फूट पड़ेगा?

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