आजादी के बाद संवैधानिक पदों पर रहने वाले 5 दलित नेता…

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 01 Apr 2023, 12:00 AM | Updated: 01 Apr 2023, 12:00 AM

आजादी के लड़ाई तो कई नेताओं ने लड़ी और शहीद हुए. जिसमे बड़े बड़े नाम भी शामिल हैं लेकिन वो आजादी की लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ थी जो देश को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए लड़ी गई. साल 1947 में देश तो आजाद हुआ मगर उस स्तर पर नहीं जिस स्तर पर होना चाहिए. कहने का मतलब हमने अंग्रेजों से लड़ाई तो जीत ली थी लेकिन अपने ही देश में जातिगत कुरीतियों के चलते हम अपनों से हार रहे थे. जाति के नाम पर तो ये ग़ुलामी कुछ तबकों तक सीमित थी जबकि पूरा तबका ही उसी जाती से संबंध रखता था लेकिन एक देश, एक राष्ट्र के नाम पर हम अंग्रेजी जंग जीतने के बाद भी हार गए थे. क्योंकि देश को एक नया कीड़ा अन्दर से ही खाए जा रहा था और वो था ‘जातिवाद’. 

ये शब्द कहां से आया ये तो इतिहास बता सकता है लेकिन इस शब्द का जो असर हमारे समाज में हुआ वो आज भी पूरे देश को निचोड़ खाता है. कहने को तो ये सिर्फ एक शब्द मात्र है लेकिन इसका वास्तिविक विश्लेषण सामाज में जाति -व्यवस्था से लड़ रहे वही बता सकते हैं जो इसका शिकार हुए.  ऐसे में देश में जाति व्यवस्था से पीड़ित तबकों न्याय दिलाने के लिए कई नेता राजनेता पैदा हुए जिन्होंने इनके लिए लोकतंत्र के खिलाफ आवाज़ उठाई और आज देश के लिए मिसाल बन गए. आज हम उन्ही कुछ बड़े चेहरों की बारे में बात करेंगे जो आजादी के बाद संवैधानिक पदों पर रहकर दलितों के लिए मसीहा की तरह उनकी रक्षा करते रहे.

डॉ भीमराव अम्बेडकर(Dr. Bhimrao Ambedkar)

इस लिस्ट में पहला नाम देश के सबसे जाने माने नेता और प्रभावी कानून मंत्री डॉ भीमराव आंबेडकर का है. भारतीय संविधान के निर्माता डॉ भीम राव अम्बेडकर ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी. सामाजिक व्यवस्था और कानून के जानकार होने के कारण नेहरू ने अपने पहले मंत्रिमंडल में उन्हें कानून और न्याय मंत्रालय का जिम्मा दिया.

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जाति व्यवस्था के खिलाफ लगातार लड़ने वाले अम्बेडकर सामाजिक और आर्थिक विषयों का अच्छा ज्ञान रखते थे . उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से भी पढ़ाई की थी. सन 1990 में भारत सरकार ने उनके भारतीय समाज में अहम योगदान को लेकर मरणोपरान्त भारत रत्न दिया था.

जगजीवन राम (Jagjivan Ram)

इनके कार्यों और संघर्षों को लेकर हमने आपको एक लेख में भी बताया है. ये भी उन्ही दलित नेताओं में से थे जिनका नाम तो भले ही सुनने में कम आया हो लेकिन इनके योगदान को कोई नहीं भुला सकता. नेहरू कैबिनेट में श्रम, ट्रांसपोर्ट, रेलवे जैसे कई मंत्रिमंडल संभालने के बाद, ये 1977 में भारत के चौथे उपप्रधानमंत्री बने. 1971 में भारत- पाक युद्ध के दौरान वे भारत के रक्षा मंत्री भी थे, जिसमें बांग्लादेश का जन्म हुआ था.

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के आर नारायण (K R Narayan)

साउथ स्टेट के केरल में कोट्टयम जिले के रहने वाले आर नारायण साल 1997 में आजाद भारत के 10वें राष्ट्रपति बने. और इससे ठीक पहले राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के कार्यकाल (1992-1997) के दौरान वो भारत के उपराष्ट्रपति भी थे लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से राजनीतिशास्त्र की पढ़ाई करने वाले नारायणन जापान, यूके, थाईलैंड, तुर्की, चीन और अमेरिका के राजदूत भी रहे.

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कांशी राम (Kanshi Ram)

इनका नाम तो आपने कई दफा सुना होगा. बहुजन नायक के नाम से प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक कांशी राम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की. जिसका कार्यभार आज उत्तरप्रदेश में मायावती संभालती हैं.  बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों पर चलते हुए कांशी राम ने लगातार दलितों और पिछड़ों के लिए काम किया. 1991-1996 तक उत्तर प्रदेश के इटावा से सांसद रहे राम ने 2001 में मायावती को अपना उत्तराधिकारी चुनने की घोषणा कर दी थी.

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मायावती (Mayawati)

चार बार उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती भारत में दलित समाज की बड़ी नेता मानी जाती हैं. आज के वक़्त में साल 2014 से सत्ता में में इनकी पकड़ भले ही कम हुई हो लेकिन मुख्यमंत्री पद पर रहते हो इन्होने जिस तरह से उनके उत्थान के ;लिए कार्य किया उसे स्वीकार करने से कोई नकार नहीं सकता.

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ये वही मायावती हैं जिन्होंने मानसून सत्र में बीजेपी पर नहीं बोलने देने का आरोप लगा राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया. 1995 में पहली बार उत्तर प्रदेश की 17वीं की मुख्यमंत्री बनी थी. दलितों के उत्थान के लिए लगातार काम कर रही मायावती पर कई पुस्तकें भी लिखी जा चुकी हैं. हालांकि इस बार के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की बड़ी हार हुई थी. 

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